भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

अध्याय २५ ] वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५ न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत्। त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामति स प्रभुः॥ ३ यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः। पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम्॥ ४ तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति। देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः॥ ५ (परमात्मा) न केवल (आप सब) देवोंके, प्रत्युत हमारे भी सहारे हैं। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा देवोंके भी शासक हैं। इन्हें ही सनातन आदिदेव भी कहते हैं॥१-४॥ उन महान् आत्मा (सनातन आदिदेव)-को देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम (समस्त) देवोंको, मुझे तथा श्रुति (वेद) एवं समस्त विश्वको जानते हैं (संसारके समस्त क्रिया-कलाप उनकी जानकारीमें ही होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं)। उन्हींके कृपा-प्रसादसे (आपलोगोंको) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ। (आपलोग सुनें।) आप सभी उत्तर-दिशामें क्षीरसागरके उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे विचारशील विद्वान् लोग (अमृत) नामसे उच्चारित करते हैं। विश्वकी रचना करनेवाले (परमात्मा) वहीं योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं। आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायें और आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५-८॥ तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम्। यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्॥ ६ क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत्। अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः॥ ७ भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः। अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्॥ ८ ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्। उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम्॥ ९ (जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने लगेंगे) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी, स्निग्ध-गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य-स्वरूपिणी, सत्यताकी ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीको सुनेंगे। उसके बाद भावितात्माके (आत्मज्ञानसे परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर) व्रतकी समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव आपसे कहेंगे-सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये, आपलोगोंका स्वागत है। मैं (आपलोगोंको) वरदान देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो-किसे कौन-सा वर दूँ॥९-१३॥ रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम्। वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम्॥ १० दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्। सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः॥ ११ तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने। अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः॥ १२ कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः। स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः॥ १३