वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| १० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ दक्षस्य दुहिता सती।<br>शंकरस्य प्रिया भार्या बभूव वरवर्णिनी ॥ ५<br><br>किमर्थं सा परित्यज्य स्वशरीरं वरानना।<br>जाता हिमवतो गेहे गिरीन्द्रस्य महात्मनः ॥ ६<br><br>पुनश्च देवदेवस्य पत्नीत्वमगमच्छुभा।<br>एतन्मे संशयं छिन्धि सर्ववित् त्वं मतोऽसि मे ॥ ७<br><br>तीर्थानां चैव माहात्म्यं दानानां चैव सत्तम।<br>व्रतानां विविधानां च विधिमाचक्ष्व मे द्विज ॥ ८ | देवताओंके साथ युद्ध कैसे किया और ब्राह्मणश्रेष्ठ! दूसरी जिज्ञासा यह है कि दक्षप्रजापतिकी पुत्री भगवती सती, जो भगवान् शंकरकी प्रिय पत्नी थीं, उन श्रेष्ठ मुखवाली (सती)-ने अपना शरीर त्यागकर पर्वतराज हिमालयके घरमें किसलिये जन्म लिया? और पुनः वे कल्याणी देवदेव (महादेव)-की पत्नी कैसे बनीं? मैं मानता हूँ कि आपको सब कुछका ज्ञान है, अतः आप मेरी इस शंकाको दूर कर दें। साथ ही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ हे द्विज! तीर्थों तथा दानोंकी महिमा और विविध व्रतोंकी अनुष्ठान-विधि भी मुझे बताइये॥ १—८॥ |
| एवमुक्तो नारदेन पुलस्त्यो मुनिसत्तमः।<br>प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो नारदं तपसो निधिम् ॥ ९ | नारदजीके इस प्रकार कहनेपर मुनियोंमें मुख्य तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ तपोधन पुलस्त्यजी नारदजीसे कहने लगे॥ ९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br><br>पुराणं वामनं वक्ष्ये क्रमान्निखिलमादितः।<br>अवधानं स्थिरं कृत्वा शृणुष्व मुनिसत्तम॥ १०<br><br>पुरा हैमवती देवी मन्दरस्थं महेश्वरम्।<br>उवाच वचनं दृष्ट्वा ग्रीष्मकालमुपस्थितम् ॥ ११<br><br>ग्रीष्मः प्रवृत्तो देवेश न च ते विद्यते गृहम्।<br>यत्र वातातपौ ग्रीष्मे स्थितयोर्नौ गमिष्यतः ॥ १२<br><br>एवमुक्तो भवान्या तु शंकरो वाक्यमब्रवीत्।<br>निराश्रयोऽहं सुदति सदारण्यचरः शुभे॥ १३ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! आपसे मैं सम्पूर्ण वामनपुराणकी कथा आदिसे (अन्ततक) वर्णन करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! आप मनको स्थिर कर ध्यानसे सुनें!* प्राचीन समयमें देवी हैमवती (सती)-ने ग्रीष्म-ऋतुका आगमन देखकर मन्दर पर्वतपर बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा—देवेश! ग्रीष्म-ऋतु तो आ गयी है, परंतु आपका कोई घर नहीं है, जहाँ हम दोनों ग्रीष्मकालमें निवास करते हुए वायु और तापजनित कठिन समयको बिता सकेंगे। सतीके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बोले—हे सुन्दर दाँतोंवाली सति! मेरा कभी कोई घर नहीं रहा। मैं तो सदा वनोंमें ही घूमता रहता हूँ॥ १०—१३॥ |
| इत्युक्ता शंकरेणाथ वृक्षच्छायासु नारद।<br>निदाघकालमनयत् समं शर्वेण सा सती ॥ १४<br><br>निदाघान्ते समुद्भूतो निर्जनाचरितोऽद्भुतः।<br>घनान्धकारिताशो वै प्रावृट्कालोऽतिरागवान्॥ १५<br><br>तं दृष्ट्वा दक्षतनुजा प्रावृट्कालमुपस्थितम्।<br>प्रोवाच वाक्यं देवेशं सती सप्रणयं तदा ॥ १६ | नारदजी! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सती-देवीने उनके साथ वृक्षोंकी छायामें (जैसे-तैसे रहकर) निदाघ (गर्मी)-का समय बिताया। फिर ग्रीष्मके अन्तमें अद्भुत वर्षा-ऋतु आ गयी, जो अत्यधिक रागको बढ़ानेवाली होती है और जिसमें प्रायः सबका आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। (उस समय) मेघोंसे आवृत हो जानेसे दिशाएँ अन्धकारमय हो जाती हैं। उस वर्षा-ऋतुको आयी देखकर दक्ष-पुत्री सतीने प्रेमसे महादेवजीसे यह वचन कहा —॥ १४—१६॥ |
* भविष्यपुराणके प्रमाणानुसार वामनपुराणके वक्ता चतुर्मुख (ब्रह्माजी) हैं, पर यहाँ पुलस्त्यजी ऐसा उल्लेख नहीं करते कि 'पुराणं वामनं वक्ष्ये ब्रह्मण च मया श्रुतम्।' इससे प्रतीत होता है कि एतत्-सम्बन्धी श्लोक अनुपलब्ध है। मत्स्यपुराणमें भी चतुर्मुख (ब्रह्मा)-के वक्ता होनेका उल्लेख है—
'त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः। त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम् ॥'