भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 489 में से

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पृष्ठ 155

अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवदेवपतिः साक्षाद् विष्णुर्वामनरूपधृक्।<br>तुष्टाव यज्ञं वह्निं च यजमानमथार्चितः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदम् ॥ ३८<br>सदस्याः पात्रमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् ॥ ३९<br>स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः॥ ४०मुनिवरोंको देखा तथा यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्ममें अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्यकी सामग्रियोंकी प्रशंसा की। विप्रो! तत्काल ही सभी सदस्यगण यज्ञमण्डपमें उपस्थित पात्रस्वरूप वामनके प्रति ‘साधु-साधु’ कहने लगे। उस समय हर्षमें विह्वल होकर महासुर बलिने अर्घ लिया और गोविन्दकी पूजा की तथा उनसे यह कहा॥ ३७-४०॥
बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातो गजाश्वसमितिस्तथा।<br>स्त्रियो वस्त्रान्यलंकारान् गावो ग्रामाश्च पुष्कलाः॥ ४१<br>सर्वे च सकला पृथ्वी भवतो वा यदीप्सितम्।<br>तद् ददामि वृणुष्वेष्टं ममार्थः सन्ति ते प्रियाः॥ ४२बलिने कहा— (वामनदेव!) अनन्त सुवर्ण और रत्नोंके ढेर तथा हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, गायें तथा ग्रामसमूह—ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपकी जो अभिलाषा हो वह मैं देता हूँ। आप अपना अभीष्ट बतलायें। मेरे प्रिय लगनेवाले समस्त अर्थ आपके लिये हैं॥ ४१-४२॥
इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४३<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम्।<br>सुवर्णग्रामरत्नादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४४दैत्यपति बलिके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उदार वचन कहनेपर वामनका आकार धारण करनेवाले भगवान्ने हँसते हुए दुर्बोध वाणीमें कहा—राजन्! मुझे अग्निशालाके लिये तीन पग (भूमि) दें। सुवर्ण, ग्राम एवं रत्न आदि उनकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको प्रदान करें॥ ४३-४४॥
बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पदैः पदवतां वर।<br>शतं शतसहस्रं वा पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४५बलिने कहा— हे पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग भूमिसे आपका कौन-सा स्वार्थ सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये॥ ४५॥
श्रीवामन उवाच<br>एतावता दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमिच्छया दास्यते भवान् ॥ ४६<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः।<br>वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने ॥ ४७<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ४८<br>चन्द्रसूर्यौ तु नयने द्यौः शिरश्चरणौ क्षितिः।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ४९श्रीवामनने कहा— हे दैत्यपते! मैं इतना पानेसे ही कृतकृत्य हूँ। (मेरा स्वार्थ इतनेसे ही सिद्ध हो जायगा।) आप दूसरे याचना करनेवाले याचकोंको उनके इच्छानुकूल दान दीजियेगा। महात्मा वामनकी यह वाणी सुनकर (बलिने) उन महात्मा वामनको तीन पग भूमि देनेके लिये वचन दे दिया। दान देनेके लिये हाथपर जल गिरते ही वामन अवामन (विराट्) बन गये। तत्क्षण उन्होंने उन्हें अपना सर्वदेवमय स्वरूप दिखाया। चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश सिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैरकी अँगुलियाँ एवं गुह्यक हाथोंकी अँगुलियाँ थे॥ ४६-४९॥
विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखास्वप्सरसस्तथा ॥ ५०जानुओंमें विश्वेदेवगण, दोनों जङ्घाओंमें सुरश्रेष्ठ साध्यगण, नखोंमें यक्ष एवं रेखाओंमें अप्सराएँ थीं।
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