भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१ अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः। तथ्य समझकर) दैत्येन्द्रसे कहा-कश्यपके घरमें वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः ॥ ४ जगद्योनि - संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं ॥ १-४ ॥ स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव । दानवश्रेष्ठ ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥ ५ उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः। सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं। इस भूमिमें उन नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम् ॥ ६ भूतपति भगवान्को वहन करनेकी शक्ति नहीं है। ये ही सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। (परमात्मा) देव, असुर, गन्धर्व-देवों, मनुष्यों एवं अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः । महासुरोंको धारण करते हैं। जगत्को धारण करनेवाले धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥ ७ भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर (अचिन्त्य) माया है, इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गह्नरी। जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥ ८ रहा है ॥ ५-८ ॥ तत्संनिधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विषः। उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥ ९ दैत्यलोग यज्ञ-भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं, अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले रहे हैं। शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमाऽब्रवीद् बलिः । खड़े हो गये। उसके बाद बलिने (शुक्राचार्यसे) धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। कहा-ब्रह्मन् ! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥ १० स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें पधार रहे हैं। कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है ? सदैव सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको यं योगिनः सदोद्युक्ताः परमात्मानमव्ययम् । देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें (कृपाकर) द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति। पधार रहे हैं। आचार्य! मुझे जो करना चाहिये, उसे यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥ ११ आप आदिष्ट कीजिये ॥ ९-११ ॥ शुक्र उवाच शुक्राचार्य बोले - असुर ! वेदोंका विधान है यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर । कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं। परंतु दैत्य ! तुमने यज्ञभागका भोक्ता दानवोंको बना दिया है। (यह वेद-विधानके त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥ १२ विपरीत किया है-विधानका उल्लङ्घन किया है।) ये ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् । पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १३ ही प्रभु स्वयं प्रजाका (जीवोंका) अन्त भी करते हैं। विष्णु स्थितिके कार्यमें (कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें) भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः । तत्पर हो गये हैं। अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना विदित्त्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥ १४ है। महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी