भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| १४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३१ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः सर्वसुखान्वितः।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २५शम आदि गुणोंसे रहित है। महाभाग ! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, पुण्यात्मा-धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं। अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ ॥ २१—२५ ॥
एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे।<br>विदितं मुनिशार्दूल मयैतत्त्वन्मुखाच्छ्रुतम् ॥ २६<br><br>मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः ॥ २७<br><br>एतद्बीजवरे दानबीजं पतति चेद् गुरौ।<br>जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥ २८<br><br>विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टाश्च देवताः।<br>उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम्॥ २९मुनिशार्दूल ! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह मालूम हो गया कि मैं यहाँपर विशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ। वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे (हरि) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं। यदि श्रेष्ठ बीज (ऐसा दान) महान् (योग्य) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला ? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ-गुना सुख देनेवाला माना गया है ॥ २६—२९ ॥
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३०<br><br>अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः।<br>मां निहंतुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३१<br><br>एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे।<br>नैव भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३२यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है। देवताओंके देवभागकी प्राप्तिमें रुकावट होनेके कारण यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा। मुनिश्रेष्ठ ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें ॥ ३०—३२ ॥
लोमहर्षण उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ ३३<br><br>तं दृष्ट्वा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम्।<br>जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३४<br><br>जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः ॥ ३५<br><br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः।<br>ततःसंक्षोभमापन्नो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥ ३६**लोमहर्षण बोले—**शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये। उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर दैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र तेजसे रहित हो गये। उस महायज्ञमें एकत्र (उपस्थित) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना-अपना जप करने लगे। बलिने भी अपने सम्पूर्ण जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद (इधर) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण किसीने कुछ भी नहीं कहा ॥ ३३—३६ ॥
प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा।<br>अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान् ॥ ३७उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की। उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवान्ने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक दृष्टिसे (चारों ओर देखकर) उन विनम्र दैत्यपति एवं