भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य १९९ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणजी बोले- सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च। रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना तीर्थका वर्णन करता हूँ। ब्रह्माने पहले कहा था कि तीर्थं महत् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४९ वह 'संनिहित' सरोवर 'रन्तुक' नामक स्थानसे लेकर रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् । 'औजस' नामक स्थानतक तथा 'पावन' से 'चतुर्मुख' सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥ ५० तक फैला हुआ है। ब्राह्मणश्रेष्ठो ! किंतु अब कलि कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना । और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥ ५१ जो (वर्तमान) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग सुनें। 'विश्वेश्वर' स्थानसे 'अस्थिपुर' तक और 'वृद्धा- विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी। कन्या' से लेकर 'ओघवती' नदीतक यह सरोवर यावदोधवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥ ५२ स्थित है ॥ ४९-५२॥ मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने । ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ५३ सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको सुनें। विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती। सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन (दो कोसों)-में सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ५४ फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये। मोक्षकी इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः । लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥ ५५ स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं। योगेश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना । इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्के पालनकी विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ५६ कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३-५६ ॥ रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना । (इसी प्रकार) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ ५७ रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी (उन) हरको स्थाणुत्व (स्थिरत्व) प्राप्त हुआ। आदिमें आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामह्रदः स्मृतः । यह 'ब्रह्मवेदी' कहा गया था, किंतु आगे चलकर कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ ५८ इसका नाम 'रामह्रद' हुआ। उसके बाद राजर्षि कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम 'कुरुक्षेत्र' पड़ा। तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् । रामह्रद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ ५९ कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