वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७१ | | :--- | :--- |
| ततो गजेन्द्रकुलिशौ हृतौ शक्रस्य शत्रुणा ।<br>सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ॥ ४०<br><br>कालिन्द्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।<br>मुरुश्चापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥ ४१ | पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसके बाद (उस) शत्रुने इन्द्रके गजराज (ऐरावत) और वज्रको छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओंके साथ कालिन्दीके दक्षिण तटपर अपना नगर बसाकर रहने लगे और मुर स्वर्गमें रहते हुए महान् भोगोंका उपभोग करने लगा ॥ ३७-४१ ॥ | | दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमाः ।<br>मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्गे सुकृतिनो यथा ॥ ४२<br><br>स कदाचिन्महीपृष्ठं समायातो महासुरः ।<br>एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ॥ ४३<br><br>स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।<br>ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥ ४४<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।<br>नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥ ४५ | मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुरके निकट पहुँचकर स्वर्गमें पुण्यात्माओंके समान आमोद-प्रमोद करने लगे। वह महान् असुर किसी समय पृथ्वीपर आया और अकेला ही हाथीपर चढ़कर सरयू नदीके तटपर उपस्थित हुआ। उसने सरयूके किनारे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए एवं यज्ञकर्ममें दीक्षित रघु नामके राजाको देखा। उनके पास जाकर उस दैत्यने कहा— मुझसे संग्राम करो, नहीं तो यज्ञ करना बंद कर दो। तुम देवताओंकी पूजा नहीं कर सकते ॥ ४२-४५ ॥ | | तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।<br>प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपसां वरः ॥ ४६<br><br>किं ते जितैर्नरैर्दैत्य अजिताननुशासय ।<br>प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ॥ ४७<br><br>स बली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।<br>तस्मिञ्जिते हि विजितं सर्वं मन्यस्व भूत लम् ॥ ४८<br><br>स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुङ्गवः ।<br>जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥ ४९ | ब्रह्मन् ! मित्रावरुणके पुत्र महातेजस्वी, बुद्धिमान् और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठने उस दैत्यके पास जाकर कहा—दैत्य ! मनुष्योंको जीत लेनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? जो नहीं जीते गये हैं उनको पराजित करो। यदि तुम (चढ़ाई कर) प्रहार करना चाहते हो तो उन यमराजका अवरोध करो। महासुर ! वे बलशाली हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनको जीत लेनेपर समस्त भूतलको पराजित हुआ समझो। वसिष्ठका वह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्ड धारण करनेवाले धर्मराजको जीतनेके लिये चल पड़ा ॥ ४६-४९ ॥ | | तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे ।<br>स समारुह्य महिषं केशवान्तिकमागमत् ॥ ५०<br><br>समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।<br>स चाह गच्छ मामद्य प्रेषयस्व महासुरम् ॥ ५१<br><br>स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽभ्यागात् त्वरान्वितः ।<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सम्प्राप्तो नगरीं मुरः ॥ ५२<br><br>तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्तुमिच्छसि ।<br>वदस्व वचनं कर्त्ता त्वदीयं दानवेश्वर ॥ ५३ | उसे आता हुआ सुनकर तथा संग्राममें वह अवध्य है—ऐसा विचारकर वे यमराज महिषपर सवार होकर भगवान् केशवके पास चले गये। उनके पास जाकर प्रणाम करनेके पश्चात् (यमराजने) मुरके कृत्योंको बताया। उन्होंने कहा—तुम जाकर अभी उस महासुरको मेरे पास भेज दो। वासुदेवके वचनको सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतनेमें मुर दैत्य उनकी नगरीमें आया। उसके आनेपर यमने कहा—हे मुर ! बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५०-५३ ॥ | | मुरुवाच<br>यम प्रजासंयमनान्निवृत्तिं कर्त्तुमर्हसि ।<br>नो चेत् तवाद्य छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥ ५४ | मुरु या मुरने कहा— यम ! तुम प्रजाओंके ऊपर नियन्त्रण करना बंद कर दो, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर |