वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय २५ ] वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५ न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत्। त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामति स प्रभुः॥ ३ यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः। पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम्॥ ४ तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति। देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः॥ ५ (परमात्मा) न केवल (आप सब) देवोंके, प्रत्युत हमारे भी सहारे हैं। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा देवोंके भी शासक हैं। इन्हें ही सनातन आदिदेव भी कहते हैं॥१-४॥ उन महान् आत्मा (सनातन आदिदेव)-को देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम (समस्त) देवोंको, मुझे तथा श्रुति (वेद) एवं समस्त विश्वको जानते हैं (संसारके समस्त क्रिया-कलाप उनकी जानकारीमें ही होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं)। उन्हींके कृपा-प्रसादसे (आपलोगोंको) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ। (आपलोग सुनें।) आप सभी उत्तर-दिशामें क्षीरसागरके उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे विचारशील विद्वान् लोग (अमृत) नामसे उच्चारित करते हैं। विश्वकी रचना करनेवाले (परमात्मा) वहीं योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं। आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायें और आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५-८॥ तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम्। यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्॥ ६ क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत्। अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः॥ ७ भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः। अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्॥ ८ ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्। उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम्॥ ९ (जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने लगेंगे) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी, स्निग्ध-गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य-स्वरूपिणी, सत्यताकी ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीको सुनेंगे। उसके बाद भावितात्माके (आत्मज्ञानसे परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर) व्रतकी समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव आपसे कहेंगे-सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये, आपलोगोंका स्वागत है। मैं (आपलोगोंको) वरदान देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो-किसे कौन-सा वर दूँ॥९-१३॥ रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम्। वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम्॥ १० दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्। सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः॥ ११ तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने। अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः॥ १२ कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः। स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः॥ १३
१२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा। प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥ १४ भगवान्नेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः। उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥ १५ देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च। तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम्। श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥ १६ तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम्। यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥ १७ और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और वरकी याचना करेंगे कि 'भगवान् ही हमारे पुत्र बनें; इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों' तब वे ब्रह्मवाणीके द्वारा 'ऐसा ही हो' - यह कहेंगे। (इस प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं सभी देवताओंने 'ऐसा ही हो' - यह कहकर प्रभु (ब्रह्मा) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। वे अत्यन्त शीघ्रतासे सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर पहुँच गये ॥ १४-१७॥ ते क्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान्। नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥ १८ अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम्। अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥ १९ अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना। दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २० प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते। नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय भूतये ॥ २१ ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च। क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥ २२ कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः। उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २३ उन देववरोंने पृथिवीके सभी समुद्रों, वनसे भरे हुए पर्वतों एवं भाँति-भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार किया। उसके बाद (उसके आगे) उन लोगोंने ऐसे स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था, जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी। इस प्रकारके उस 'अमृत' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा कश्यपने प्रज्ञा-सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति, सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे (देवताओंको) सहस्रवार्षिक (हजारों वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले) दिव्य (देव-सम्बन्धी) इच्छा पूर्ण करनेवाले कामद-व्रतकी दीक्षा दी। फिर वे सभी देवता क्रमशः अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने लगे। वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका (सूक्त या स्तोत्रका) स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥ १८-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय २६ ] कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति १२७
छब्बीसवाँ अध्याय
कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति
| कश्यप उवाच | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृषाच्चे सिन्धुवृष वृषाकपे सुरवृष अनादिसम्भव रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषावर्त्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय अमृतेशाय सनातन त्रिधाम तुषित महातत्त्व लोकनाथ पद्मनाभ विरिञ्चे बहुरूप अक्षय अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक्र मुञ्जकेश हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाभ गभस्तिनाभ शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः समुद्रवासः अजः सहस्रशिरः सहस्रपाद अधोमुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्त्ते सहस्रास्य सहस्रसम्भव सहस्रसत्त्वं त्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव वौषट् वषट्कारं त्वामाहुरग्र्यं मखेषु प्राशितारं सहस्रधारं च भूश्च भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय ब्राह्मणप्रिय त्वमेव द्यौरसि मातरिश्वाऽसि धर्मोऽसि होता पोता मन्ता नेता होमहेतुस्त्वमेव अग्र्य विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर्गतिर्दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि । धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोऽसि दक्षिणाऽसि विश्वमसि । स्थविर हिरण्यनाभ नारायण त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर शम्भो स्वयम्भो भूतादिः महाभूतोऽसि विश्वभूत विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसि | कश्यपने कहा— हे देवदेव, एकशृङ्ग, वृषार्चि, सिन्धुवृष, वृषाकपि, सुरवृष, अनादिसम्भव, रुद्र, कपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति (सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी), ध्रुव, धर्माधर्म, वैकुण्ठ, वृषावर्त्त, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्रव, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशाय, सनातन, त्रिधाम, तुषित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिञ्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक्र, मुञ्जकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ठ, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाभ, शतक्रतुनाभ, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रास्य, सहस्रसम्भव ! मेरा आपके चरणोंमें नमस्कार है। (आपके भक्तजन) आपको सहस्रसत्त्व कहते हैं। (खिले हुए पुष्पके समान मधुर मुसकानवाले) पुष्पहास, चरम (सर्वोत्तम) ! लोग आपको ही वौषट् एवं वषट्कार कहते हैं। आप ही अग्र्य, (सर्वश्रेष्ठ) यज्ञोंमें प्राशिता (भोक्ता) हैं; सहस्रधार, भूः, भुवः एवं स्वः हैं। आप ही वेदवेद्य (वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य), ब्रह्मशय, ब्राह्मणप्रिय (अग्निके प्रेमी), द्यौः (आकाशके समान सर्वव्यापी), मातरिश्वा (वायुके समान गतिमान्), धर्म, होता, पोता (विष्णु), मन्ता, नेता एवं होमके हेतु हैं। आप ही विश्वतेजके द्वारा अग्र्य (सर्वश्रेष्ठ) हैं और दिशाओंके द्वारा सुभाण्ड (विस्तृत पात्ररूप) हैं अर्थात् दिशाएँ आपमें समाविष्ट हैं। आप (यजन करनेयोग्य) इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एवं दाता हैं। आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा (सृष्टि करनेवाले), धाता (धारण और पोषण करनेवाले), परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एवं विश्व हैं। आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, त्रिनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शम्भु, स्वयम्भू, भूतादि, महाभूत, विश्वभूत एवं विश्व हैं। आप ही |
३०- बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना
१२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव । वरार्थिनां वरदोऽसि त्वम्। चतुर्भिborder... wait चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च। हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुभ्यं होत्रात्मने नमः॥ १ संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव - विश्वकी सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म (उत्तमकर्मा), अमृत (कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले), दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा (विश्वका पालन करनेवाले) तथा वरद-वर चाहनेवालोंके लिये वरदानी हैं। चार (आश्रावय), चार (अस्तु श्रौषड्), दो (यज) तथा पाँच (ये यजामहे) और पुनः दो (वषट्) अक्षरों - इस प्रकार ४+४+२+५+२=१७ अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना लोमहर्षण उवाच नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम्। ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्॥ १ उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम्। श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः॥ २ वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः। कश्यप उवाच प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥ ३ वासवस्याborder वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः। अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः॥ ४ अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्। पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी॥ ५ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला समयानुकूल उचित वचन कहा - श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको (इच्छित) वर दूँगा॥ २ १/२ ॥ कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान् भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें। वरकी याचना करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से पुत्रकी प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको प्रकट किया - कहा ॥ ३-५॥
अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२९ देवा ऊचुः निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर। त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥ ६ ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च। सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः। मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७ हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः। हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितृनपि ॥ ८ करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा। यथायातेन मार्गेण निवर्त्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९ लोमहर्षण उवाच एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना। ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥ १० विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च। नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११ प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम्। ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥ १२ प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन्। सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा॥ १३ तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम्। आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना ॥ १४ दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः । वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम्। तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थविबोधिनी ॥ १५ शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम्। देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६ [अदितिके अभिप्रायको जानकर] देवताओंने कहा - महेश्वर ! सभी देवताओंके परम कल्याणके लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन- पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें। इसके बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे। देवश्रेष्ठो ! परमेष्ठी (ब्रह्मा) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व- प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा। सुरोत्तमो ! अब आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस लौट जायँ ॥ ६-९ ॥ लोमहर्षणने कहा - प्रभावशाली भगवान् विष्णुने जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े। जब देवगण कुरुक्षेत्र-वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके लिये प्रेरित किया। (फिर) उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ कठिन तपस्या की ॥ १०-१३ ॥ श्रेष्ठ ऋषियो ! (जिस वनमें अदितिने तप किया) उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा। वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी है। ऋषिश्रेष्ठो ! परम अर्थको जाननेवाली (तत्त्वज्ञा) अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा; उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है; इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि-मध्य और अन्तके रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना प्रारम्भ कर दिया ॥ १४-१६ ॥
१३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ अदितिरुवाच नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने। नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १७ नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये। नमः पङ्कजसंभूतिसंभावायात्मयोनये ॥ १८ श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे। नमः पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ॥ १९ तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने। निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ २० जगच्च तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते। नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ २१ यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः। अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थितः ॥ २२ बहिर्ज्योतिरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिषः परः। यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिलं जगत् ॥ २३ तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः। आद्यः प्रजापतिः सोऽपि पितॄणां परमं पतिः। पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ २४ यः प्रवृत्तैर्निवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते। स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ॥ २५ अदिति बोलीं - कृत्यासे उत्पन्न दुःखका नाश करनेवाले प्रभुको नमस्कार है। कमलकी मालाको धारण करनेवाले पुष्करमाली भगवान्को नमस्कार है। परम मङ्गलकारी, कल्याणस्वरूप आदिविधाता प्रभो! आपको नमस्कार है। कमलनयन! आपको नमस्कार है। पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके स्थान, आत्मजन्म! