वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 117, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 117
अध्याय २०] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः।<br>सौवर्णपुङ्खानपराञ्शराञ्जग्राह षोडश॥ २५<br><br>ततश्चतुर्भिस्तु तुरङ्गमानपि भामिनी।<br>हत्वा सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे॥ २६<br><br>ततस्तु सशरं चापं चिच्छेद्यैकेषुणाऽम्बिका।<br>छिन्ने धनुषि खड्गं च चर्म चादत्तवान् बली॥ २७ | दुर्गाने भी सुन्दर पर्वों (गाँठों)-वाले अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और फिर सुवर्णसे निर्मित पंखवाले सोलह बाणोंको अपने हाथोंमें ले लिया। उन्होंने क्रुद्ध होकर चार बाणोंसे उसके चार घोड़ोंको और एकसे सारथीको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजाके दो टुकड़े कर दिये। फिर अम्बिकाने एक बाणसे उसके बाणसहित धनुषको काट डाला। धनुष कट जानेपर बलवान् चिक्षुरने ढाल और तलवार उठा ली॥ २४—२७॥ |
| तं खड्गं चर्मणा सार्धं दैत्यस्याधुन्वतो बलात्।<br>शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे॥ २८<br><br>समुद्भ्राम्य महच्छूलं संप्राद्रवदथाम्बिकाम्।<br>क्रोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा॥ २९<br><br>तस्याभिपततः पादौ करौ शीर्षं च पञ्चभिः।<br>शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः॥ ३०<br><br>तस्मिन् सेनापतौ क्षुणे तदोग्रास्यो महासुरः।<br>समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः॥ ३१ | वह ढाल और तलवारको जोर लगाकर घुमा ही रहा था कि देवीने चार बाणोंसे उन्हें काट डाला। इसपर उस दैत्यने शूल ले लिया। महान् शूलको घुमाकर वह अम्बिकाकी ओर इस प्रकार दौड़ा, जैसे वनमें सियार आनन्दमग्न होकर सिंहिनीकी ओर दौड़े! पर देवीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाँच बाणोंसे उस असुरके दोनों हाथों, दोनों पैरों एवं मस्तकको काट डाला, जिससे वह असुर मरकर गिर पड़ा। उस सेनापतिके मरनेपर उग्रास्य नामका महान् असुर तथा करालास्य नामका दानव—ये दोनों तेजीसे उनकी ओर दौड़े॥ २८—३१॥ |
| बाष्कलश्चोद्धतश्चैव उदग्राख्योऽग्रकार्मुकः।<br>दुर्द्धरो दुर्मुखश्चैव बिडालनयनोऽपरः॥ ३२<br><br>एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा बलिनां वराः।<br>कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः॥ ३३<br><br>तान् दृष्ट्वा लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना।<br>वादयामास हसती तथा डमरुकं वरम्॥ ३४<br><br>यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु।<br>तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च॥ ३५ | बाष्कल, उद्धत, उदग्र, उग्रकार्मुक, दुर्द्धर, दुर्मुख तथा बिडालाक्ष—ये तथा अन्य अनेक अत्यन्त बली एवं श्रेष्ठ दैत्य शस्त्र और अस्त्र लेकर दुर्गाकी ओर दौड़ पड़े। देवी दुर्गाने उन्हें देखा और वे लीलापूर्वक हाथोंमें वीणा एवं श्रेष्ठ डमरू लेकर हँसती हुई उन्हें बजाने लगीं। देवी उन वाद्योंको ज्यों-ज्यों बजाती जाती थीं, त्यों-त्यों सभी भूत भी नाचते और हँसते थे॥ ३२—३५॥ |
| ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम्।<br>अभ्यघ्नंस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी॥ ३६<br><br>प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्तान्<br>उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम्।<br>ननर्त वीणां परिवादयन्ती<br>पपौ च पानं जगतो जनित्री॥ ३७<br><br>ततस्तु देव्या बलिनो महासुरा<br>दोर्दण्डनिर्धूतविशीर्णदर्पाः।<br>विस्रस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाताः<br>ततस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान्॥ ३८<br><br>देव्या महौजा महिषासुरस्तु<br>व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराग्रैः।<br>तुण्डेन पुच्छेन तथोरसाऽन्यान्<br>निःश्वासवातेन च भूतसंघान्॥ ३९ | अब असुर शस्त्र लेकर महासरस्वतीरूपा दुर्गाके पास जाकर उनपर प्रहार करने लगे। पर परमेश्वरीने (तुरंत) उनके बालोंको जोरके साथ पकड़ लिया। उन महासुरोंका केश पकड़कर और फिर सिंहसे उछलकर पर्वत-शृङ्गपर जाकर जगज्जननी दुर्गा वीणा-वादन करती हुई मधुपान करने लगीं। तभी देवीने अपने बाहुदण्डोंसे सभी असुरोंको मारकर उनके घमण्डको चूर कर दिया। उनके वस्त्र शरीरसे खिसक पड़े और वे प्राणरहित हो गये। यह देखकर महाबली महिषासुर अपने खुरके अग्रभागसे, तुण्डसे, पुच्छसे, वक्षःस्थलसे तथा निःश्वास-वायुसे देवीके भूतगणोंको भगाने लगा॥ ३६—३९॥ |