वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>कोऽयं सनत्कुमारोति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयं।<br>तवापि तेन गदितं वद मामनुपूर्वशः॥ ६८ | नारदजीने [फिर] कहा— इस विषयमें स्वयं ब्रह्माजीने जिनसे कहा है, वे सनत्कुमार कौन हैं? और उन्होंने भी आपसे जो कहा है उसे क्रमशः मुझसे कहें॥ ६८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>धर्मस्य भार्याहिंसाख्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम्।<br>संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम्॥ ६९<br>ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः।<br>तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः॥ ७०<br>सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम्।<br>दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम्॥ ७१<br>ज्ञानयोगं न ते दद्युर्ज्यायांसोऽपि कनीयसाम्।<br>मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः॥ ७२<br>सनत्कुमारश्चाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः॥ ७३ | पुलस्त्यजी बोले— धर्मकी पत्नी अहिंसा है। उससे चार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ! वे सभी योगशास्त्रके विचार करनेमें कुशल थे। उनमें सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एवं चतुर्थ सनन्दन हुए। वे सभी सांख्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एवं योगसे युक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पञ्चशिख नामक (ऋषि)-को देखकर उनके पास गये। बड़े होनेपर भी उन लोगोंने अपनेसे छोटोंको ज्ञानयोगका उपदेश नहीं दिया। कपिल आदिकी उपासना करनेवालोंको महायोगका परिणाममात्र बतला दिया। सनत्कुमारने कमलोद्भव ब्रह्माके पास जाकर योग-विज्ञान पूछा। प्रजापतिने उनसे कहा॥ ६९—७३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि।<br>यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि॥ ७४ | ब्रह्माने कहा— साध्य! यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा। उसे जिस-किसीसे नहीं कहना चाहिये; क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है॥ ७४॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो।<br>न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह॥ ७५ | सनत्कुमारने कहा— देवेश! मैं पुत्र ही हूँ; क्योंकि विभो! मैं शिष्य हूँ। पितामह! पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता॥ ७५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन।<br>धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु॥ ७६<br><br>पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते।<br>शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ७७ | ब्रह्माने कहा— धर्मनन्दन! शिष्य और पुत्रमें धर्म-कर्मके संयोगमें (जो) कुछ भेद होता है उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो। यह वैदिकी श्रुति है—जो 'पुम्' नामक नरकसे उद्धार कर देता है उसे 'पुत्र' कहा जाता है और शेष पापोंका हरण करनेवाला होनेसे 'शिष्य' कहा जाता है (—यही दोनोंमें भेद है)॥ ७६-७७॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः।<br>कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद॥ ७८ | सनत्कुमारने कहा (पूछा)— देव! वह 'पुम्' नामक नरक कौन है? जिस नरकसे पुत्र रक्षा करता है और शिष्य किससे अवशिष्ट पापका हरण करता है; आप कृपया इन्हें बतलाइये॥ ७८॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>एतत् पुराणं परमं महर्षे<br>योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च।<br>तथैव चोग्रं भयहारि मानवं<br>वदामि ते साध्य निशामयैनम्॥ ७९ | ब्रह्माने कहा— महर्षे! मैं तुमको अत्यन्त प्राचीन,<br><br>योगाङ्गसे युक्त, उग्र भय दूर करनेवाली परम पवित्र<br><br>कथा सुनाता हूँ। हे साध्य! तुम इसे सुनो॥ ७९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६०॥
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