वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |
| नारायणवचः श्रुत्वा त्रिशूलेन त्रिलोचनः।<br>सव्यं नारायणभुजं ताडयामास वेगवान्॥ ४५<br>त्रिशूलाभिहतान्मार्गात् तिस्रो धारा विनिर्ययुः।<br>एका गगनमाक्रम्य स्थिता ताराभिमण्डिता॥ ४६<br>द्वितीया न्यपतद् भूमौ तां जग्राह तपोधनः।<br>अत्रिस्तस्मात् समुद्भूतो दुर्वासा शंकरांशतः॥ ४७<br>तृतीया न्यपतद्धारा कपाले रौद्रदर्शने।<br>तस्माच्छिशुः समभवत् संनद्धकवचो युवा॥ ४८<br>श्यामावदातः शरचापपाणि-<br>र्गर्जन्न्यथा प्रावृषि तोयदोऽसौ।<br>इत्थं ब्रुवन् कस्य विशातयामि<br>स्कन्धाच्छिरस्तालफलं यथैव॥ ४९ | शिवजीने नारायणकी बात सुनकर त्रिशूलद्वारा बड़े वेगसे उनकी वाम भुजापर आघात किया। त्रिशूलद्वारा (भुजापर) प्रताड़ित मार्गसे जलकी तीन धाराएँ निकल पड़ीं। एक धारा आकाशमें जाकर ताराओंसे मण्डित आकाशगङ्गा हुई; दूसरी धारा पृथ्वीपर गिरी, जिसे तपोधन अत्रिने (मन्दाकिनीके रूपमें) प्राप्त किया। शंकरके उसी अंशसे दुर्वासाका प्रादुर्भाव हुआ। तीसरी धारा भयानक दिखायी पड़नेवाले कपालपर गिरी, जिससे एक शिशु उत्पन्न हुआ। वह (जन्म लेते ही) कवच बाँधे, श्यामवर्णका युवक था। उसके हाथोंमें धनुष और बाण था। फिर वह वर्षाकालमें मेघ-गर्जनके समान कहने लगा—'मैं किसके स्कन्धसे सिरको तालफलके सदृश काट गिराऊँ?'॥ ४५-४९॥ | | तं शंकरोऽभ्येत्य वचो बभाषे<br>चरं हि नारायणबाहुजातम्।<br>निपातयैनं नर दुष्टवाक्यं<br>ब्रह्मात्मजं सूर्यशतप्रकाशम्॥ ५०<br>इत्येवमुक्तः स तु शंकरेण<br>आद्यं धनुस्त्वाजगवं प्रसिद्धम्।<br>जग्राह तूणानि तथाऽक्षयाणि<br>युद्धाय वीरः स मतिं चकार॥ ५१<br>ततः प्रयुद्धौ सुभृशं महाबलौ<br>ब्रह्मात्मजो बाहुभवश्च शार्वः।<br>दिव्यं सहस्रं परिवत्सराणां<br>ततो हरोऽभ्येत्य विरञ्चिमूचे॥ ५२<br>जितस्त्वदीयः पुरुषः पितामहं<br>नरेण दिव्याद्भुतकर्मणा बली।<br>महापृषत्कैरभिपत्य ताडित-<br>स्तदद्भुतं चेह दिशो दशैव॥ ५३<br>ब्रह्मा तमीशं वचनं बभाषे<br>नेहास्य जन्मान्यजितस्य शंभो।<br>पराजितश्चेष्यतेऽसौ त्वदीयो<br>नरो मदीयः पुरुषो महात्मा॥ ५४<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्र-<br>श्चिक्षेप सूर्ये पुरुषं विरिञ्चेः।<br>नरं नरस्यैव तदा स विग्रहे<br>चिक्षेप धर्मप्रभवस्य देवः॥ ५५ | श्रीनारायणकी बाहुसे उत्पन्न उस पुरुषके समीप जाकर श्रीशंकरने कहा—हे नर! तुम सूर्यके समान प्रकाशमान, पर कटुभाषी, ब्रह्मासे उत्पन्न इस पुरुषको मार डालो। शंकरजीके ऐसा कहनेपर उस वीर नरने प्रसिद्ध आजगव नामका धनुष एवं अक्षय तूणीर ग्रहणकर युद्धका निश्चय किया। उसके बाद ब्रह्मात्मज और नारायणकी भुजासे उत्पन्न दोनों नरोंमें सहस्र दिव्य वर्षोंतक प्रबल युद्ध होता रहा। तत्पश्चात् श्रीशंकरजीने ब्रह्माके पास जाकर कहा—पितामह! यह एक अद्भुत बात है कि दिव्य एवं अद्भुत कर्मवाले (मेरे) नरने दसों दिशाओंमें व्याप्त महान् बाणोंके प्रहारसे ताडित कर आपके पुरुषको जीत लिया। ब्रह्माने उस ईशसे कहा कि इस अजितका जन्म यहाँ दूसरोंद्वारा पराजित होनेके लिये नहीं हुआ है। यदि किसीको पराजित कहा जाना अभीष्ट है तो यह तेरा नर ही है। मेरा पुरुष तो महाबली है—ऐसा कहे जानेपर श्रीशंकरजीने ब्रह्माजीके पुरुषको सूर्यमण्डलमें फेंक दिया तथा उन्हीं शंकरने उस नरको धर्मपुत्र नरके शरीरमें फेंक दिया॥ ५०-५५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