भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ पुलस्त्य उवाच ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि भगवान्छिवः। कपालीति विदित्वेशो दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १७ नारद उवाच किमर्थं देवताश्रेष्ठः शूलपाणिस्त्रिलोचनः । कपाली भगवान् जातः कर्मणा केन शंकरः ॥ १८ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्। प्रोक्तामादिपुराणे च ब्रह्मणाऽव्यक्तमूर्त्तिना ॥ १९ पुरा त्वेकार्णवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्। नष्टचन्द्रार्कनक्षत्रं प्रनष्टपवनानलम् ॥ २० अप्रतर्क्यमविज्ञेयं भावाभावविवर्जितम् । निमग्नपर्वततरू तमोभूतं सुदुर्दर्शम् ॥ २१ तस्मिन् स शेते भगवान् निद्रां वर्षसहस्रिकीम् । रात्र्यन्ते सृजते लोकान् राजसं रूपमास्थितः ॥ २२ राजसः पञ्चवदनो वेदवेदाङ्गपारगः। स्रष्टा चराचरस्यास्य जगतोऽद्भुतदर्शनः ॥ २३ तमोमयस्तथैवान्यः समुद्भूतस्त्रिलोचनः । शूलपाणिः कपर्दी च अक्षमालां च दर्शयन् ॥ २४ ततो महात्मा ह्यसृजदहंकारं सुदारुणम्। येनाक्रान्तावुभौ देवौ तावेव ब्रह्मशंकरौ ॥ २५ अहंकारावृतो रुद्रः प्रत्युवाच पितामहम्। को भवानिह संप्राप्तः केन सृष्टोऽसि मां वद ॥ २६ पितामहोऽप्यहंकारात् प्रत्युवाचाथ को भवान् । भवतो जनकः कोऽत्र जननी वा तदुच्यताम् ॥ २७ इत्यन्योन्यं पुरा ताभ्यां ब्रह्मोशाभ्यां कलिप्रिय । परिवादोऽभवत् तत्र उत्पत्तिर्भवतोऽभवत् ॥ २८ भवानप्यन्तरिक्षं हि जातमात्रस्तदोत्पतत्। धारयनतुलां वीणां कुर्वन् किलकिलाध्वनिम् ॥ २९ पुलस्त्यजीने कहा- (नारदजी !) ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, वरिष्ठ तथा अग्रगणी होनेपर भी भगवान् शिवको कपाली जानकर प्रजापति दक्षने उन्हें (यज्ञमें) निमन्त्रित नहीं किया ॥ १७ ॥ नारदजीने (फिर) पूछा- (महाराज !) देवश्रेष्ठ शूलपाणि, त्रिलोचन भगवान् शंकर किस कर्मसे और किस प्रकार कपाली हो गये, यह बतलायें ॥ १८ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! आप ध्यान देकर सुनें। यह पुरानी कथा आदिपुराणमें अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके द्वारा कही गयी है। (मैं उसी प्राचीन कथाको आपसे कहता हूँ।) प्राचीन समयमें समस्त स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् एकीभूत महासमुद्रमें निमग्न (डूबा हुआ) था। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, वायु एवं अग्नि - किसीका भी कोई (अलग) अस्तित्व नहीं था। 'भाव' एवं 'अभाव' से रहित जगत्की उस समयकी अवस्थाका कोई ठीक- ठीक ज्ञान, विचार, तर्कना या वर्णन सम्भव नहीं है। सभी पर्वत एवं वृक्ष जलमें निमग्न थे तथा सम्पूर्ण जगत् अन्धकारसे व्याप्त एवं दुर्दशाग्रस्त था। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु हजारों वर्षोंकी निद्रामें शयन करते हैं एवं रात्रिके अन्तमें राजस रूप ग्रहणकर वे सभी लोकोंकी रचना करते हैं ॥ १९-२२ ॥ इस चराचरात्मक जगत्का स्रष्टा भगवान् विष्णुका वह अद्भुत राजस स्वरूप पञ्चमुख एवं वेद-वेदाङ्गोंका ज्ञाता था। उसी समय तमोमय, त्रिलोचन, शूलपाणि, कपर्दी तथा रुद्राक्षमाला धारण किया हुआ एक अन्य पुरुष भी प्रकट हुआ। उसके बाद भगवान्ने अतिदारुण अहंकारकी रचना की, जिससे ब्रह्मा तथा शंकर-वे दोनों ही देवता आक्रान्त हो गये। अहंकारसे व्याप्त शिवने ब्रह्मासे कहा- तुम कौन हो और यहाँ कैसे आये हो? तुम मुझे यह भी बतलाओ कि तुम्हारी सृष्टि किसने की है ? ॥ २३-२६ ॥ (फिर) इसपर ब्रह्माने भी अहंकारसे उत्तर दिया- आप भी बतलाइये कि आप कौन हैं तथा आपके माता- पिता कौन हैं? लोक-कल्याणके लिये कलहको प्रिय माननेवाले नारदजी ! इस प्रकार प्राचीनकालमें ब्रह्मा और शंकरके बीच एक-दूसरेसे दुर्विवाद हुआ। उसी समय आपका भी प्रादुर्भाव हुआ। आप उत्पन्न होते ही अनुपम वीणा धारण किये किलकिला शब्द करते हुए अन्तरिक्षकी ओर ऊपर चले गये। इसके बाद भगवान् शिव मानो