वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १३ विकासमायान्ति च पङ्कजानि चन्द्रांशवो भान्ति लताः सुपुष्पाः। नन्दन्ति हृष्टान्यपि गोकुलानि सन्तश्च सन्तोषमनुव्रजन्ति ॥ ३ सरःसु पद्मा गगने च तारका जलाशयेष्वेव तथा पयांसि । सतां च चित्तं हि दिशां मुखैः समं वैमल्यमायान्ति शशाङ्ककान्तयः ॥ ४ सर्वथा स्वच्छ हो जाते हैं। इस समय कमल विकसित होते हैं, शुभ्र चन्द्रमाकी किरणें आनन्ददायिनी होकर फैल जाती हैं, लताएँ पुष्पित हो जाती हैं, गौवें हृष्ट- पुष्ट होकर आनन्दसे विहरती हैं तथा संतोंको बड़ा सुख मिलता है। तालाबोंमें कमल, गगनमें तारागण, जलाशयोंमें निर्मल जल और दिशाओंके मुखमण्डलके साथ सज्जनोंका चित्त तथा चन्द्रमाकी ज्योति भी सर्वथा स्वच्छ एवं निर्मल हो जाती है ॥ १-४ ॥ एतादृशे हरः काले मेघपृष्ठाधिवासिनीम्। सतीमादाय शैलेन्द्रं मन्दरं समुपायायौ ॥ ५ ततो मन्दरपृष्ठेऽसौ स्थितः समशिलातले। रराम शंभुर्भगवान् सत्या सह महाद्युतिः ॥ ६ ततो व्यतीते शरदि प्रतिबुद्धे च केशवे । दक्षः प्रजापतिश्रेष्ठो यष्टुमारेभत क्रतुम् ॥ ७ ऐसी शरद्-ऋतुमें शंकरजी मेघके ऊपर वास करनेवाली सतीको साथ लेकर श्रेष्ठ मन्दरपर्वतपर पहुँचे और महातेजस्वी (महाकान्तिमान्) भगवान् शंकर मन्दराचलके ऊपरी भागमें एक समतल शिलापर अवस्थित होकर सतीके साथ विश्राम करने लगे। उसके बाद शरद्-ऋतुके बीत जानेपर तथा भगवान् विष्णुके जाग जानेपर प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ दक्षने एक विशाल यज्ञका आयोजन किया। उन्होंने द्वादश आदित्यों तथा कश्यप आदि (ऋषियों)-के साथ ही इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंको भी निमन्त्रित कर उन्हें यज्ञका सदस्य बनाया ॥ ५-८॥ द्वादशैव स चादित्याञ्छक्रादींश्च सुरोत्तमान् । सकश्यपान् समामन्त्र्य सदस्यान् समचीकरत् ॥ ८ अरुन्धत्या च सहितं वसिष्ठं शंसितव्रतम्। सहानसूययात्रिं च सह धृत्या च कौशिकम् ॥ ९ अहल्या गौतमं च भरद्वाजममायया । चन्द्रया सहितं ब्रह्मन्नृषिमङ्गिरसं तथा ॥ १० आमन्त्र्य कृतवान्दक्षः सदस्यान् यज्ञसंसदि। विद्वान् गुणसंपन्नान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ११ धर्मं च स समाहूय भार्ययाऽहिंसया सह । निमन्त्र्य यज्ञवाटस्य द्वारपालत्वमादिशत् ॥ १२ नारदजी! उन्होंने अरुन्धतीसहित प्रशस्तव्रतधारी वसिष्ठको, अनसूयासहित अत्रिमुनिको, धृतिके सहित कौशिक (विश्वामित्र) मुनिको, अहल्याके साथ गौतमको, अमायाके सहित भरद्वाजको और चन्द्राके साथ अङ्गिरा ऋषिको आमन्त्रित किया। विद्वान् दक्षने इन गुणसम्पन्न वेद-वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ऋषियोंको निमन्त्रितकर उन्हें अपने यज्ञमें सदस्य बनाया। और, उन्होंने (प्रजापति दक्षने) यज्ञमें धर्मको भी उनकी पत्नी अहिंसाके साथ निमन्त्रितकर यज्ञमण्डपका द्वारपाल नियुक्त किया ॥ ९-१२ ॥ अरिष्टनेमिनं चक्रे इध्माहरणकारिणम् । भृगुं च मन्त्रसंस्कारे सम्यग् दक्षः प्रयुक्तवान् ॥ १३ तथा चन्द्रमसं देवं रोहिण्या सहितं शुचिम्। धनानामाधिपत्ये च युक्तवान् हि प्रजापतिः ॥ १४ जामातृदुहितॄंश्चैव दौहित्रांश्च प्रजापतिः । सशंकरां सतीं मुक्त्वा मखे सर्वान् न्यमन्त्रयत् ॥ १५ दक्षने अरिष्टनेमिको समिधा लानेका कार्य सौंपा और भृगुको समुचित मन्त्र-पाठमें नियुक्त किया। फिर दक्ष- प्रजापतिने रोहिणीसहित 'अर्थशुचि' चन्द्रमाको कोषाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया। इस प्रकार दक्षप्रजापतिने केवल शंकरसहित सतीको छोड़कर अपने सभी जामाताओं, पुत्रियों एवं दौहित्रोंको यज्ञमें आमन्त्रित किया ॥ १३-१५ ॥ नारद उवाच किमथ लोकपतिना धनाध्यक्षो महेश्वरः। ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि न निमन्त्रितः ॥ १६ नारदजीने कहा (पूछा)- (पुलस्त्यजी महाराज !) लोकस्वामी दक्षने महेश्वरको सबसे बड़े, श्रेष्ठ, वरिष्ठ, सबके आदिमें रहनेवाले एवं समग्र ऐश्वर्योंके स्वामी होनेपर भी (यज्ञमें) क्यों नहीं निमन्त्रित किया ? ॥ १६ ॥