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप लक्ष्मीपति, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, संयमियोंके द्वारा दर्शन पाने योग्य, हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले एवं खड्ग (तलवार) धारण करते हैं; आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आत्मज्ञानके द्वारा यज्ञ करनेवाले, योगियोंके द्वारा ध्यान करने योग्य, योगकी साधना करनेवाले योगी, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे रहित किंतु (दयादि) विशिष्ट गुणोंसे युक्त ब्रह्मरूपी श्रीहरि भगवान्को नमस्कार है ॥ १७-२० ॥ जिन आप परमेश्वरमें सारा संसार स्थित है, किंतु जो संसारसे दृश्य नहीं हैं, ऐसे स्थूल तथा अतिसूक्ष्म आप शार्ङ्गधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्की अपेक्षा करनेवाले प्राणी जिन आपके दर्शनसे वञ्चित रहते हैं, आपका वे दर्शन नहीं कर पाते, परंतु जिन्होंने जगत्की अपेक्षा नहीं की, उन्हें आप उनके हृदयमें स्थित दीखते हैं। आपकी ज्योति बाहर है एवं अलक्ष्य है, सर्वोत्तम ज्योति है; यह सारा जगत् आपमें स्थित है, आपसे उत्पन्न होता है और आपका ही है, जगत्के देवता उन आपको नमस्कार है। जो आप सबके आदिमें प्रजापति रहे हैं एवं पितरोंके श्रेष्ठ स्वामी हैं, देवताओंके स्वामी हैं; उन आप श्रीकृष्णको बार-बार नमस्कार है ॥ २१-२४ ॥ जो प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंसे विरक्त तथा स्वर्ग और मोक्षके फलके देनेवाले हैं, उन गदा धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। जो
३१- वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना
अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १३१ यस्तु संचिन्त्यमानोऽपि सर्वं पापं व्यपोहति। नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेधसे ॥ २६ ये पश्यन्त्यखिलाधारमीशानमजमव्ययम्। न पुनर्जन्ममरणं प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७ यो यज्ञो यज्ञपरमौरिज्यते यज्ञसंस्थितः। तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८ गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्विदां गतिः। यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २९ यतो विश्वं समुद्भूतं यस्मिन् प्रलयमेष्यति । विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ॥ ३० आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं व्याप्तं येन चराचरम्। मायाजालसमुन्नद्धं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३१ योऽत्र तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः। विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२ मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः। रात्रिंजं सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३ यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्। पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४ यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्। नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ॥ ३५ यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनार्दन । सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६ स्मरण करनेवालेके सारे पाप नष्ट कर देते हैं, उन विशुद्ध हरिमेधाको मेरा नमस्कार है। जो प्राणी अविनाशी भगवान्को अखिलाधार, ईशान एवं अजके रूपमें देखते हैं, वे कभी भी जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते । प्रभो ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। आपकी आराधना यज्ञोंद्वारा होती है, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, यज्ञमें आपकी स्थिति है; यज्ञपुरुष ! आप ईश्वर, प्रभु विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २५-२८ ॥ वेदोंमें आपका गुणगान हुआ है - इसे वेदज्ञ गाते हैं। आप विद्वज्जनोंके आश्रय हैं, वेदोंसे जानने योग्य एवं नित्यस्वरूप हैं; आप विष्णुको मेरा नमस्कार है। विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है और जिनमें विलीन होगा तथा जो विश्वके उद्भव एवं प्रतिष्ठाके स्वरूप हैं, उन महान् आत्मा (परमात्मा)-को मेरा नमस्कार है। जिनके द्वारा मायाजालसे बँधा हुआ ब्रह्मासे लेकर चराचर (विश्व) व्याप्त है, उन उपेन्द्र- भगवान्को मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जल- स्वरूपमें स्थित होकर अखिल विश्वका भरण करते हैं, उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २९-३२ ॥ जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रिसे उत्पन्न, रूपधारी तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम करती हूँ। जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा-रूप दोनों आँखें समस्त लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंको सतत देखती रहती हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके विषयमें मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है- असत्य नहीं है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्रष्टा विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ। हे जनार्दन ! यदि मैंने यह सत्य कहा है तो उस सत्यके प्रभावसे मेरे मनकी सारी अभिलाषाएँ परिपूर्ण हों ॥ ३३-३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २७ ॥
१३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २८ अट्ठाईसवाँ अध्याय अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतोऽथ भगवान् वासुदेव उवाच ताम्। अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥ १ लोमहर्षणने कहा- इस प्रकार स्तुति किये जानेपर समस्त प्राणियोंके दृष्टि-पथमें न आनेवाले भगवान् वासुदेव उसके सामने प्रकट हुए और उससे (इस प्रकार) बोले - ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छस्यभिवाञ्छितान्। तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २ श्रीभगवान् बोले- धर्मज्ञे (धर्मके मर्मको जाननेवाली) अदिति ! तुम मुझसे जिन मनचाही कामनाओंकी पूर्ति चाहती हो, उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें कोई संदेह नहीं। महाभागे ! सुनो, तुम्हारे मनमें जिन वरोंकी इच्छा है, उन्हें तुम मुझसे माँगो; क्योंकि मेरे दर्शन करनेका फल कभी व्यर्थ नहीं होता। तुम्हारे इस (अदिति) वनमें रहकर जो तीन रातोंतक निवास करेगा, उसकी सभी मनचाही कामनाएँ पूरी होंगी। जो मनुष्य दूर देशमें स्थित रहकर भी तुम्हारे इस वनका स्मरण करेगा, वह परम धामको प्राप्त कर लेगा। फिर यहाँ रहनेवाले मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य ? जो मानव इस स्थानपर पाँच, तीन अथवा दो या एक ही ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक भोजन करायेगा, वह उत्तम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करेगा ॥ २-६ ॥ अदितिने कहा- भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र तीनों लोकोंका स्वामी हो जाय। असुरोंने उसके राज्यको तथा यज्ञमें मिलनेवाले भागको छीन लिया है। अतः वरदाता प्रभो! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र उसे (राज्यको) प्राप्त कर ले। केशव ! मेरे पुत्रके राज्यके असुरोंद्वारा छीने जानेका मुझे दुःख नहीं है, किंतु (उसके) प्राप्त होनेवाले उचित भागका छिन जाना मेरे हृदयको कुरेद रहा है ॥ ७-९ ॥ श्रीभगवान् बोले- देवि ! तुम्हारी इच्छाके अनुकूल मैंने तुम्हारे ऊपर कृपा-प्रसाद प्रकट किया है। (सुनो,) कश्यपसे तुम्हारे गर्भमें मैं अपने अंशसे जन्म लूँगा और शृणु त्वं च महाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः। मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥ ३ यश्चेह त्वद्वने स्थित्वा त्रिरात्रं वै करिष्यति। सर्वे कामाः समृध्यन्ते मनसा यानिहेच्छति ॥ ४ दूरस्थोऽपि वनं यस्तु अदित्याः स्मरते नरः। सोऽपि याति परं स्थानं किं पुनर्निवसन् नरः ॥ ५ यश्चेह ब्राह्मणान् पञ्च त्रीन् वा द्वावेकमेव वा। भोजयेच्छ्रद्धया युक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ६ अदितिरुवाच यदि देव प्रसन्नस्त्वं भक्त्या मे भक्तवत्सल। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ॥ ७ हृतं राज्यं हतश्चास्य यज्ञभाग इहासुरैः। त्वयि प्रसन्ने वरद तत् प्राप्नोतु सुतो मम ॥ ८ हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव। प्रपन्नदायविध्वंशो बाधां मे कुरुते हृदि ॥ ९ श्रीभगवानुवाच कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितम्। स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ॥ १०
| अध्याय २९ ] | बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन | १३३ | | :--- | :--- |
