वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २३ ] वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना १२१ चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे। प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु। स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥ ११ फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया। सभी राजा (भलीभाँति) प्रजापालन करते हुए सुशोभित होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने- अपने धर्मका पालन करने लगे। ऐसे समयमें असुरोंने बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया। असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद (जय-जयकार) करने लगा। इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलिके समीप आयीं ॥ ११-१३॥ अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा। हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥ १२ अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा। पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३ श्रीरुवाच बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते। प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४ लक्ष्मीने कहा - बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी दैत्यराज बलि ! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है। इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी हूँ। दानव ! असुरोंके स्वामी ! हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है - इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। राजन् ! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट (प्रभावशाली) हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका भोग कर रहे हैं ॥ १४-१७॥ यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् । दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५ नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले। प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥ १६ विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः । येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७ दैत्यराज बलिसे ऐसा कहनेके बाद सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य एवं (सबको) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा बलिमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - ह्री, कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या, महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न होकर दैत्येन्द्र (बलि) - का सेवन करने लगीं। इस प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर-अचरवाले त्रिलोकीका अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥ एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् । प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥ १८ तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्युतिरेव च। प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९ श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया । सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥ २० प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम्। प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