भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 132

१२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २४ चौबीसवाँ अध्याय वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा - आप हमें यह बतलायें कि देवानां ब्रूहि नः कर्म यद्वृत्तास्ते पराजिताः । देवताओंने कौन-सा कर्म किया, जिससे प्रभावित कथं देवाधिदेवोऽसौ विष्णुर्वामनतां गतः ॥ १ होकर वे (दैत्य) पराजित हुए तथा देवाधिदेव भगवान् विष्णु कैसे वामन (बौना) बने ॥ १ ॥ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया) - इन्द्रदेवने बलिसंस्थं च त्रैलोक्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः । जब तीनों लोकोंको बलिके अधिकारमें देखा तब वे मेरुपृस्थं ययौ शक्रः स्वमातुर्निलयं शुभम् ॥ २ मेरु (पर्वत) - पर स्थित (रहनेवाली) अपनी कल्याणमयी माताके घर गये। माताके समीप जाकर उन्होंने उनसे समीपं प्राप्य मातुश्च कथयामास तां गिरम् । (मातासे) यह बात कही - जिससे देवगण युद्धमें दानव आदित्याश्च यथा युद्धे दानवेन पराजिताः ॥ ३ बलिसे पराजित हुए थे ॥ २-३ ॥ अदितिरुवाच (माता) अदितिने कहा- पुत्र ! यदि ऐसी बात यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे । है तो तुमलोग सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ मिलकर भी बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ संग्राममें विरोचनके पुत्र बलिको नहीं मार सकते। सहस्राक्ष ! युद्धमें केवल हजारों सिरवाले (सहस्रशीर्षा) सहस्रशिरसा शक्यः केवलं हन्तुमाहवे । भगवान् विष्णु ही (उसे) मार सकते हैं। उनके सिवा तेनैकेन सहस्त्राक्ष न स ह्यन्येन शक्यते ॥ ५ किसी दूसरेसे वह नहीं मारा जा सकता। अतः इस विषयमें उस महान् आत्मा (महाबलवान्) बलि नामक तद्गत् पृच्छामि पितरं कश्यपं ब्रह्मवादिनम् । दैत्यकी पराजयके लिये मैं तुम्हारे पिता ब्रह्मवादी पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ कश्यपसे (उपाय) पूछूँगी ॥ ४-६ ॥ ततोऽदित्या सह सुराः संप्राप्ताः कश्यपान्तिकम् । इस प्रकार माता अदितिके कहनेपर सभी देवता तत्रापश्यन्त मारीचं मुनिं दीप्ततपोनिधिम् ॥ ७ उनके साथ कश्यपजीके पास पहुँच गये। वहाँ (जाकर आद्यं देवगुरुं दिव्यं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा । उन लोगोंने) तपस्याके धनी, मरीचिके पुत्र, आद्य एवं तेजसा भास्कराकारं स्थितमग्निशिखोपमम् ॥ ८ दिव्य पुरुष, देवताओंके गुरु, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान और अपने तेजसे सूर्यके समान तेजस्वी, अग्निशिखाकी न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनाम्बरम् । भाँति दीप्त, संन्यासीके रूपमें, तपोयुक्त वल्कल तथा वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तमिव तेजसा ॥ ९ मृगचर्म धारण किये हुए (आहुतिके) घीकी गन्धसे हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यगन्धपुरस्कृतम् । आप्यायित (वासित) अग्निके समान जलते हुए, स्वाध्यायमें स्वाध्यायवन्तं पितरं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० लगे हुए मानो शरीरधारी अग्नि ही हों एवं ब्रह्मवादी, ब्रह्मवादिसत्यवादिसुरासुरगुरुं प्रभुम् । सत्यवादी देवों तथा दानवोंके गुरु, अनुपम ब्रह्मतेजसे ब्राह्मण्याऽप्रतिमं लक्ष्म्या कश्यपं दीप्ततेजसम् ॥ ११ पूर्ण एवं शोभासे दीप्त कश्यपजीको देखा ॥ ७-११ ॥ वे (देवताओंके पिता श्रीकश्यपजी) सभी लोकोंके यः स्रष्टा सर्वलोकानां प्रजानां पतिरुत्तमः । रचनेवाले, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आत्मभाव अर्थात् आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ अध्यात्मतत्त्वकी विज्ञताकी विशिष्टताके कारण ऐसे लग