भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय १ ] श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना ११


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विवहन्ति वाता हृदयावदारणा<br>गर्जन्त्यमी तोयधरा महेश्वर।<br>स्फुरन्ति नीलाभ्रगणेषु विद्युतो<br>वाशन्ति केकारवमेव बर्हिणः॥ १७<br><br>पतन्ति धारा गगनात् परिच्युता<br>बका बलाकाश्च सरन्ति तोयदान्।<br>कदम्बसर्जार्जुनकेतकीद्रुमाः<br>पुष्पाणि मुञ्चन्ति सुमारुताहताः॥ १८<br><br>श्रुत्वैव मेघस्य दृढं तु गर्जितं<br>त्यजन्ति हंसाश्च सरांसि तत्क्षणात्।<br>यथाश्रयान् योगिगणाः समन्तात्<br>प्रवृद्धमूलानपि संत्यजन्ति॥ १९<br><br>इमानि यूथानि वने मृगाणां<br>चरन्ति धावन्ति रमन्ति शंभो।<br>तथाचिराभाः सुतरां स्फुरन्ति<br>पश्येह नीलेषु घनेषु देव।<br>नूनं समृद्धिं सलिलस्य दृष्ट्वा<br>चरन्ति शूरास्तरुणद्रुमेषु॥ २०<br><br>उद्वृत्तवेगाः सहसैव निम्नगा<br>जाताः शशाङ्काङ्कितचारुमौले।<br>किमत्र चित्रं यदनुज्ज्वलं जनं<br>निषेव्य योषिद् भवति त्वशीला॥ २१महेश्वर! हृदयको विदीर्ण करनेवाली वायु वेगसे चल रही है। ये मेघ भी गर्जन कर रहे हैं, नीले मेघोंमें बिजलियाँ कौंध रही हैं और मयूरगण केकाध्वनि कर रहे हैं। आकाशसे गिरती हुई जलधाराएँ नीचे आ रही हैं। बगुले तथा बगुलोंकी पंक्तियाँ जलाशयोंमें तैर रही हैं। प्रबल वायुके झोंके खाकर कदम्ब, सर्ज, अर्जुन तथा केतकीके वृक्ष पुष्पोंको गिरा रहे हैं—वृक्षोंसे फूल झड़ रहे हैं। मेघका गम्भीर गर्जन सुनकर हंस तुरंत जलाशयोंको छोड़कर चले जा रहे हैं, जिस प्रकार योगिजन अपने सब प्रकारसे समृद्ध घरको भी छोड़ देते हैं। शिवजी! वनमें मृगोंके ये यूथ आनन्दित होकर इधर-उधर दौड़ लगाकर, खेल-कूदकर आनन्दित हो रहे हैं और देव! देखिये, नीले बादलोंमें विद्युत् भलीभाँति चमक रही है। लगता है, जलकी वृद्धिको देखकर वीरगण हरे-भरे सुपुष्ट नये वृक्षोंपर विचरण कर रहे हैं। नदियाँ सहसा उद्दाम (बड़े) वेगसे बहने लगीं हैं। चन्द्रशेखर! ऐसे उत्तेजक समयमें यदि असुवृत्त व्यक्तिके फंदेमें आकर स्त्री दुःशील हो जाती है तो इसमें क्या आश्चर्य ॥ १७—२१॥
नीलैश्च मेघैश्च समावृतं नभः<br>पुष्पैश्च सर्जा मुकुलैश्च नीपाः।<br>फलैश्च बिल्वाः पयसा तथापगाः<br>पत्रैः सपद्मैश्च महासरांसि॥ २२<br><br>इतीदृशे शंकर दुःसहेऽद्भुते<br>काले सुरौद्रे ननु ते ब्रवीमि।<br>गृहं कुरुष्वात्र महाचलोत्तमे<br>सुनिर्वृता येन भवामि शंभो॥ २३<br><br>इत्थं त्रिनेत्रः श्रुतिरामणीयकं<br>श्रुत्वा वचो वाक्यमिदं बभाषे।<br>न मेऽस्ति वित्तं गृहसंचयार्थे<br>मृगारिचर्मावरणं मम प्रिये॥ २४<br><br>ममोपवीतं भुजगेश्वरः शुभे<br>कर्णेऽपि पद्मश्च तथैव पिङ्गलः।<br>केयूरमेकं मम कम्बलस्त्वहि-<br>र्द्वितीयमन्यो भुजगो धनंजयः॥ २५आकाश नीले बादलोंसे घिर गया है। इसी प्रकार पुष्पोंके द्वारा सर्ज, मुकुलों (कलियों)-के द्वारा नीप (कदम्ब), फलोंके द्वारा बिल्व-वृक्ष एवं जलके द्वारा नदियाँ और कमल-पुष्पों एवं कमल-पत्रोंसे बड़े-बड़े सरोवर भी ढक गये हैं। हे शंकरजी! ऐसी दुःसह, अद्भुत तथा भयंकर दशामें आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस महान् तथा उत्तम पर्वतपर गृह-निर्माण कीजिये; हे शंभो! जिससे मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँ। कानोंको प्रिय लगनेवाले सतीके इन वचनोंको सुनकर तीन नयनवाले भगवान् शंकरजी बोले—प्रिये! घर बनानेके लिये (और उसकी साज-सज्जाके लिये) मेरे पास धन नहीं है। मैं व्याघ्रके चर्ममात्रसे अपना शरीर ढकता हूँ। शुभे! (सूत्रोंके अभावमें) सर्पराज ही मेरा उपवीत (जनेऊ) बना है। पद्म और पिंगल नामके दो सर्प मेरे दोनों कानोंमें (कुण्डलका काम करते) हैं। कंबल और धनंजय नामके ये दो सर्प मेरी दोनों बाँहोंके बाजूबंद