वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १९ सव्यादन्या द्वितीया च असिरित्येव विश्रुता। सब पापोंको हरनेवाली एवं पवित्र है। वहीं उनके वाम ते उभे तु सरिच्छ्रेष्ठे लोकपूज्ये बभूवतुः ॥ २८ पादसे 'असि' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी निकली है। ये दोनों नदियाँ श्रेष्ठ एवं लोकपूज्य हैं ॥ २५-२८ ॥ ताभ्यां मध्ये तु यो देशस्तत्क्षेत्रं योगशायिनः । उन दोनोंके मध्यका प्रदेश योगशायीका क्षेत्र है। त्रैलोक्यप्रवरं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम्। वह तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा सभी पापोंसे छुड़ा न तादृशोऽस्ति गगने न भूम्यां न रसातले ॥ २९ देनेवाला तीर्थ है। उसके समान अन्य कोई तीर्थ तत्रास्ति नगरी पुण्या ख्याता वाराणसी शुभा। आकाश, पृथ्वी एवं रसातलमें नहीं है। ईश! वहाँ पवित्र यस्यां हि भोगिनोऽपीश प्रयान्ति भवतो लयम् ॥ ३० शुभप्रद विख्यात वाराणसी नगरी है, जिसमें भोगी लोग विलासिनीनां रशनास्वनेन भी आपके लोकको प्राप्त करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी श्रुतिस्वनैर्ब्राह्मणपुंगवानाम् । वेदध्वनि विलासिनी स्त्रियोंकी करधनीकी ध्वनिसे शुचिस्वरत्वं गुरवो निशम्य मिश्रित होकर मङ्गल स्वरका रूप धारण करती है। उस हास्यादशासन्त मुहुर्मुहुस्तान् ॥ ३१ ध्वनिको सुनकर गुरुजन बारंबार उपहासपूर्वक उनका व्रजत्सु योषित्सु चतुष्पथेषु शासन करते हैं। जहाँ चौराहोंपर भ्रमण करनेवाली पदान्यलक्तारुणितानि दृष्ट्वा । स्त्रियोंके अलक्त (महावर) - से अरुणित चरणोंको देखकर ययौ शशी विस्मयमेव यस्यां चन्द्रमाको स्थल-पद्मिनीके चलनेका भ्रम हो जाता है किंस्वित् प्रयाता स्थलपद्मिनीयम् ॥ ३२ और जहाँ रात्रिका आरम्भ होनेपर ऊँचे-ऊँचे देवमन्दिर तुङ्गानि यस्यां सुरमन्दिराणि चन्द्रमाका (मानो) अवरोध करते हैं एवं दिनमें पवनान्दोलित रुन्धन्ति चन्द्रं रजनीमुखेषु। (हवासे फहरा रही) दीर्घ पताकाओंसे सूर्य भी छिपे दिवाऽपि सूर्यं पवनाप्लुताभि- रहते हैं ॥ २९-३३ ॥ दीर्घाभिरेवं सुपताकिकाभिः ॥ ३३ भृङ्गाश्च यस्यां शशिकान्तभित्तौ जिस (वाराणसी) - में चन्द्रकान्तमणिकी भित्तियोंपर प्रलोभ्यमानाः प्रतिबिम्बितेषु। प्रतिबिम्बित चित्रमें निर्मित स्त्रियोंके निर्मल मुख- आलेख्ययोषिद्विमलाननाब्जे- कमलोंको देखकर भ्रमर उनपर भ्रमवश लुब्ध हो जाते ष्पीयूर्भ्रमान्नैव च पुष्पकान्तरम् ॥ ३४ हैं और दूसरे पुष्पोंकी ओर नहीं जाते। हे शम्भो ! वहाँ सम्मोहनलेखनसे पराजित पुरुषोंमें तथा घरकी बावलियोंमें परिभ्रमंश्चापि पराजितेषु जलक्रीड़ाके लिये एकत्र हुई स्त्रियोंमें ही 'भ्रमण' देखा नरेषु संमोहनलेखनेन । जाता है, अन्यत्र किसीको 'भ्रमण' (चक्कर रोग) नहीं यस्यां जलक्रीडनसङ्गतासु होता*। द्यूतक्रीडा (जुआके खेल) - के पासोंके सिवाय अन्य कोई भी दूसरेके 'पाश' (बन्धन) - में नहीं डाला न स्त्रीषु शंभो गृहदीर्घिकासु ॥ ३५ जाता तथा सुरत-समयके सिवाय स्त्रियोंके साथ कोई न चैव कश्चित् परमन्दिराणि आवेगयुक्त पराक्रम नहीं करता। जहाँ हाथियोंके बन्धनमें रुणद्धि शंभो सहसा ऋतेऽक्षान्। ही पाशग्रन्थि (रस्सीकी गाँठ) होती है, उनकी मदच्युतिमें न चाबलानां तरसा पराक्रमं (मदके चूनेमें) ही 'दानच्छेद' (मदकी धाराका टूटना) एवं नर हाथियोंके यौवनागममें ही 'मान' और 'मद' करोति यस्यां सुरतं हि मुक्त्वा ॥ ३६ होते हैं, अन्यत्र नहीं; तात्पर्य यह कि दान देनेकी धारा पाशग्रन्थिर्गजेन्द्राणां दानच्छेदो मदच्युतौ । निरन्तर चलती रहती है और अभिमानी एवं मदवाले यस्यां मानमदौ पुंसां करिणां यौवनागमे ॥ ३७ लोग नहीं हैं ॥ ३४-३७ ॥
- यहाँ सर्वत्र परिसंख्यालंकार है। परिसंख्यालंकार वहाँ होता है, जहाँ किसी वस्तुका एक स्थानसे निषेध करके उसका दूसरे स्थानमें स्थापन हो। ऐसा वर्णन आनन्दरामायणके अयोध्या-वर्णनमें, कादम्बरीमें, काशीखण्डमें काशी आदिके वर्णनमें भी प्राप्त होता है।