| तव गर्भे समुद्भूतस्ततस्ते ये त्वरातयः।<br>तानहं च हनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥ ११ | तुम्हारी कोखसे जन्म लेकर फिर तुम्हारे जितने शत्रु हैं, उन (सभी)-का वध करूँगा। नन्दिनि! तुम शोक छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ १०-११ ॥ | | अदितिरुवाच<br>प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन।<br>नाहं त्वामुदरे वोढुमीश शक्ष्यामि केशव।<br>यस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं विश्वयोनित्वमीश्वरः ॥ १२ | **अदितिने कहा—**देवदेवेश! आप (मुझपर) प्रसन्न हों। विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है। हे केशव! हे ईश! आप विश्वके उत्पत्ति-स्थान और ईश्वर हैं। जिन आप प्रभुमें सारा संसार प्रतिष्ठित है, उन आपके भारको मैं अपनी कोखमें वहन न कर सकूँगी ॥ १२ ॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अहं त्वां च वहिष्यामि आत्मानं चैव नन्दिनि।<br>न च पीडां करिष्यामि स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ १३ | श्रीभगवान्ने कहा— नन्दिनि! मैं स्वयं अपना और तुम्हारा—दोनोंका भार वहन कर लूँगा; मैं तुम्हें पीड़ा नहीं करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। | | इत्युक्त्वान्तर्हिते देवेऽदितिर्गर्भं समादधे।<br>गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।<br>चकम्पिरे महाशैला जग्मुः क्षोभं महाब्धयः ॥ १४ | यह कहकर भगवान्के चले जानेपर अदितिने गर्भको धारण कर लिया। भगवान् (कृष्ण)-के गर्भमें आ जानेपर सारी पृथ्वी डगमगा गयी। बड़े-बड़े पर्वत हिलने लगे एवं विशाल समुद्र विक्षुब्ध हो गये। | | यतो यतोऽदितिर्याति ददाति पदमुत्तमम्।<br>ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम द्विजपुंगवाः ॥ १५ | द्विजश्रेष्ठो! अदिति जहाँ-जहाँ जाती या पैर रखती थीं, वहाँ-वहाँकी पृथ्वी खेद (भार)-के कारण झुक जाती थी। | | दैत्यानामपि सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।<br>बभूव तेजसो हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ १६ | जैसा कि ब्रह्माने (पहले) बतलाया था, मधुसूदनके गर्भमें आनेपर सभी दैत्योंके तेजकी हानि हो गयी ॥ १३-१६ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २८ ॥
उन्तीसवाँ अध्याय
बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन
| लोमहर्षण उवाच<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः।<br>प्रह्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम् ॥ १ | लोमहर्षण बोले— उसके बाद (दैत्योंके तेजके समाप्त हो जानेपर) असुरराज बलिने समस्त असुरोंको श्रीहीन देखकर अपने पितामह प्रह्लादजीसे पूछा— ॥ १ ॥ | | बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना।<br>किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव ॥ २ | बलिने कहा— तात! (इस समय) दैत्यलोग आगसे झुलसे हुए-से कान्तिहीन हो गये हैं। आज ये ऐसे क्यों हो गये हैं? प्रतीत होता है कि मानो इन्हें ब्राह्मणका अभिशाप लग गया है—ये ब्रह्मदण्डसे जैसे |
१३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ दुरिष्टं किं तु दैत्यानां किं कृत्या विधिनिर्मिता । नाशायैषां समुद्भूता येन निस्तेजसोऽसुराः ॥ ३ पीड़ित हो गये हैं ! क्या दैत्योंका कोई अशुभ होनेवाला है ? अथवा इनके नाशके लिये ब्रह्माने कृत्या (पुरश्चरणसे उत्पन्न की गयी मारिकाशक्ति) - को उत्पन्न कर दिया है, जिससे ये असुरलोग इस प्रकार तेजसे रहित हो गये हैं ॥ २-३ ॥ लोमहर्षण उवाच इत्यसुरवरस्तेन पृष्टः पौत्रेण ब्राह्मणाः । चिरं ध्यात्वा जगादेदमसुरं तं तदा बलिम् ॥ ४ लोमहर्षण बोले - ब्राह्मणो ! अपने पौत्र (पुत्रके पुत्र) राजा बलिके इस प्रकार पूछनेपर दैत्योंमें प्रधान प्रह्लादने देरतक ध्यान करके तब असुर बलिसे कहा - ॥४॥ प्रह्लाद उवाच चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहसा धृतिम् । सद्यः समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः ॥ ५ प्रह्लादने कहा - दानवाधिप ! इस समय पहाड़ डगमगा रहे हैं, पृथ्वी एकाएक अपनी (स्वाभाविक) धीरता छोड़ रही है, समुद्रमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं और दैत्य तेजसे रहित हो गये हैं। सूर्योदय होनेपर अब पहलेके समान ग्रहोंकी चाल नहीं दीखती है। इन कारणों (लक्षणों)-से अनुमान होता है कि देवताओंका अभ्युदय होनेवाला है। महाबाहु ! दानवेश्वर ! यह कोई विशेष कारण अवश्य है। इस कारणको छोटा नहीं मानना चाहिये और आपको इसका कोई प्रतिप्रत्न (उपाय) करना चाहिये ॥ ५-७ ॥ सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः । देवानां च परा लक्ष्मीः कारणेनानुमीयते ॥ ६ महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर । न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं कथंचन ॥ ७ लोमहर्षण उवाच इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः । अत्यर्थभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् ॥ ८ स ध्यानपथगं कृत्वा प्रह्लादश्च मनोऽसुरः । विचारयामास ततो यथा देवो जनार्दनः ॥ ९ स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम् । तदन्तश्च वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ॥ १० साध्यान् विश्वे तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान् । विरोचनं च तनयं बलिं चासुरनायकम् ॥ ११ जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान् । आत्मानमुर्वीं गगनं वायुं वारि हुताशनम् ॥ १२ समुद्राद्रिसरिद्वीपान् सरांसि च पशून् महीम् । व्योममनुष्यानखिलंस्तथैव च सरीसृपान् ॥ १३ समस्तलोकस्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च । ग्रहनक्षत्रताराश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन् ॥ १४ सम्पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः । प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं ततः ॥ १५ लोमहर्षणने कहा - असुरोंमें श्रेष्ठ महान् भक्त प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहकर मनसे श्रीहरिका ध्यान किया। असुर प्रह्लादने अपने मनको भगवान्के ध्यान-पथमें लगाकर चिन्तन किया- जैसा कि भगवान्का स्वरूप है। उन्होंने उस समय (चिन्तन करते समय) अदितिकी कोखमें वामनके रूपमें भगवान्को देखा। उनके भीतर वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों, मरुतों, साध्यों, विश्वेदेवों, आदित्यों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा अपने पुत्र विरोचन एवं असुरनायक बलि, जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा इस प्रकारके दूसरे बहुत-से असुरों एवं अपनेको और पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्रों, पर्वतों, नदियों, द्वीपों, सरों, पशुओं, भूसम्पत्तियों, पक्षियों, सम्पूर्ण मनुष्यों, सरकनेवाले जीवों, समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्मा, शिव, ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। प्रह्लाद इन्हें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये, किंतु क्षणमात्रमें ही पुनः पूर्ववत् प्रकृतिस्थ हो गये और विरोचन-पुत्र दैत्योंके राजा बलिसे बोले - ॥ ८-१५ ॥
अध्याय २९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन १३५ तत्संजातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम्। तेजसो हानिरुत्पन्ना शृण्वन्तु तदशेषतः ॥ १६ देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिजः । अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः ॥ १७ परावराणां परमः परापरसतां गतिः । प्रभुः प्रमाणं मानानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः । स्थितिं कर्तुं जगन्नाथं सोऽचिन्त्यो गर्भतां गतः ॥ १८ प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा- मनादिमध्यो भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेकः कर्तुं महात्माऽदितिजोऽवतीर्णः ॥ १९ न यस्य रुद्रा न च पद्मयोनि- र्नेन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमिश्राः । जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ २० यमक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यं ज्ञानविधूतपापाः । यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति तं वासुदेवं प्रणमामि देवम् ॥ २१ भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम् । लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति तं वासुदेवं प्रणतोऽस्म्यचिन्त्यम् ॥ २२ न यस्य रूपं न बलं प्रभावो न च प्रतापः परमस्य पुंसः । विज्ञायते सर्वपितामहाद्यै- स्तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम् ॥ २३ रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगेषा स्पर्शग्रहित्री रसना रसस्य । घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तं न घ्राणचक्षुः श्रवणादि तस्य ॥ २४ स्वयंप्रकाशः परमार्थतो यः सर्वेश्वरो वेदितव्यः स युक्त्या। शक्यं तमीड्यमनघं च देवं ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम् ॥ २५ (दैत्यो!) मैंने तुमलोगोंकी कान्तिहीनताके (वास्तविक) सब कारणको - अच्छी तरहसे समझ लिया है। (अब) उसे तुमलोग भलीभाँति सुनो। देवोंके देव, जगद्योनि, (विश्वको उत्पन्न करनेवाले) किंतु स्वयं अयोनि, विश्वके प्रारम्भमें विद्यमान पर स्वयं अनादि, फिर भी विश्वके आदि, वर देनेवाले वरणीय हरि, सर्वश्रेष्ठोंमें भी परम (श्रेष्ठ), बड़े-छोटे सज्जनोंकी गति, मानोंके भी प्रमाणभूत प्रभु, सातों लोकोंके गुरुओंके भी गुरु एवं चिन्तनमें न आने योग्य विश्वके स्वामी मर्यादा (धर्महेतु)-की स्थापना करनेके लिये (अदितिके) गर्भमें आ गये हैं। प्रभुओंके प्रभु, श्रेष्ठोंमें श्रेष्ठ, आदि-मध्यसे रहित, अनन्त भगवान् तीनों लोकोंको सनाथ करनेके लिये अदितिके पुत्रके रूपमें अंशावतारस्वरूपसे अवतीर्ण हुए हैं ॥ १६-१९॥ दैत्यपते ! जिन वासुदेव भगवान्के वास्तविक स्वरूपको रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ पुरुष नहीं जानते, वे ही वासुदेव भगवान् अपनी एक कलासे अवतीर्ण हुए हैं। वेदके जाननेवाले जिन्हें अक्षर कहते हैं तथा ब्रह्मज्ञानके होनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं - ऐसे निष्पाप शुद्ध प्राणी जिनमें प्रवेश पाते हैं और जिनके भीतर प्रविष्ट हुए लोग पुनः जन्म नहीं लेते - ऐसे उन वासुदेव भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। समुद्रकी लहरोंके समान जिनसे समस्त जीव निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं तथा प्रलयकालमें जिनके भीतर विलीन हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि जिन परम पुरुषके रूप, बल, प्रभाव और प्रतापको नहीं जान पाते उन वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २०-२३ ॥ जिन परमेश्वरने रूप देखनेके लिये आँखोंको, स्पर्शज्ञानके लिये त्वचाको, खट्टे-मीठे स्वाद लेनेके लिये जीभको और सुगन्ध-दुर्गन्ध सूंघनेके लिये नाकको नियत किया है; पर स्वयं उनके नाक, आँख और कान आदि नहीं हैं। जो वस्तुतः स्वयं प्रकाशस्वरूप हैं, वे सर्वेश्वर युक्ति के द्वारा (कुछ-कुछ) जाने जा सकते हैं; उन सर्वसमर्थ, स्तुतिके योग्य, किसी भी प्रकारके मलसे रहित, (भक्तिसे) ग्राह्य, ईश हरिदेवको मैं प्रणाम करता हूँ।
१३६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ येनैकदंष्ट्रेण समुद्धृतेयं धरा चला धारयतीह सर्वम्। शेते ग्रसित्वा सकलं जगद् य- स्तमीड्यमीशं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६ अंशावतीर्णेन च येन गर्भे हतानि तेजांसि महासुराणाम्। नमामि तं देवमनन्तमीश- मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २७ देवो जगद्योनिरयं महात्मा स षोडशांशेन महाऽसुरेन्द्राः। सुरेन्द्रमातुर्जठरं प्रविष्टो हतानि वस्तेन बलं वपूंषि॥ २८ बलिरुवाच तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्। सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः ॥ २९ विप्रचित्तिः शिबिः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च। हयशिरा अश्वशिरा भङ्कारो महाहनुः ॥ ३० प्रतापी प्रघशः शम्भुः कुक्कुराक्षश्च दुर्जयः। एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा ॥ ३१ महाबला महावीर्या भूभारधरणक्षमाः। एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्द्धेन सम्मितः ॥ ३२ लोमहर्षण उवाच पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः। सक्रोधश्च बलिं प्राह वैकुण्ठाक्षेपवादिनम् ॥ ३३ विनाशमुपयास्यन्ति दैत्या ये चापि दानवाः। येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिर्विवेकवान् ॥ ३४ देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्। त्वामृते पापसंकल्प कोऽन्य एवं वदिष्यति ॥ ३५ य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः। सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरान्ता विभूतयः ॥ ३६ त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीवनम्। ससमुद्रद्वीपलोकोऽयं यश्चेदं सचराचरम्॥ ३७ यस्याभिवाद्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः। एकांशांशकलाजन्म कस्तमेवं प्रवक्ष्यति ॥ ३८ जिनके द्वारा एक मोटे तथा बड़े दाँतसे निकाली गयी चिरस्थायिनी पृथ्वी सभी कुछ धारण करनेमें समर्थ है तथा जो समस्त संसारको अपनेमें स्थान देकर सोनेका स्वाँग धारण करते हैं, उन स्तुत्य ईश विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपने अंशसे अदितिके गर्भमें आकर महासुरोंके तेजका अपहरण कर लिया, उन समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठाररूप धारण करनेवाले अनन्त देवाधीश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। हे महासुरो! जगत्की उत्पत्तिके स्थान वे ही महात्मा देव अपने सोलहवें अंशकी कलासे इन्द्रकी माताके गर्भमें प्रविष्ट हुए हैं और उन्होंने ही तुमलोगोंके शारीरिक बलको अपहृत कर लिया है॥ २४-२८॥ बलिने कहा - तात! जिनसे हम सबको डर है वे हरि कौन हैं? हमारे पास वासुदेवसे अधिक शक्तिशाली सैकड़ों दैत्य हैं; जैसे-विप्रचित्ति, शिबि, शङ्कु, अयःशङ्कु, हयशिरा, अश्वशिरा, (विघटन करनेवाला) भङ्कार, महाहनु, प्रतापी, प्रघश, शम्भु, कुक्कुराक्ष एवं दुर्जय। ये तथा अन्य भी ऐसे अनेक दैत्य एवं दानव हैं। ये सभी महाबलवान् तथा महापराक्रमी एवं पृथ्वीके भारको धारण करनेमें समर्थ हैं। कृष्ण तो हमारे इन बलवान् दैत्योंमेंसे पृथक्-पृथक् एक-एकके आधे बलके समान भी नहीं हैं॥ २९-३२॥ लोमहर्षणने कहा- अपने पौत्रकी इस उक्तिको सुनकर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद क्रुद्ध हो गये और भगवान्की निन्दा करनेवाले बलिसे बोले - बलि! तेरे-जैसे विवेकहीन एवं दुर्बुद्धि राजाके साथ ये सारे दैत्य एवं दानव मारे जायेंगे। हे पापको ही सोचनेवाले पापबुद्धि! तुम्हारे सिवा ऐसा कौन है, जो देवाधिदेव महाभाग अज एवं सर्वव्यापी वासुदेवको इस तरह कहेगा ॥ ३३-३५॥ तुमने जिन-जिनका नाम लिया है, वे सभी दैत्य एवं दानव तथा ब्रह्माके साथ सभी देवता एवं चराचरकी समस्त विभूतियाँ, तुम और मैं, पर्वत तथा वृक्ष, नदी और वनसे युक्त सारा जगत् तथा समुद्र एवं द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण लोक तथा चर और अचर जिन सर्ववन्द्य श्रेष्ठ सर्वव्यापी परमात्माके एक अंशकी अंशकलासे उत्पन्न
| अध्याय २९ ] | बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन | १३७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>दुर्बुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ३९ | हुए हैं, उनके विषयमें विनाशकी ओर चलनेवाले विवेकहीन, मूर्ख, इन्द्रियोंके गुलाम, वृद्धोंके आदेशोंका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारी अपेक्षा कौन ऐसा (कृत्या नामसे) कह सकेगा?॥ ३६—३९॥ |
| शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताऽधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवावमानकः॥ ४०<br><br>तिष्ठत्यनेकंससारसंघातौघविनाशिनि ।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावद्वेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४१<br><br>न मे प्रियतरः कृष्णादपि देहोऽयमात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको भवांश्च दितिनन्दन॥ ४२<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४३<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरुर्नारायणो हरिः॥ ४४ | मैं (ही सचमुच) शोचनीय हूँ, जिसके घरमें तुम्हारा अधम पिता उत्पन्न हुआ, जिसका तुम्हारे-जैसा देवदेव (विष्णु)-का तिरस्कार करनेवाला पुत्र है। जो अनेक संसारके समूहोंके प्रवाहका विनाश करनेवाले हैं, ऐसे कृष्णमें भक्तिके लिये तुम्हें क्या मेरा भी ध्यान नहीं रहा। दितिनन्दन! मेरे विषयमें समस्त संसार एवं तुम भी यह जानते हो कि मुझे यह मेरी देह भी कृष्णसे अधिक प्रिय नहीं है। फिर यह समझते हुए भी कि भगवान् कृष्ण मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, फिर भी तुम मेरी मर्यादापर ध्यान न देकर ठेस पहुँचाते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु (पिता) विरोचन है, उसका गुरु (पिता) मैं हूँ तथा मेरे भी गुरु सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् नारायण श्रीहरि हैं॥ ४०—४४॥ |
