वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३० ] बलिको प्रह्लादको संतुष्ट करना, वामनका प्राकट्य १३९ लोमहर्षण उवाच अदितिर्वरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् । क्रमेण हृदरे देवो वृद्धिं प्राप्तो महायशाः ॥ १२ ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते। अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ॥ १३ अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे। देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ १४ ववुर्वाताः सुखस्पर्शा नीरजस्कमभून्नभः। धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥ १५ नोद्वेगश्चाप्यभूद् देहे मनुजानां द्विजोत्तमाः। तदा हि सर्वभूतानां धर्मे मतिरजायत ॥ १६ तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाव च प्रभुम् ॥ १७ ब्रह्मोवाच जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे। जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८ जयाजित जयाशेष जयाव्यक्तस्थिते जय। परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयार्थनिःसृत ॥ १९ जयाशेष जगत्साक्षिञ्जगत्कर्त्तुर्जगद्गुरो। जगतोऽजगतन्तेश स्थितौ पालयते जय ॥ २० जयाखिल जयाशेष जय सर्वहृदिस्थित। जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१ मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यहृष्ट जयेश्वर । योगिभिर्मुक्तिकामैस्तु दमादिगुणभूषण ॥ २२ जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय। जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३ जय स्वमायायोगस्थ शेषभोग जयाक्षर। जयैकदंष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४ लोमहर्षणने कहा- (उधर) अदितिने सभी कामनाओंकी समृद्धि करनेवाले वरको प्राप्त कर लिया तब उसके उदरमें महायशस्वी देव (भगवान्) धीरे- धीरे बढ़ने लगे। इसके बाद दसवें महीनेमें जब प्रसवका समय आया तब भगवान् गोविन्द वामनाकारमें उत्पन्न हो गये। संसारके स्वामी उन अखिलेश्वरके अवतार ले लेनेपर देवता और देवमाता अदिति दुःखसे मुक्त हो गये। फिर तो (संसारमें) आनन्ददायी वायु बहने लगी, गगनमण्डल बिना धूलिका (स्वच्छ) हो गया एवं सभी जीवोंकी बुद्धि धर्म करनेमें लग गयी। द्विजोत्तमो ! उस समय मनुष्योंकी देहमें कोई घबड़ाहट नहीं थी और तब समस्त प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें लग गयी। उनके उत्पन्न होते ही लोकपितामह ब्रह्माने उनकी तत्काल जातकर्म आदि क्रिया (संस्कार) सम्पन्न करके उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १२-१७॥ ब्रह्मा बोले- अधीश ! आपकी जय हो। अजेय ! आपकी जय हो। विश्वके गुरु हरि ! आपकी जय हो। जन्म-मृत्यु तथा जरासे अतीत अनन्त ! आपकी जय हो। अच्युत ! आपकी जय हो। अजित ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। अव्यक्त स्थितिवाले भगवन् ! आपकी जय हो। परमार्थार्थकी (उत्तम अभिप्रायकी) पूर्तिमें निमित्त ! ज्ञान और ज्ञेयके अर्थके उत्पादक सर्वज्ञ ! आपकी जय हो। अशेष जगत्के साक्षी ! जगत्के कर्ता ! जगद्गुरु ! आपकी जय हो। जगत् (चर) एवं अजगत् (अचर) -के स्थिति, पालन एवं प्रलयके स्वामी ! आपकी जय हो। अखिल ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। सभीके हृदयमें रहनेवाले प्रभो ! आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तस्वरूप ! समस्त ज्ञानकी मूर्ति, उत्तम ! आपकी जय हो। मुमुक्षुओंके द्वारा अनिर्देश्य, नित्य-प्रसन्न ईश्वर ! आपकी जय हो। हे मुक्तिकी कामना करनेवाले योगियोंसे सेवित, दम आदि गुणोंसे विभूषित परमेश्वर ! आपकी जय हो ॥ १८-२२॥ हे अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपवाले ! हे दुर्ज्ञेय (कठिनतासे समझमें आनेवाले) ! आपकी जय हो। हे स्थूल और जगत्-मूर्ति ! आपकी जय हो। हे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभो ! आपकी जय हो। हे इन्द्रियोंसे रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त (नाथ) ! आपकी जय हो।