वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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| तमाह धर्मराड् ब्रह्मन् यदि मां संयमाद् भवान्।<br>गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥ ५५<br><br>मुरस्तमाह भवतः कः संयन्ता वदस्व माम्।<br>अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः॥ ५६<br><br>यमस्तं प्राह मां विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः।<br>श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥ ५७ | काटकर पृथ्वीपर फेंक दूँगा। ब्रह्मन्! धर्मराजने उससे कहा—यदि तुम मेरे ऊपर संयम करनेवालेसे मेरी रक्षा कर सको तो मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे वचनका पालन करूँगा। मुरने उनसे कहा—मुझे बतलाओ कि तुम्हारा संयन्ता (शासक) कौन है? मैं निस्सन्देह उसे पराजित कर रोक दूँगा। यमने उससे कहा—जो श्वेतद्वीपके निवासी, चक्र-गदा धारण करनेवाले, अविनाशी भगवान् विष्णु हैं, वे ही मुझे शासित करते हैं॥ ५४–५७॥ | | तमाह दैत्यशार्दूलः क्वासौ वसति दुर्जयः।<br>स्वयं तत्र गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः॥ ५८<br><br>तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम्।<br>तत्रास्ते भगवान् विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः॥ ५९<br><br>मुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम्।<br>किं तु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः॥ ६०<br><br>स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रवर्तिष्ये जयं प्रति।<br>संयन्तुर्वा यथा स्याद्वि ततो युद्धं समाचर॥ ६१<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्मुरः।<br>यत्रास्ते शेषपर्यङ्के चतुर्मूर्तिर्जनार्दनः॥ ६२ | दैत्योंमें श्रेष्ठ मुरने यमराजसे कहा—यम! वह कहाँ रहता है, जिसे कठिनतासे जीता जा सकता है? उसका संयमन करनेके लिये मैं तैयार होकर वहाँ स्वयं जाऊँगा। यमराजने उससे कहा—तुम क्षीरसागरमें जाओ। वहाँ लोकस्वामी जगन्मूर्ति भगवान् विष्णु रहते हैं। मुरने उनकी बात सुनकर कहा—धर्मराज! मैं केशवके पास जा रहा हूँ, परंतु तुम तबतक मनुष्योंका नियमन मत करना। उस (मुर)-ने कहा—तुम जाओ। तबतक मैं तुम्हारे नियामकको जैसे भी हो जीतनेका प्रयत्न करूँगा। उसके बाद तुम युद्ध करना। इतना कहकर मुर या मुर दैत्य क्षीरसागरमें जा पहुँचा। वहाँ (जाकर उसने देखा कि) चतुर्भुजाधारी जनार्दन अनन्त नागकी शय्यापर (पड़े हुए) हैं॥ ५८–६२॥ | | नारद उवाच<br><br>चतुर्मूर्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते।<br>सर्वगत्वात् कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद॥ ६३ | नारदजीने पूछा— आप (कृपया) यह बतलायें कि विष्णु एक होनेपर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहे जाते हैं। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होनेके कारण तो नहीं कहा जाता? (आप) उसे कहें॥ ६३॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मांस्तथा शृणु॥ ६४<br><br>अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम्।<br>वासुदेवाख्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम्॥ ६५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! अव्यक्त एवं सर्वव्यापी होनेपर भी वे एक ही हैं। जिस कारणसे जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद (तर्क या अनुमानद्वारा अज्ञेय) एवं निर्देश किये जानेमें अशक्य, शुक्ल (शुद्ध), शान्तियुक्त, अव्यक्त (अप्रकट) एवं द्वादशपत्रक ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—) द्वादशाक्षर मन्त्रवाला कहा गया है॥ ६४-६५॥ | | नारद उवाच<br><br>कथं शुक्लं कथं शान्तमप्रतर्क्यमनिन्दितम्।<br>कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका तानि मे वद॥ ६६ | नारदजीने [पुनः] पूछा— किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्रतर्क्य एवं अनिन्दित हैं? मुझे बतलाइये कि उनके कथित द्वादशपत्रक कौन हैं॥ ६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>शृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभाषितम्।<br>श्रुतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं च तन्मम॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— पितामह ब्रह्माने जिस परम गुह्य वचनको कहा है, उसे सुनिये। सनत्कुमारने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था॥ ६७॥ |