| निन्दां करोषि तस्मिंस्त्वं कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात् तस्मादिहैव त्वमैश्वर्याद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४५<br><br>स देवो जगतां नाथो बले प्रभुर्जनार्दनः।<br>नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते भक्तिमानत्र मे गुरुः॥ ४६<br><br>एतावन्मात्रमप्यत्र निन्दता जगतो गुरुम्।<br>नापेक्षितस्त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४७<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं बले।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपं राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४८<br><br>यथा न कृष्णादपरः परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाऽचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ४९ | जिस कारण तुम अपने गुरु (पिता विरोचन)-के गुरु (पिता मैं प्रह्लाद)-के भी गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इस कारण तुम यहीं ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! वे प्रभु जनार्दनदेव जगत्के स्वामी हैं। इस विषयमें मेरा गुरु (अर्थात् मैं) भक्तिमान् हूँ, यह विचारकर तुझे मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। जिस कारणसे जगद्गुरुकी निन्दा करनेवाले तुमने मेरी इतनी भी अपेक्षा नहीं की, इस कारण मैं तुम्हें शाप देता हूँ; क्योंकि बलि! तुम्हारे द्वारा अच्युतके प्रति अपमानजनित ये वचन मेरे लिये सिर कट जानेसे भी अधिक कष्टदायी हैं, अतः तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर गिर जाओ। भवसागरमें भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई रक्षक नहीं है, अतः शीघ्र ही मैं तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट हुआ देखूँगा॥ ४५—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९॥
१३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३०
तीसवाँ अध्याय
बलि का प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा |
|---|---|
| इति दैत्यपतिः श्रुत्वा वचनं रौद्रमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ १ | —दैत्यपति बलि प्रह्लादकी इस प्रकार कठोर एवं अप्रिय उक्तिको सुनकर उनके चरणोंमें बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए मनाने लगा॥ १॥ |
| बलिरुवाच | बलिने कहा |
|---|---|
| प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमूढेन मयैतद्वाक्यमीरितम्॥ २<br><br>मोहापहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ३<br><br>राज्यभ्रंशं यशोभ्रंशं प्राप्स्यामीति ततस्त्वहम्।<br>विषण्णोऽसि यथा तात तथैवाविनये कृते॥ ४<br><br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्तात गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५<br><br>प्रसीद तात मा कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपपरिदग्धोऽहं परितप्ये दिवानिशम्॥ ६ | —तात! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों, मैं मूढ़ हो गया था, मेरे ऊपर क्रोध न करें। बलके घमण्डसे विवेकहीन होनेके कारण मैंने यह वचन कहा था। दैत्यश्रेष्ठ! मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, मैं अधम हूँ। मैंने सदाचारका पालन नहीं किया, जिससे मुझ पापाचारीको आपने जो शाप दिया, वह बहुत ठीक किया। तात! आप (यतः) मेरी उद्दण्डताके कारण बहुत दुःखी हैं, अतः मैं राज्यसे च्युत और अपनी कीर्तिसे रहित हो जाऊँगा। तात! संसारमें तीनों लोकोंका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य किसी (वस्तु)-का मिलना बहुत कठिन नहीं है, परंतु आप-जैसे जो गुरुजन हैं, वे संसारमें दुर्लभ हैं। दैत्योंकी रक्षा करनेवाले तात! आप प्रसन्न हों, क्रोध न करें। आपका क्रोध मुझे जला रहा है, इसलिये मैं दिन-रात (आठों प्रहर) संतप्त हो रहा हूँ॥ २—६॥ |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले |
|---|---|
| वत्स कोपेन मे मोहो जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ७<br><br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं कच्चिच्छपाम्यहम्॥ ८<br><br>यो यः शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुंगव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मात्त्वं मा विषीद वै॥ ९<br><br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ १०<br><br>शापं प्राप्य च मे वीर देवेशः संस्मृतस्त्वया।<br>तथा तथा वदिष्यामि श्रेयस्त्वं प्राप्स्यसे यथा॥ ११ | —वत्स! क्रोधके कारण हमें मोह उत्पन्न हो गया था और उसीने मेरी विचार करनेवाली बुद्धि भी नष्ट कर दी थी, इसीसे मैंने तुम्हें शाप दे दिया। महासुर! यदि मोहवश मेरा ज्ञान दूर नहीं हुआ होता तो मैं भगवान्को सब जगह विद्यमान जानता हुआ भी तुम्हें शाप कैसे देता। असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो क्रोधवश शाप दिया है, वह तो तुम्हारे लिये होगा, किंतु तुम दुःखी मत हो; बल्कि आजसे तुम उन देवोंके भी ईश्वर भगवान् अच्युत हरिकी भक्ति करनेवाले बन जाओ—भक्त हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक हो जायेंगे। वीर! मेरा शाप पाकर तुमने देवेश्वर भगवान्का स्मरण किया है, अतः मैं तुमसे वही कहूँगा, जिससे तुम कल्याणको प्राप्त करो॥ ७—११॥ |
३२- सरस्वती नदीका वर्णन—उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना
अध्याय ३० ] बलिको प्रह्लादको संतुष्ट करना, वामनका प्राकट्य १३९ लोमहर्षण उवाच अदितिर्वरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् । क्रमेण हृदरे देवो वृद्धिं प्राप्तो महायशाः ॥ १२ ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते। अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ॥ १३ अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे। देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ १४ ववुर्वाताः सुखस्पर्शा नीरजस्कमभून्नभः। धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥ १५ नोद्वेगश्चाप्यभूद् देहे मनुजानां द्विजोत्तमाः। तदा हि सर्वभूतानां धर्मे मतिरजायत ॥ १६ तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाव च प्रभुम् ॥ १७ ब्रह्मोवाच जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे। जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८ जयाजित जयाशेष जयाव्यक्तस्थिते जय। परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयार्थनिःसृत ॥ १९ जयाशेष जगत्साक्षिञ्जगत्कर्त्तुर्जगद्गुरो। जगतोऽजगतन्तेश स्थितौ पालयते जय ॥ २० जयाखिल जयाशेष जय सर्वहृदिस्थित। जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१ मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यहृष्ट जयेश्वर । योगिभिर्मुक्तिकामैस्तु दमादिगुणभूषण ॥ २२ जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय। जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३ जय स्वमायायोगस्थ शेषभोग जयाक्षर। जयैकदंष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४ लोमहर्षणने कहा- (उधर) अदितिने सभी कामनाओंकी समृद्धि करनेवाले वरको प्राप्त कर लिया तब उसके उदरमें महायशस्वी देव (भगवान्) धीरे- धीरे बढ़ने लगे। इसके बाद दसवें महीनेमें जब प्रसवका समय आया तब भगवान् गोविन्द वामनाकारमें उत्पन्न हो गये। संसारके स्वामी उन अखिलेश्वरके अवतार ले लेनेपर देवता और देवमाता अदिति दुःखसे मुक्त हो गये। फिर तो (संसारमें) आनन्ददायी वायु बहने लगी, गगनमण्डल बिना धूलिका (स्वच्छ) हो गया एवं सभी जीवोंकी बुद्धि धर्म करनेमें लग गयी। द्विजोत्तमो ! उस समय मनुष्योंकी देहमें कोई घबड़ाहट नहीं थी और तब समस्त प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें लग गयी। उनके उत्पन्न होते ही लोकपितामह ब्रह्माने उनकी तत्काल जातकर्म आदि क्रिया (संस्कार) सम्पन्न करके उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १२-१७॥ ब्रह्मा बोले- अधीश ! आपकी जय हो। अजेय ! आपकी जय हो। विश्वके गुरु हरि ! आपकी जय हो। जन्म-मृत्यु तथा जरासे अतीत अनन्त ! आपकी जय हो। अच्युत ! आपकी जय हो। अजित ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। अव्यक्त स्थितिवाले भगवन् ! आपकी जय हो। परमार्थार्थकी (उत्तम अभिप्रायकी) पूर्तिमें निमित्त ! ज्ञान और ज्ञेयके अर्थके उत्पादक सर्वज्ञ ! आपकी जय हो। अशेष जगत्के साक्षी ! जगत्के कर्ता ! जगद्गुरु ! आपकी जय हो। जगत् (चर) एवं अजगत् (अचर) -के स्थिति, पालन एवं प्रलयके स्वामी ! आपकी जय हो। अखिल ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। सभीके हृदयमें रहनेवाले प्रभो ! आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तस्वरूप ! समस्त ज्ञानकी मूर्ति, उत्तम ! आपकी जय हो। मुमुक्षुओंके द्वारा अनिर्देश्य, नित्य-प्रसन्न ईश्वर ! आपकी जय हो। हे मुक्तिकी कामना करनेवाले योगियोंसे सेवित, दम आदि गुणोंसे विभूषित परमेश्वर ! आपकी जय हो ॥ १८-२२॥ हे अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपवाले ! हे दुर्ज्ञेय (कठिनतासे समझमें आनेवाले) ! आपकी जय हो। हे स्थूल और जगत्-मूर्ति ! आपकी जय हो। हे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभो ! आपकी जय हो। हे इन्द्रियोंसे रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त (नाथ) ! आपकी जय हो।
