भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १७ तीसरा अध्याय शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना पुलस्त्य उवाच ततः करतले रुद्रः कपाले दारुणे स्थिते। संतापमगमद् ब्रह्मंश्चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः॥ १ ततः समागता रौद्रा नीलाञ्जनचयप्रभा। संरक्तमूर्द्धजा भीमा ब्रह्महत्या हरान्तिकम्॥ २ तामागतां हरो दृष्ट्वा पप्रच्छ विकरालिनीम्। काऽसि त्वमागता रौद्रे केनाप्यर्थेन तद्वद॥ ३ कपालिनमथोवाच ब्रह्महत्या सुदारुणा। ब्रह्मवध्याऽस्मि सम्प्राप्ता मां प्रतीच्छ त्रिलोचन ॥ ४ इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्महत्या विवेश ह। त्रिशूलपाणिनं रुद्रं सम्प्रतापितविग्रहम्॥ ५ ब्रह्महत्याभिभूतश्च शर्वो बदरिकाश्रमम्। आगच्छन्न ददर्शाथ नरनारायणावृषी ॥ ६ अदृष्ट्वा धर्मतनयौ चिन्ताशोकसमन्वितः । जगाम यमुनां स्नातुं साऽपि शुष्कजलाऽभवत् ॥ ७ कालिन्दीं शुष्कसलिलां निरीक्ष्य वृषकेतनः। प्लक्षजां स्नातुमगमदन्तर्द्धानं च सा गता॥ ८ ततो नु पुष्करारण्यं मागधारण्यमेव च। सैन्धवारण्यमेवासौ गत्वा स्नातो यथेच्छया ॥ ९ तथैव नैमिषारण्यं धर्मारण्यं तथेश्वरः। स्नातो नैव च सा रौद्रा ब्रह्महत्या व्यमुञ्चत ॥ १० सरित्सु तीर्थेषु तथाश्रमेषु पुण्येषु देवायतनेषु शर्वः। समायुतो योगयुतोऽपि पापा- न्नावाप मोक्षं जलध्वजोऽसौ ॥ ११ ततो जगाम निर्विण्णः शंकरः कुरुजाङ्गलम्। तत्र गत्वा ददर्शार्थ चक्रपाणिं खगध्वजम् ॥ १२ तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्। कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हरः स्तोत्रमुदीरयत्॥ १३ पुलस्त्यजी बोले- नारदजी ! तत्पश्चात् शिवजीको अपने करतलमें भयंकर कपालके सट जानेसे बड़ी चिन्ता हुई। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं। उन्हें बड़ा संताप हुआ। उसके बाद कालिखके समान नीले रंगकी, रक्तवर्णके केशवाली भयंकर ब्रह्महत्या शंकरके निकट आयी। उस विकराल रूपवाली स्त्रीको आयी देखकर शंकरजीने पूछा - ओ भयावनी स्त्री ! यह बतलाओ कि तुम कौन हो एवं किसलिये यहाँ आयी हो ? इसपर उस अत्यन्त दारुण ब्रह्महत्याने उनसे कहा - मैं ब्रह्महत्या हूँ; हे त्रिलोचन ! आप मुझे स्वीकार करें- इसलिये यहाँ आयी हूँ ॥ १-४॥ ऐसा कहकर ब्रह्महत्या संतापसे जलते शरीरवाले त्रिशूलपाणि शिवके शरीरमें समा गयी। ब्रह्महत्यासे अभिभूत होकर श्रीशंकर बदरिकाश्रममें आये; किंतु वहाँ नर एवं नारायण ऋषियोंके उन्हें दर्शन नहीं हुए। धर्मके उन दोनों पुत्रोंको वहाँ न देखकर वे चिन्ता और शोकसे युक्त हो यमुनाजीमें स्नान करने गये; परंतु उसका जल भी सूख गया। यमुनाजीको निर्जल देखकर भगवान् शंकर सरस्वतीमें स्नान करने गये; किंतु वह भी लुप्त हो गयी ॥ ५-८ ॥ फिर पुष्करारण्य, मागधारण्य और सैन्धवारण्यमें जाकर उन्होंने बहुत समयतक स्नान किया। उसी प्रकार वे नैमिषारण्य तथा सिद्धपुरमें भी गये और स्नान किये; फिर भी उस भयंकर ब्रह्महत्याने उन्हें नहीं छोड़ा। जीमूतकेतु शंकरने अनेक नदियों, तीर्थों, आश्रमों एवं पवित्र देवायतनोंकी यात्रा की; पर योगी होनेपर भी वे पापसे मुक्ति न प्राप्त कर सके। तत्पश्चात् वे खिन्न होकर कुरुक्षेत्र गये। वहाँ जाकर उन्होंने गरुडध्वज चक्रपाणि (विष्णु) -को देखा और उन शङ्ख-चक्र- गदाधारी पुण्डरीकाक्ष (श्रीनारायण) -का दर्शनकर वे हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- ॥ ९-१३॥