वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २४] वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना १२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३<br><br>अजेयो युधि शक्रेण बलिर्दैत्यो बलाधिकः ।<br>तस्माद् विधत्त नः श्रेयो देवानां पुष्टिवर्धनम् ॥ १४<br><br>श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपः प्रभुः ।<br>अकरोद् गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ | रहे थे जैसे तीसरे प्रजापति ही हों। फिर अदितिके साथ समस्त देववीर उन्हें प्रणाम कर उनसे हाथ जोड़कर ऐसे बोले जैसे ब्रह्मासे उनके मानस-पुत्र बोलते हैं— बलशाली दैत्यराज बलि युद्धमें इन्द्रसे अपराजेय हो गया है। अतः हम देवोंके सामर्थ्यकी पुष्टि-वृद्धिके लिये आप कल्याणकारी उपाय करें। उन पुरुषोंकी बातें सुनकर लोकोंको रचनेवाले सामर्थ्यशाली कश्यपने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया॥ १२—१५॥ |
| कश्यप उवाच<br>शक्र गच्छाम सदनं ब्रह्मणः परमाद्भुतम् ।<br>तथा पराजयं सर्वे ब्रह्मणः ख्यातुमुद्यताः ॥ १६<br><br>सहादित्या ततो देवा याताः काश्यपमाश्रमम् ।<br>प्रस्थिता ब्रह्मसदनं महर्षिगणसेवितम् ॥ १७<br><br>ते मुहूर्तेन संप्राप्ता ब्रह्मलोकं सुवर्चसः ।<br>दिव्यैः कामगमैर्यानैर्यथार्हस्ते महाबलाः ॥ १८<br><br>ब्रह्माणं द्रष्टुमिच्छन्तस्तपोराशिनमव्ययम् ।<br>अध्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम् ॥ १९ | (फिर) कश्यपने कहा— इन्द्र! हम सभी अपनी पराजयकी बात ब्रह्माजीसे कहनेके लिये तैयार होकर उनके परम अद्भुत लोकको चलें। कश्यपके इस प्रकार कहनेपर अदितिके साथ कश्यपके आश्रममें आये हुए सभी देवताओंने महर्षिगणोंसे सेवित ब्रह्मसदनकी ओर प्रस्थान किया। यथायोग्य इच्छाके अनुसार चलनेवाले दिव्य यानोंसे महाबली एवं तेजस्वी वे सभी देवता क्षणमात्रमें ही ब्रह्मलोकमें पहुँच गये और तब वे लोग तपराशि अव्यय ब्रह्माको देखनेकी इच्छा करते हुए ब्रह्माकी विशाल परम श्रेष्ठ सभामें पहुँचे॥ १६—१९॥ |
| षट्पदोद्गीतमधुरां सामगैः समुदीरिताम् ।<br>श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुस्तदा ॥ २०<br><br>ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रोक्ताः क्रमपदाक्षराः ।<br>शुश्रुवुर्विबुधव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २१<br><br>यज्ञविद्यावेदविदः पदक्रमविदस्तथा ।<br>स्वरेण परमर्षीणां सा बभूव प्रणादिता ॥ २२<br><br>यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।<br>छन्दसां चैव चार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥ २३<br><br>लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वरमीरितम् ।<br>तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा नियताः शंसितव्रताः ॥ २४<br><br>जपहोमपरा मुख्या ददृशुः कश्यपात्मजाः ।<br>तस्यां सभायामास्ते स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २५ | वे (देवतालोग) भ्रमरोंकी गुञ्जारसे गुञ्जित, सामगानसे मुखरित, कल्याणकी विधायिका और शत्रुओंका विनाश करनेवाली उस सभाको देखकर प्रसन्न हो गये। (उस स्थानपर) उन श्रेष्ठ देवगणोंने विस्तृत (विशाल) अनेक कर्मानुष्ठानोंके समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियोंके द्वारा 'क्रमपदादि' (वेद पढ़नेकी विशिष्ट शैलियोंसे) उच्चरित ऋचाओं (वेदमन्त्रों)-को सुना। वह सभा यज्ञविद्याके ज्ञाता एवं 'पदक्रम' प्रभृति वेदपाठके ज्ञानवाले परमर्षियोंके उच्चारणकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हो रही थी। देवोंने वहाँ यज्ञके संस्तवोंके ज्ञाताओं, शिक्षाविदों और वेदमन्त्रोंके अर्थ जाननेवालों, समस्त विद्याओंमें पारङ्गत द्विजों एवं श्रेष्ठ लोकायतिकोंके (चार्वाकके मतानुयायियों)-द्वारा उच्चरित स्वरको भी सुना। कश्यपके पुत्रोंने वहाँ सर्वत्र नियमपूर्वक तीर्थ-व्रतको धारण करनेवाले जप-होम करनेमें लगे हुए श्रेष्ठ विप्रोंको देखा। उसी सभामें लोक-पितामह ब्रह्मा विराजमान थे॥ २०—२५॥ |
| सुरासुरगुरुः श्रीमान् विद्यया वेदमायया ।<br>उपासन्त च तत्रैव प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥ २६ | (उस) सभामें वेदमाया विद्यासे सम्पन्न, सुरों एवं असुरोंके गुरु (श्रीमान् ब्रह्माजी) भी उपस्थित थे। प्रजापतिगण उन (प्रभुता-सम्पन्न) प्रभुकी उपासना कर |