१४० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३० नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण। साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥ २५ निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन। जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥ २६ वर्द्धस्व वर्द्धितानेकविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ॥ २७ न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे। ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः ॥ २८ त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते। कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः ॥ २९ त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुखः प्रभो। स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जनः ॥ ३० तदीश्र्वरेश्र्वरेशान विभो वर्द्धस्व भावन। प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन ॥ ३१ लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः । प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम् ॥ ३२ स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च। मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ३३ भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मया श्रुतम्। यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ३४ सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः। भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ ३५ ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः ॥ ३६ हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले (स्वामी) ! आपकी जय हो। शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी शेषशायी प्रभो! आपकी जय हो। एक दाँतके कोनेपर पृथ्वीको उठानेवाले वराहरूपधारी भगवन्! आपकी जय हो। हे देवताओंके शत्रु (हिरण्यकशिपु)-के वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले केशव! आपकी जय हो। हे अपनी मायासे आवृत तथा संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा एकविध प्रभो! आपकी जय हो। हरे! आपने प्रकृतिके भाँति-भाँति विकार बढ़ाये हैं। आपकी वृद्धि हो। जगत्का यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है ॥ २३-२७॥ हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं। हे जगत्पते ! आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं। हे सर्वेश ! आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो आपको जान सके। प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको जानता है, अन्य नहीं। हे ईश्वरोंके भी ईश्वर ! हे ईशान! हे विभो ! हे भावन ! हे विश्वात्मन् ! हे पृथुलोचन ! इस विश्वके प्रभव (उत्पत्ति - सृष्टिके कारण) विष्णु ! आपकी वृद्धि हो - जय हो ॥ २८-३१॥ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार जब वामनरूपमें अवतीर्ण भगवान्की स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले- पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी स्तुति की थी। मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। इसके बाद अदितिने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा। अतः मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले (इन्द्र) संसारके स्वामी होंगे। मेरा यह कथन सत्य है ॥ ३२-३५॥ (हृषीकेश भगवान्के इस प्रकार अपने वचनकी सत्यता घोषित करनेके बाद) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हें
३३- सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४१
| आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं चीरमथाङ्गिराः॥<br>आसनं चैव पुलहः पुलस्त्यः पीतवाससी॥ ३७<br><br>उपस्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः।<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः॥ ३८<br><br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः।<br>सर्वदेवमयो देवो बलेरध्वरमभ्यगात्॥ ३९ | यज्ञोपवीत दिया। ब्रह्मपुत्र मरीचिने उन्हें पलाशदण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु और अङ्गिराने रेशमी वस्त्र दिया। पुलहने आसन तथा पुलस्त्यने दो पीले वस्त्र दिये। ओंकारके स्वरसे अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा सांख्ययोग आदि दर्शनोंकी उक्तियाँ उनका उपस्थान करने लगीं। समस्त देवताओंके मूर्तिरूप वामनभगवान् जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलु धारण करके बलिकी यज्ञभूमिमें पधारे॥ ३६—३९॥ |
| यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे वामनो ददौ।<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्राभिपीडिता॥ ४०<br><br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम्॥ ४१<br><br>बृहस्पतिस्तु शनकैर्मार्गं दर्शयते शुभम्।<br>तथा क्रीडाविनोदार्थमतिजाड्यगतोऽभवत्॥ ४२<br><br>ततः शेषो महानागो निःसृत्यासौ रसातलात्।<br>साहाय्यं कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिणः॥ ४३<br><br>तदद्यापि च विख्यातमहेर्बिलमनुत्तमम्।<br>तस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत्॥ ४४ | ब्राह्मणो! पृथ्वीपर वामनभगवान् जिस-जिस स्थानपर डग रखते थे, वहाँकी दबी हुई भूमिमें दरार पड़ जाता था—गड्डा हो जाता था। मधुरभावसे धीरे-धीरे चलते हुए वामनभगवान्ने समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसे युक्त सारी पृथ्वीको कँपा दिया। बृहस्पति भी शनैः-शनैः उन्हें सारे कल्याणकारी मार्गको दिखाने लगे एवं स्वयं भी क्रीडापूर्ण मनोरञ्जनके लिये अत्यन्त धीरे-धीरे चलने लगे। उसके बाद महानाग शेष रसातलसे ऊपर आकर देवदेव चक्रधारी भगवान्की सहायता करने लगे। आज भी वह श्रेष्ठ सर्पोंका बिल विख्यात है और उसके दर्शनमात्रसे नागोंसे भय नहीं होता॥ ४०—४४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणे तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना
| लोमहर्षण उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वी दृष्ट्वा संक्षुभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br><br>आचार्य क्षोभमायाति साब्धिभूमिधरा मही।<br>कस्माच्च नासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br><br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३ | लोमहर्षण बोले— बलिने वनों और पर्वतोंके साथ सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षोभसे भरी देखकर हाथ जोड़ करके शुक्राचार्यको प्रणाम कर पूछा—आचार्यदेव! समुद्र तथा पर्वतोंके साथ पृथ्वीके क्षुब्ध होनेका क्या कारण है और अग्निदेव असुरोंके भागोंको क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? बलिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् शुक्राचार्यने चिरकालतक ध्यान लगाकर (और |
१४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१ अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः। तथ्य समझकर) दैत्येन्द्रसे कहा-कश्यपके घरमें वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः ॥ ४ जगद्योनि - संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं ॥ १-४ ॥ स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव । दानवश्रेष्ठ ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥ ५ उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः। सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं। इस भूमिमें उन नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम् ॥ ६ भूतपति भगवान्को वहन करनेकी शक्ति नहीं है। ये ही सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। (परमात्मा) देव, असुर, गन्धर्व-देवों, मनुष्यों एवं अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः । महासुरोंको धारण करते हैं। जगत्को धारण करनेवाले धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥ ७ भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर (अचिन्त्य) माया है, इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गह्नरी। जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥ ८ रहा है ॥ ५-८ ॥ तत्संनिधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विषः। उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥ ९ दैत्यलोग यज्ञ-भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं, अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले रहे हैं। शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमाऽब्रवीद् बलिः । खड़े हो गये। उसके बाद बलिने (शुक्राचार्यसे) धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। कहा-ब्रह्मन् ! