भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| १२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |

| नागस्तथैवाश्वतरो हि कङ्कणं<br>सव्येतरे तक्षक उत्तरे तथा।<br>नीलोऽपि नीलाञ्जनतुल्यवर्णः<br>श्रोणीतटे राजति सुप्रतिष्ठः॥ २६ | हैं। मेरे दाहिने और बाँयें हाथोंमें भी क्रमशः अश्वतर तथा तक्षक नाग कङ्कण बने हुए हैं। इसी प्रकार मेरी कमरमें नीलाञ्जनके वर्णवाला नील नामका सर्प अवस्थित होकर सुशोभित हो रहा है॥ २२—२६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इति वचनमथोग्रं शंकरात्सा मृडानी<br>ऋतमपि तदसत्यं श्रीमदाकर्ण्य भीता।<br>अवनितलमवेक्ष्य स्वामिनो वासकृच्छ्रात्<br>परिवदति सरोषं लज्जयोच्छ्वस्य चोष्णम्॥ २७ | पुलस्त्यजी बोले— महादेवजीसे इस प्रकार कठोर तथा ओजस्वी एवं सत्य होनेपर भी असत्य प्रतीत हो रहे वचनको सुनकर सतीजी बहुत डर गयीं और स्वामीके निवासकष्टको देखकर गरम साँस छोड़ती हुई और पृथ्वीकी ओर देखती हुई (कुछ) क्रोध और लज्जासे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ २७॥ | | देव्युवाच<br>कथं हि देवदेवेश प्रावृट्कालो गमिष्यति।<br>वृक्षमूले स्थिताया मे सुदुःखेन वदाम्यतः॥ २८ | सतीदेवी बोलीं— देवेश! वृक्षके मूलमें दुःखपूर्वक रहकर भी मेरा वर्षाकाल कैसे व्यतीत होगा! इसीलिये तो मैं आपसे (गृहके निर्माणकी बात) कहती हूँ॥ २८॥ | | शंकर उवाच<br>घनावस्थितदेहायाः प्रावृट्कालः प्रयास्यति।<br>यथाम्बुधारा न तव निपतिष्यन्ति विग्रहे॥ २९ | शंकरजी बोले— देवि! मेघ-मण्डलके ऊपर अपने शरीरको स्थित कर तुम वर्षाकाल भलीभाँति व्यतीत कर सकोगी। इससे वर्षकी जलधाराएँ तुम्हारे शरीरपर नहीं गिर पायेंगी॥ २९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>ततो हरस्तद्धनखण्डमुन्नत-<br>मारुह्य तस्थौ सह दक्षकन्यया।<br>ततोऽभवन्नाम महेश्वरस्य<br>जीमूतकेतुस्त्विति विश्रुतं दिवि॥ ३० | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद महादेवजी दक्षकन्या सतीके साथ आकाशमें उन्नत मेघमण्डलके ऊपर चढ़कर बैठ गये। तभीसे स्वर्गमें उन महादेवजीका नाम 'जीमूतकेतु' या 'जीमूतवाहन' विख्यात हो गया॥ ३०॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ

| पुलस्त्य उवाच<br>ततस्त्रिनेत्रस्य गतः प्रावृट्कालो घनोपरि।<br>लोकानन्दकरी रम्या शरत् समभवन्मुने॥ १<br><br>त्यजन्ति नीलाम्बुधरा नभस्तलं<br>वृक्षांश्च कङ्काः सरितस्तटानि।<br>पद्माः सुगन्धं निलयानि वायसा<br>रुरुर्विषाणं कलुषं जलाशयाः॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार तीन नयनवाले भगवान् शिवका वर्षाकाल मेघोंपर बसते हुए ही व्यतीत हो गया। हे मुने! तत्पश्चात् लोगोंको आनन्द देनेवाली रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी। इस ऋतुमें नीले मेघ आकाशको और बगुले वृक्षोंको छोड़कर अलग हो जाते हैं। नदियाँ भी तटको छोड़कर बहने लगती हैं। इसमें कमलपुष्प सुगन्ध फैलाते हैं, कौवे भी घोसलोंको छोड़ देते हैं। रुरुमृगोंके शृङ्ग गिर पड़ते हैं और जलाशय |