भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ते वध्यमाना रौद्र्या दुर्गया दैत्यदानवाः।<br>कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः॥ १२<br>सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तथा स्थिताम्।<br>दृष्ट्वा जगाम नमरो मत्तकुञ्जरसंस्थितः॥ १३<br>समागम्य च वेगेन देव्याः शक्तिं मुमोच ह।<br>त्रिशूलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे॥ १४<br>तावापतन्तौ देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात्।<br>कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः॥ १५भयंकर रूपवाली दुर्गाद्वारा मारे जा रहे दैत्य एवं दानव भयसे व्याकुल हो गये तथा वे उन्हें कालरात्रिके समान मानते हुए डरसे भाग चले। सेनाके अग्र (प्रधान) भागको नष्ट तथा अपने सम्मुख दुर्गाको स्थित देखकर नमर मतवाले हाथीपर चढ़कर आगे आया। उस दानवने युद्धमें देवीके ऊपर शक्तिसे कसकर प्रहार किया एवं सिंहके ऊपर त्रिशूल चलाया। (किंतु) देवीने उन दोनों अस्त्रोंको आते देख हुंकारसे ही उन्हें भस्म कर डाला। इधर नमरके हाथीने (सूँड़से) सिंहकी कमर पकड़ ली॥ १२-१५॥
अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम्।<br>गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः॥ १६<br>गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी रुषा।<br>सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा॥ १७<br>ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते।<br>हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भुताः॥ १८<br>केचिद् व्याघ्रमुखा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे।<br>हयास्या महिषास्याश्च वराहवदनाः परे॥ १९इसपर सिंहने तेजीसे उछलकर नमर दानवको पंजेसे मारकर उसके प्राण ले लिये और हाथीके कंधेसे उसे नीचे गिराकर देवीके आगे रख दिया। नारदजी! देवी कात्यायनी क्रोधसे उस दैत्यको मध्यमें पकड़कर तथा बायें हाथसे घुमाकर ढोलके समान बजाने लगीं और उसे अपना बाजा बनाकर उन्होंने जोरसे अट्टहास किया। उनके हँसनेसे अनेक प्रकारके अद्भुत भूत उत्पन्न हो गये! कोई-कोई (भूत) व्याघ्रके समान भयंकर मुखवाले थे, किसीकी आकृति भेड़ियेके समान थी, किसीका मुख घोड़ेके तुल्य और किसीका मुख भैंसे-जैसा एवं किसीका सूकरके समान मुँह था॥ १६-१९॥
आखुकुक्कुटवक्त्राश्च गोऽजाविकमुखास्तथा।<br>नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा॥ २०<br>गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु संघशः।<br>वादयन्त्यपरे तत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्बिकाम्॥ २१<br>सा तैर्भूतगणैर्देवी सार्द्धं तद्दानवं बलम्।<br>शातयामास चाक्रम्य यथा सस्यं महाशनिः॥ २२<br>सेनाग्रे निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि।<br>चिक्षुरः सैन्यपालस्तु योधयामास देवताः॥ २३उनके मुँह चूहे, मुर्गे (कुक्कुट), गाय, बकरा और भेड़के मुखोंके समान थे। कई नाना प्रकारके मुख, आँख एवं चरणोंवाले थे तथा वे नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उनमें कुछ तो समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे और कुछ रमण करने लगे तथा कुछ बाजा बजाने लगे एवं कुछ देवीकी स्तुति करने लगे। देवीने उन भूतगणोंके साथ उस दानव-सेनापर आक्रमण कर उसे इस प्रकार तहस-नहस कर दिया, जैसे भारी वज्रके समान ओलोंके गिरनेसे खेतीका संहार हो जाता है। इस प्रकार सेनाके अग्रभाग तथा सेनापतिके मारे जानेपर अब सेनापति चिक्षुर देवताओंसे भिड़ गया—युद्ध करने लगा॥ २०-२३॥
कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः।<br>ववर्ष शरजालानि यथा मेघो वसुंधराम्॥ २४रथियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यने अपने मजबूत धनुषको अपने कानोंतक चढ़ाकर उससे बाणोंकी इस प्रकार वर्षा की जैसे मेघ पृथ्वीपर (घनघोर) जल बरसाते हैं। परंतु