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥ १० स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें पधार रहे हैं। कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है ? सदैव सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको यं योगिनः सदोद्युक्ताः परमात्मानमव्ययम् । देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें (कृपाकर) द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति। पधार रहे हैं। आचार्य! मुझे जो करना चाहिये, उसे यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥ ११ आप आदिष्ट कीजिये ॥ ९-११ ॥ शुक्र उवाच शुक्राचार्य बोले - असुर ! वेदोंका विधान है यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर । कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं। परंतु दैत्य ! तुमने यज्ञभागका भोक्ता दानवोंको बना दिया है। (यह वेद-विधानके त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥ १२ विपरीत किया है-विधानका उल्लङ्घन किया है।) ये ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् । पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १३ ही प्रभु स्वयं प्रजाका (जीवोंका) अन्त भी करते हैं। विष्णु स्थितिके कार्यमें (कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें) भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः । तत्पर हो गये हैं। अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना विदित्त्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥ १४ है। महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी
३४- कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवंसम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४३ त्वयाऽस्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि । प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥ १५ कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः । अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः । कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १६ बलिरुवाच ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः । नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः ॥ १७ व्रतोपवासैर्विविधैर्यः प्रभुर्गृह्यते हरिः। स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ १८ यदर्थं सुसमारम्भा दमशौचगुणान्वितैः । यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥ १९ तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः। यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥ २० नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम् । प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्वचित् ॥ २१ नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् । वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ॥ २२ श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाच्चापत्समागमः । न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥ २३ मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः । न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥ २४ इच्छा हो वैसा करो। दैत्यपते! (देखना) तुम थोड़ी- सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना। व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना। महासुर! कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा देवताओंके ऐश्वर्यके लिये प्रयत्नशील भगवान् श्रीकृष्णके याचना करनेपर 'मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा' ऐसा कहना ॥ १२- १६ ॥ बलि बोले- ब्रह्मन् ! मैं दूसरोंके याचना करनेपर भी 'नहीं है' - ऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर संसारके पापोंको दूर करनेवाले (उन) देवसे कहनेकी तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे ही गोविन्द मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो इससे बढ़कर (मेरे लिये) और (भाग्य) क्या हो सकता है? जिनके लिये दम-शमादि शौच -भीतरी-बाहरी पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश (यज्ञके स्वामी) यदि मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी स्वयं मुझसे 'दो'- इस तरह कहेंगे ॥ १७-२०॥ गुरुदेव ! क्या अपने यहाँ (याचकरूपमें) आये उन परमेश्वरसे 'नहीं है' - मैं ऐसा कहूँ? (यह तो उचित नहीं जँचता) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु किसी भी याचक मनुष्यसे 'नहीं है' - यह नहीं कह सकता। दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने 'नहीं है'-ऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि 'नहीं है'? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं। क्योंकि दानका महत्त्व उससे और बढ़ जाता है। गुरो! (हाँ, साधारणतया यह समझा जाता है कि-) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता, वह निःसंदेह बलवान् कहा गया है। (पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं आ सकता; क्योंकि) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दुःखी ही है, न कोई किसीके द्वारा उद्वेलित किया गया है और न कोई
| १४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः सर्वसुखान्वितः।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २५ | शम आदि गुणोंसे रहित है। महाभाग ! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, पुण्यात्मा-धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं। अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ ॥ २१—२५ ॥ |
| एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे।<br>विदितं मुनिशार्दूल मयैतत्त्वन्मुखाच्छ्रुतम् ॥ २६<br><br>मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः ॥ २७<br><br>एतद्बीजवरे दानबीजं पतति चेद् गुरौ।<br>जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥ २८<br><br>विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टाश्च देवताः।<br>उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम्॥ २९ | मुनिशार्दूल ! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह मालूम हो गया कि मैं यहाँपर विशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ। वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे (हरि) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं। यदि श्रेष्ठ बीज (ऐसा दान) महान् (योग्य) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला ? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ-गुना सुख देनेवाला माना गया है ॥ २६—२९ ॥ |
| मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३०<br><br>अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः।<br>मां निहंतुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३१<br><br>एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे।<br>नैव भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३२ | यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है। देवताओंके देवभागकी प्राप्तिमें रुकावट होनेके कारण यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा। मुनिश्रेष्ठ ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें ॥ ३०—३२ ॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ ३३<br><br>तं दृष्ट्वा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम्।<br>जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३४<br><br>जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः ॥ ३५<br><br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः।<br>ततःसंक्षोभमापन्नो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥ ३६ | **लोमहर्षण बोले—**शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये। उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर दैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र तेजसे रहित हो गये। उस महायज्ञमें एकत्र (उपस्थित) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना-अपना जप करने लगे। बलिने भी अपने सम्पूर्ण जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद (इधर) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण किसीने कुछ भी नहीं कहा ॥ ३३—३६ ॥ |
| प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा।<br>अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान् ॥ ३७ | उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की। उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवान्ने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक दृष्टिसे (चारों ओर देखकर) उन विनम्र दैत्यपति एवं |