वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३० नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण। साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥ २५ निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन। जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥ २६ वर्द्धस्व वर्द्धितानेकविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ॥ २७ न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे। ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः ॥ २८ त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते। कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः ॥ २९ त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुखः प्रभो। स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जनः ॥ ३० तदीश्र्वरेश्र्वरेशान विभो वर्द्धस्व भावन। प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन ॥ ३१ लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः । प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम् ॥ ३२ स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च। मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ३३ भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मया श्रुतम्। यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ३४ सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः। भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ ३५ ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः ॥ ३६ हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले (स्वामी) ! आपकी जय हो। शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी शेषशायी प्रभो! आपकी जय हो। एक दाँतके कोनेपर पृथ्वीको उठानेवाले वराहरूपधारी भगवन्! आपकी जय हो। हे देवताओंके शत्रु (हिरण्यकशिपु)-के वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले केशव! आपकी जय हो। हे अपनी मायासे आवृत तथा संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा एकविध प्रभो! आपकी जय हो। हरे! आपने प्रकृतिके भाँति-भाँति विकार बढ़ाये हैं। आपकी वृद्धि हो। जगत्का यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है ॥ २३-२७॥ हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं। हे जगत्पते ! आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं। हे सर्वेश ! आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो आपको जान सके। प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको जानता है, अन्य नहीं। हे ईश्वरोंके भी ईश्वर ! हे ईशान! हे विभो ! हे भावन ! हे विश्वात्मन् ! हे पृथुलोचन ! इस विश्वके प्रभव (उत्पत्ति - सृष्टिके कारण) विष्णु ! आपकी वृद्धि हो - जय हो ॥ २८-३१॥ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार जब वामनरूपमें अवतीर्ण भगवान्की स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले- पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी स्तुति की थी। मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। इसके बाद अदितिने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा। अतः मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले (इन्द्र) संसारके स्वामी होंगे। मेरा यह कथन सत्य है ॥ ३२-३५॥ (हृषीकेश भगवान्के इस प्रकार अपने वचनकी सत्यता घोषित करनेके बाद) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हें