भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 153

अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४३ त्वयाऽस्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि । प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥ १५ कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः । अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः । कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १६ बलिरुवाच ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः । नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः ॥ १७ व्रतोपवासैर्विविधैर्यः प्रभुर्गृह्यते हरिः। स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ १८ यदर्थं सुसमारम्भा दमशौचगुणान्वितैः । यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥ १९ तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः। यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥ २० नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम् । प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्वचित् ॥ २१ नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् । वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ॥ २२ श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाच्चापत्समागमः । न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥ २३ मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः । न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥ २४ इच्छा हो वैसा करो। दैत्यपते! (देखना) तुम थोड़ी- सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना। व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना। महासुर! कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा देवताओंके ऐश्वर्यके लिये प्रयत्नशील भगवान् श्रीकृष्णके याचना करनेपर 'मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा' ऐसा कहना ॥ १२- १६ ॥ बलि बोले- ब्रह्मन् ! मैं दूसरोंके याचना करनेपर भी 'नहीं है' - ऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर संसारके पापोंको दूर करनेवाले (उन) देवसे कहनेकी तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे ही गोविन्द मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो इससे बढ़कर (मेरे लिये) और (भाग्य) क्या हो सकता है? जिनके लिये दम-शमादि शौच -भीतरी-बाहरी पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश (यज्ञके स्वामी) यदि मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी स्वयं मुझसे 'दो'- इस तरह कहेंगे ॥ १७-२०॥ गुरुदेव ! क्या अपने यहाँ (याचकरूपमें) आये उन परमेश्वरसे 'नहीं है' - मैं ऐसा कहूँ? (यह तो उचित नहीं जँचता) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु किसी भी याचक मनुष्यसे 'नहीं है' - यह नहीं कह सकता। दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने 'नहीं है'-ऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि 'नहीं है'? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं। क्योंकि दानका महत्त्व उससे और बढ़ जाता है। गुरो! (हाँ, साधारणतया यह समझा जाता है कि-) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता, वह निःसंदेह बलवान् कहा गया है। (पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं आ सकता; क्योंकि) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दुःखी ही है, न कोई किसीके द्वारा उद्वेलित किया गया है और न कोई