भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०५ बीसवाँ अध्याय भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना नारद उवाच कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम्। सवाहनं हतवती तथा विस्तरतो वद ॥ १ एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते। विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत् ॥ २ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्। वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥ ३ एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान्। सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥ ४ ततो बाणगणैर्दैत्यः समानम्यथ कार्मुकम्। ववर्ष शैलं धारौघैर्द्यौरिवाम्बुदवृष्टिभिः ॥ ५ शरवर्षेण तेनाथ विलोक्याद्रिं समावृतम्। क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ॥ ६ तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामितं बलात्। सुवर्णपृष्ठं विबभौ विद्युदम्बुधरेष्विव ॥ ७ बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभव्रत। गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणाऽन्यानपातयत् ॥ ८ एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिभः । विधुन्वन् केसरसटां निष्पूदयति दानवान् ॥ ९ कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्भिन्नवक्षसः । लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वथैः ॥ १० दण्डनिर्भिन्नशिरसश्चक्रविच्छिन्नबन्धनाः । चेलुः पेतुश्च मम्लुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ ११ नारदजीने पूछा - (पुलस्त्यजी !) दुर्गादेवीने सेना एवं वाहनोंके सहित महिषासुरको किस प्रकार मार डाला, इसे आप विस्तारसे कहें। मेरे मनमें यह शंका घर कर गयी है कि शस्त्रोंके विद्यमान होते हुए भी देवीने पैरोंसे उसे क्यों मारा ? ॥ १-२॥ [फिर नारदजीके प्रश्नको सुनकर] पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! देवयुगके आदिमें घटित तथा पाप एवं भयको दूर करनेवाली इस प्राचीन एवं पवित्र कथाको आप सावधान होकर सुनिये। एक बार इसी प्रकार (अर्थात्) पूर्ववर्णित रीतिसे क्रुद्ध होकर नमरने भी हाथी, घोड़े और रथोंके साथ वेगपूर्वक देवीके ऊपर आक्रमण कर दिया था। फिर देवीने भी उसे भलीभाँति देखा। इसके बाद दैत्यने अपने धनुषको झुकाकर (चढ़ाकर) विन्ध्य पर्वतके ऊपर इस प्रकारसे बाण-वर्षा की जैसे आकाशसे बादल (उसपर) धारा-प्रवाह (मूसलाधार) जलवृष्टि करता हो। उसके बाद उस दैत्यकी बाण-वर्षासे पर्वतको सर्वथा ढका देखकर देवीको बड़ा क्रोध हुआ और तब उन्होंने वेगपूर्वक झट विशाल धनुषको चढ़ा लिया ॥ ३-६ ॥ श्रीदुर्गाजीद्वारा चढ़ाया गया सोनेकी पीठवाला वह धनुष दानवी-सेनामें इस प्रकार चमक उठा, जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है। शुभ व्रतवाले श्रीनारदजी ! श्रीदुर्गाजीने कुछ दैत्योंको बाणोंसे, कुछको तलवारसे, कुछको गदासे, कुछको मुसलसे और कुछ दैत्योंको ढाल चलाकर ही मार डाला। कालके समान देवीके सिंहने (भी) अपनी गर्दनके बालोंको झाड़ते हुए अकेला ही अनेकों दैत्योंका संहार कर डाला। देवीने कुछ दैत्योंको वज्रसे आहत कर दिया, कुछ दैत्योंके वक्षःस्थलको शक्तिसे फाड़ डाला, कुछके गर्दनको हलसे विदीर्ण कर कुछको फरसेसे काट डाला, कुछके सिरको दण्डसे फोड़ दिया तथा कुछ दैत्योंके शरीरके संधि-स्थानोंको चक्रसे छिन्न-भिन्न कर दिया। कुछ पहले ही चले गये, कुछ गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये और कुछ युद्धभूमि छोड़कर भाग गये ॥ ७-११॥