वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३ |
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| प्रियदोषाः सदा यस्यां कौशिका नेतरे जनाः।<br>तारागणेऽकुलीनत्वं गद्ये वृत्तच्युतिर्विभो ॥ ३८<br><br>भूतिलुब्धा विलासिन्यो भुजंगपरिवारिताः।<br>चन्द्रभूषितदेहाश्च यस्यां त्वमिव शंकर ॥ ३९<br><br>ईदृशायां सुरेशान वाराणस्यां महाश्रमे।<br>वसते भगवाँल्लोलः सर्वपापहरो रविः ॥ ४०<br><br>दशाश्वमेधं यत्प्रोक्तं मदंशो यत्र केशवः।<br>तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठ पापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४१ | विभो! जहाँ उलूक ही सदा दोषा (रात्रि)-प्रिय होते हैं, अन्य लोग दोषोंके प्रेमी नहीं हैं। तारागणोंमें ही अकुलीनता (पृथ्वीमें न छिपना) है, लोगोंमें कहीं अकुलीनताका नाम नहीं है; गद्यमें ही वृत्तच्युति (छन्दोभङ्ग) होती है, अन्यत्र वृत्त (चरित्र)-च्युति नहीं दीखती। शंकर! जहाँकी विलासिनियाँ आपके सदृश (भस्म) 'भूतिलुब्धा' 'भुजंग (सर्प)-परिवारिता' एवं 'चन्द्रभूषितदेहा' होती हैं। (यहाँ पक्षान्तरमें—विलासिनियोंके पक्षमें—संगतिके लिये, 'भूति' पद 'भस्म' और 'धन' के अर्थमें, 'भुजङ्ग' पद 'सर्प' एवं 'जार' के अर्थमें तथा 'चन्द्र' पद 'चन्द्राभूषण' के अर्थमें प्रयुक्त हैं।)<br>सुरेशान! इस प्रकारकी वाराणसीके महान् आश्रममें सभी पापोंको दूर करनेवाले भगवान् 'लोल' नामके सूर्य निवास करते हैं। सुरश्रेष्ठ! वहीं दशाश्वमेध नामका स्थान है तथा वहीं मेरे अंशस्वरूप केशव स्थित हैं। वहाँ जाकर आप पापसे छुटकारा प्राप्त करेंगे॥ ३८-४१॥ |
| इत्येवमुक्तो गरुडध्वजेन<br>वृषध्वजस्तं शिरसा प्रणम्य।<br>जगाम वेगाद् गरुडो यथाऽसौ<br>वाराणसीं पापविमोचनाय ॥ ४२<br>गत्वा सुपुण्यां नगरीं सुतीर्थां<br>दृष्ट्वा च लोलं सदशाश्वमेधम्।<br>स्नात्वा च तीर्थेषु विमुक्तपापः<br>स केशवं द्रष्टुमुपाजगाम ॥ ४३<br>केशवं शंकरो दृष्ट्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्।<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश ब्रह्महत्या क्षयं गता ॥ ४४<br>नेदं कपालं देवेश मद्धस्तं परिमुञ्चति।<br>कारणं वेद्मि न च तदेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥ ४५ | भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर वे पाप छुड़ानेके लिये गरुड़के समान तेज वेगसे वाराणसी गये। वहाँ परमपवित्र तथा तीर्थभूत नगरीमें जाकर दशाश्वमेधके साथ 'असी' स्थानमें स्थित भगवान् लोलार्कका* दर्शन किया तथा (वहाँके) तीर्थोंमें स्नान कर और पाप-मुक्त होकर वे (वरुणासंगमपर) केशवका दर्शन करने गये। उन्होंने केशवका दर्शन करके प्रणामकर कहा—हृषीकेश! आपके प्रसादसे ब्रह्महत्या तो नष्ट हो गयी, पर देवेश! यह कपाल मेरे हाथको नहीं छोड़ रहा है। इसका कारण मैं नहीं जानता। आप ही मुझे यह बतला सकते हैं॥ ४२-४५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>महादेववचः श्रुत्वा केशवो वाक्यमब्रवीत्।<br>विद्यते कारणं रुद्र तत्सर्वं कथयामि ते ॥ ४६<br>योऽसौ ममाग्रतो दिव्यो ह्रदः पद्मोत्पलैर्युतः।<br>एष तीर्थवरः पुण्यो देवगन्धर्वपूजितः ॥ ४७<br>एतस्मिन्प्रवरे तीर्थे स्नानं शंभो समाचर।<br>स्नातमात्रस्य चाद्यैव कपालं परिमोक्ष्यति ॥ ४८ | **पुलस्त्यजी बोले—**महादेवका वचन सुनकर केशवने यह वाक्य कहा—रुद्र! इसके समस्त कारणोंको मैं तुम्हें बतलाता हूँ। मेरे सामने कमलोंसे भरा यह जो दिव्य सरोवर है, यह पवित्र तथा तीर्थोंमें श्रेष्ठ है एवं देवताओं तथा गन्धर्वोंसे पूजित है। शिवजी! आप इस परम श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करें। स्नान करनेमात्रसे आज ही यह कपाल (आपके हाथको) छोड़ देगा। इससे रुद्र! संसारमें आप |
* लोलार्कके सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये देखिये सूर्याङ्कके ३०८वें से ३१०वें पृष्ठतक प्रकाशित विवरण।