वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १५ ततो विनिर्जितः शंभुर्मानिना पद्मयोनिना। तस्थावधोमुखो दीनो ग्राहाक्रान्तो यथा शशी ॥ ३० पराजिते लोकपतौ देवेन परमेष्ठिना। क्रोधान्धकारितं रुद्रं पञ्चमोऽथ मुखोऽब्रवीत् ॥ ३१ अहं ते प्रतिजानामि तमोमूर्ते त्रिलोचन। दिग्वासा वृषभारूढो लोकक्षयकरो भवान् ॥ ३२ इत्युक्तः शंकरः क्रुद्धो वदनं घोरचक्षुषा। निर्दग्धुकामस्त्वनिशं ददर्श भगवानजः ॥ ३३ ततस्त्रिनेत्रस्य समुद्भवन्ति वक्त्राणि पञ्चाथ सुदर्शनानि । श्वेतं च रक्तं कनकावदातं नीलं तथा पिङ्गजटं च शुभ्रम् ॥ ३४ वक्त्राणि दृष्ट्वार्कसमानि सद्यः पैतामहं वक्त्रमुवाच वाक्यम्। समाहतस्याथ जलस्य बुद्बुदा भवन्ति किं तेषु पराक्रमोऽस्ति ॥ ३५ तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना। नखाग्रेण शिरश्छिन्नं ब्राह्मं परुषवादिनम् ॥ ३६ तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत्। पतते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः ॥ ३७ अथ क्रोधावृतेनापि ब्रह्मणाद्भुतकर्मणा। सृष्टस्तु पुरुषो धीमान् कवची कुण्डली शरी ॥ ३८ धनुष्पाणिर्महाबाहुर्बाणशक्तिधरोऽव्ययः । चतुर्भुजो महातूणी आदित्यसमदर्शनः ॥ ३९ स प्राह गच्छ दुर्बुद्धे मा त्वां शूलिन् निपातये। भवान् पापसमायुक्तः पापिष्ठं को जिघांसति ॥ ४० इत्युक्तः शंकरस्तेन पुरुषेण महात्मना । त्रपायुक्तो जगामाथ रुद्रो बदरिकाश्रमम् ॥ ४१ नरनारायणस्थानं पर्वते हि हिमाश्रये। सरस्वती यत्र पुण्या स्यन्दते सरितां वरा ॥ ४२ तत्र गत्वा च तं दृष्ट्वा नारायणमुवाच ह। भिक्षां प्रयच्छ भगवन् महाकापालिकोऽस्मि भोः ॥ ४३ इत्युक्तो धर्मपुत्रस्तु रुद्रं वचनमब्रवीत् । सव्यं भुजं ताडयस्व त्रिशूलेन महेश्वर ॥ ४४ ब्रह्माद्वारा पराजित-से होकर राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान दीन एवं अधोमुख होकर खड़े हो गये ॥ २७-३० ॥ (ब्रह्माके द्वारा) लोकपति (शंकर)-के पराजित हो जानेपर क्रोधसे अन्धे हुए रुद्रसे (श्रीब्रह्माजीके) पाँचवें मुखने कहा - तमोमूर्ति त्रिलोचन ! मैं आपको जानता हूँ। आप दिगम्बर, वृषारोही एवं लोकोंको नष्ट करनेवाले (प्रलयंकारी) हैं। इसपर अजन्मा भगवान् शंकर अपने तीसरे घोर नेत्रद्वारा भस्म करनेकी इच्छासे ब्रह्माके उस मुखको एकटक देखने लगे। तदनन्तर श्रीशंकरके श्वेत, रक्त, स्वर्णिम, नील एवं पिंगल वर्णके सुन्दर पाँच मुख समुद्भूत हो गये ॥ ३१-३४ ॥ सूर्यके समान दीप्त (उन) मुखोंको देखकर पितामहके मुखने कहा - जलमें आघात करनेसे बुद्बुद तो उत्पन्न होते हैं, पर क्या उनमें कुछ शक्ति भी होती है? यह सुनकर क्रोधभरे भगवान् शंकरने ब्रह्माके कठोर भाषण करनेवाले सिरको अपने नखके अग्रभागसे काट डाला; पर वह कटा हुआ ब्रह्माजीका सिर शंकरजीके ही वाम हथेलीपर जा गिरा एवं वह कपाल श्रीशंकरके उस हथेलीसे (इस प्रकार चिपक गया कि गिरानेपर भी) किसी प्रकार न गिरा। इसपर अद्भुतकर्मी ब्रह्माजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने कवच-कुण्डल एवं शर धारण करनेवाले धनुर्धर विशाल बाहुवाले एक पुरुषकी रचना की। वह अव्यय, चतुर्भुज बाण, शक्ति और भारी तरकस धारण किये था तथा सूर्यके समान तेजस्वी दीख पड़ता था ॥ ३५-३९ ॥ उस नये पुरुषने शिवजीसे कहा - दुर्बुद्धि शूलधारी शंकर ! तुम शीघ्र (यहाँसे) चले जाओ, अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा। पर तुम पापयुक्त हो; भला, इतने बड़े पापीको कौन मारना चाहेगा? जब उस महापुरुषने शंकरसे इस प्रकार कहा, तब शिवजी लज्जित होकर हिमालय पर्वतपर स्थित बदरिकाश्रमको चले गये, जहाँ नर-नारायणका स्थान है और जहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ पवित्र सरस्वती नदी बहती है। वहाँ जाकर और उन नारायणको देखकर शंकरने कहा- भगवन् ! मैं महाकापालिक हूँ। आप मुझे भिक्षा दें। ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र (नारायण)-ने रुद्रसे कहा- महेश्वर ! तुम अपने त्रिशूलके द्वारा मेरी बायीं भुजापर ताड़ना करो ॥ ४०-४४ ॥