वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३०
तीसवाँ अध्याय
बलि का प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा |
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| इति दैत्यपतिः श्रुत्वा वचनं रौद्रमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ १ | —दैत्यपति बलि प्रह्लादकी इस प्रकार कठोर एवं अप्रिय उक्तिको सुनकर उनके चरणोंमें बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए मनाने लगा॥ १॥ |
| बलिरुवाच | बलिने कहा |
|---|---|
| प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमूढेन मयैतद्वाक्यमीरितम्॥ २<br><br>मोहापहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ३<br><br>राज्यभ्रंशं यशोभ्रंशं प्राप्स्यामीति ततस्त्वहम्।<br>विषण्णोऽसि यथा तात तथैवाविनये कृते॥ ४<br><br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्तात गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५<br><br>प्रसीद तात मा कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपपरिदग्धोऽहं परितप्ये दिवानिशम्॥ ६ | —तात! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों, मैं मूढ़ हो गया था, मेरे ऊपर क्रोध न करें। बलके घमण्डसे विवेकहीन होनेके कारण मैंने यह वचन कहा था। दैत्यश्रेष्ठ! मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, मैं अधम हूँ। मैंने सदाचारका पालन नहीं किया, जिससे मुझ पापाचारीको आपने जो शाप दिया, वह बहुत ठीक किया। तात! आप (यतः) मेरी उद्दण्डताके कारण बहुत दुःखी हैं, अतः मैं राज्यसे च्युत और अपनी कीर्तिसे रहित हो जाऊँगा। तात! संसारमें तीनों लोकोंका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य किसी (वस्तु)-का मिलना बहुत कठिन नहीं है, परंतु आप-जैसे जो गुरुजन हैं, वे संसारमें दुर्लभ हैं। दैत्योंकी रक्षा करनेवाले तात! आप प्रसन्न हों, क्रोध न करें। आपका क्रोध मुझे जला रहा है, इसलिये मैं दिन-रात (आठों प्रहर) संतप्त हो रहा हूँ॥ २—६॥ |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले |
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| वत्स कोपेन मे मोहो जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ७<br><br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं कच्चिच्छपाम्यहम्॥ ८<br><br>यो यः शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुंगव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मात्त्वं मा विषीद वै॥ ९<br><br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ १०<br><br>शापं प्राप्य च मे वीर देवेशः संस्मृतस्त्वया।<br>तथा तथा वदिष्यामि श्रेयस्त्वं प्राप्स्यसे यथा॥ ११ | —वत्स! क्रोधके कारण हमें मोह उत्पन्न हो गया था और उसीने मेरी विचार करनेवाली बुद्धि भी नष्ट कर दी थी, इसीसे मैंने तुम्हें शाप दे दिया। महासुर! यदि मोहवश मेरा ज्ञान दूर नहीं हुआ होता तो मैं भगवान्को सब जगह विद्यमान जानता हुआ भी तुम्हें शाप कैसे देता। असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो क्रोधवश शाप दिया है, वह तो तुम्हारे लिये होगा, किंतु तुम दुःखी मत हो; बल्कि आजसे तुम उन देवोंके भी ईश्वर भगवान् अच्युत हरिकी भक्ति करनेवाले बन जाओ—भक्त हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक हो जायेंगे। वीर! मेरा शाप पाकर तुमने देवेश्वर भगवान्का स्मरण किया है, अतः मैं तुमसे वही कहूँगा, जिससे तुम कल्याणको प्राप्त करो॥ ७—११॥ |