वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३ | | :--- | :--- |
| हर उवाच | भगवान् शंकर बोले— हे देवताओंके स्वामी! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज! आपको प्रणाम है। शङ्ख-चक्र-गदाधारी वासुदेव! आपको नमस्कार है। निर्गुण, अनन्त एवं अतर्कनीय विधाता! आपको नमस्कार है। ज्ञानाज्ञानस्वरूप, स्वयं निराश्रय किंतु सबके आश्रय! आपको नमस्कार है। रजोगुण, सनातन, ब्रह्ममूर्ति! आपको नमस्कार है। नाथ! आपने इस सम्पूर्ण चराचर विश्वकी रचना की है। सत्त्वगुणके आश्रय लोकेश! विष्णुमूर्ति, अधोक्षज, प्रजापालक, महाबाहु, जनार्दन! आपको नमस्कार है। हे तमोमूर्ति! मैं आपके अंशभूत क्रोधसे उत्पन्न हूँ। हे महान् गुणवाले सर्वव्यापी देवेश! आपको नमस्कार है॥ १४–१८॥ | | नमस्ते देवतानाथ नमस्ते गरुडध्वज।<br>शङ्खचक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ १४ | | | नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रतर्क्याय वेधसे।<br>ज्ञानाज्ञान निरालम्ब सर्वालम्ब नमोऽस्तु ते॥ १५ | | | रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन।<br>त्वया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम्॥ १६ | | | सत्त्वाधिष्ठित लोकेश विष्णुमूर्ते अधोक्षज।<br>प्रजापाल महाबाहो जनार्दन नमोऽस्तु ते॥ १७ | | | तमोमूर्ते अहं ह्येष त्वदंशक्रोधसंभवः।<br>गुणाभियुक्त देवेश सर्वव्यापिन् नमोऽस्तु ते॥ १८ | | | भूरियं त्वं जगन्नाथ जलाम्बरहुताशनः।<br>वायुर्बुद्धिर्मनश्चापि शर्वरी त्वं नमोऽस्तु ते॥ १९ | जगन्नाथ! आप ही पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु, बुद्धि, मन एवं रात्रि हैं; आपको नमस्कार है। ईश्वर! आप ही धर्म, यज्ञ, तप, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, सरलता, क्षमा, दान, दया, लक्ष्मी एवं ब्रह्मचर्य हैं। हे ईश! आप अङ्गोंसहित चतुर्वेदस्वरूप, वेद्य एवं वेदपारगामी हैं। आप ही उपवेद हैं तथा सभी कुछ आप ही हैं; आपको नमस्कार है। अच्युत! चक्रपाणि! आपको बारंबार नमस्कार है। मीनमूर्तिधारी (मत्स्यावतारी) माधव! आपको नमस्कार है। मैं आपको लोकमें दयालु मानता हूँ। केशव! आप मेरे शरीरमें स्थित ब्रह्महत्यासे उत्पन्न अशुभको नष्ट कर मुझे पाप-बन्धनसे मुक्त करें। बिना विचार किये कार्य करनेवाला मैं दग्ध एवं नष्ट हो गया हूँ। आप साक्षात् तीर्थ हैं, अतः आप मुझे पवित्र करें। आपको बारंबार नमस्कार है॥ १९–२३॥ | | धर्मो यज्ञस्तपः सत्यमहिंसा शौचमार्जवम्।<br>क्षमा दानं दया लक्ष्मीर्ब्रह्मचर्यं त्वमीश्वर॥ २० | | | त्वं साङ्गाश्चतुरो वेदास्त्वं वेद्यो वेदपारगः।<br>उपवेदा भवानीश सर्वोऽसि त्वं नमोऽस्तु ते॥ २१ | | | नमो नमस्तेऽच्युत चक्रपाणे<br>नमोऽस्तु ते माधव मीनमूर्ते।<br>लोके भवान् कारुणिको मतो मे<br>त्रायस्व मां केशव पापबन्धात्॥ २२ | | | ममाशुभं नाशय विग्रहस्थं<br>यद् ब्रह्महत्याऽभिभवं बभूव।<br>दग्धोऽस्मि नष्टोऽस्म्यसमीक्ष्यकारी<br>पुनीहि तीर्थोऽसि नमो नमस्ते॥ २३ | | | पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजीने कहा— भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार स्तुत होनेपर चक्रधारी भगवान् विष्णु शंकरकी ब्रह्महत्याको नष्ट करनेके लिये उनसे वचन बोले— ॥ २४॥ | | इत्थं स्तुतश्चक्रधरः शंकरेण महात्मना।<br>प्रोवाच भगवान् वाक्यं ब्रह्महत्याक्षयाय हि॥ २४ | | | हरिरुवाच | भगवान् विष्णु बोले— महेश्वर! आप ब्रह्महत्याको नष्ट करनेवाली मेरी मधुर वाणी सुनें। यह शुभप्रद एवं पुण्यको बढ़ानेवाली है। | | महेश्वर शृणुष्वेमां मम वाचं कलस्वनाम्।<br>ब्रह्महत्याक्षयकरीं शुभदां पुण्यवर्धनीम्॥ २५ | | | योऽसौ प्राङ्मण्डले पुण्ये मदंशप्रभवोऽव्ययः।<br>प्रयागे वसते नित्यं योगशायीति विश्रुतः॥ २६ | यहाँसे पूर्व प्रयागमें मेरे अंशसे उत्पन्न 'योगशायी' नामसे विख्यात देवता हैं। वे अव्यय—विकाररहित पुरुष हैं। वहाँ उनका नित्य निवास है। वहींसे उनके दक्षिण चरणसे 'वरणा' नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ नदी निकली है। वह | | चरणाद् दक्षिणात्तस्य विनिर्याता सरिद्वरा।<br>विश्रुता वरणेत्येव सर्वपापहरा शुभा॥ २७ | |