भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 489 में से

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पृष्ठ 136

१२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा। प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥ १४ भगवान्नेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः। उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥ १५ देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च। तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम्। श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥ १६ तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम्। यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥ १७ और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और वरकी याचना करेंगे कि 'भगवान् ही हमारे पुत्र बनें; इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों' तब वे ब्रह्मवाणीके द्वारा 'ऐसा ही हो' - यह कहेंगे। (इस प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं सभी देवताओंने 'ऐसा ही हो' - यह कहकर प्रभु (ब्रह्मा) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। वे अत्यन्त शीघ्रतासे सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर पहुँच गये ॥ १४-१७॥ ते क्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान्। नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥ १८ अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम्। अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥ १९ अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना। दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २० प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते। नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय भूतये ॥ २१ ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च। क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥ २२ कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः। उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २३ उन देववरोंने पृथिवीके सभी समुद्रों, वनसे भरे हुए पर्वतों एवं भाँति-भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार किया। उसके बाद (उसके आगे) उन लोगोंने ऐसे स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था, जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी। इस प्रकारके उस 'अमृत' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा कश्यपने प्रज्ञा-सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति, सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे (देवताओंको) सहस्रवार्षिक (हजारों वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले) दिव्य (देव-सम्बन्धी) इच्छा पूर्ण करनेवाले कामद-व्रतकी दीक्षा दी। फिर वे सभी देवता क्रमशः अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने लगे। वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका (सूक्त या स्तोत्रका) स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥ १८-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥

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