भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147
अध्याय २९ ]बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>दुर्बुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ३९हुए हैं, उनके विषयमें विनाशकी ओर चलनेवाले विवेकहीन, मूर्ख, इन्द्रियोंके गुलाम, वृद्धोंके आदेशोंका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारी अपेक्षा कौन ऐसा (कृत्या नामसे) कह सकेगा?॥ ३६—३९॥
शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताऽधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवावमानकः॥ ४०<br><br>तिष्ठत्यनेकंससारसंघातौघविनाशिनि ।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावद्वेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४१<br><br>न मे प्रियतरः कृष्णादपि देहोऽयमात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको भवांश्च दितिनन्दन॥ ४२<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४३<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरुर्नारायणो हरिः॥ ४४मैं (ही सचमुच) शोचनीय हूँ, जिसके घरमें तुम्हारा अधम पिता उत्पन्न हुआ, जिसका तुम्हारे-जैसा देवदेव (विष्णु)-का तिरस्कार करनेवाला पुत्र है। जो अनेक संसारके समूहोंके प्रवाहका विनाश करनेवाले हैं, ऐसे कृष्णमें भक्तिके लिये तुम्हें क्या मेरा भी ध्यान नहीं रहा। दितिनन्दन! मेरे विषयमें समस्त संसार एवं तुम भी यह जानते हो कि मुझे यह मेरी देह भी कृष्णसे अधिक प्रिय नहीं है। फिर यह समझते हुए भी कि भगवान् कृष्ण मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, फिर भी तुम मेरी मर्यादापर ध्यान न देकर ठेस पहुँचाते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु (पिता) विरोचन है, उसका गुरु (पिता) मैं हूँ तथा मेरे भी गुरु सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी भगवान् नारायण श्रीहरि हैं॥ ४०—४४॥
निन्दां करोषि तस्मिंस्त्वं कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात् तस्मादिहैव त्वमैश्वर्याद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४५<br><br>स देवो जगतां नाथो बले प्रभुर्जनार्दनः।<br>नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते भक्तिमानत्र मे गुरुः॥ ४६<br><br>एतावन्मात्रमप्यत्र निन्दता जगतो गुरुम्।<br>नापेक्षितस्त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४७<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं बले।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपं राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४८<br><br>यथा न कृष्णादपरः परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाऽचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ४९जिस कारण तुम अपने गुरु (पिता विरोचन)-के गुरु (पिता मैं प्रह्लाद)-के भी गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इस कारण तुम यहीं ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! वे प्रभु जनार्दनदेव जगत्‌के स्वामी हैं। इस विषयमें मेरा गुरु (अर्थात् मैं) भक्तिमान् हूँ, यह विचारकर तुझे मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। जिस कारणसे जगद्गुरुकी निन्दा करनेवाले तुमने मेरी इतनी भी अपेक्षा नहीं की, इस कारण मैं तुम्हें शाप देता हूँ; क्योंकि बलि! तुम्हारे द्वारा अच्युतके प्रति अपमानजनित ये वचन मेरे लिये सिर कट जानेसे भी अधिक कष्टदायी हैं, अतः तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर गिर जाओ। भवसागरमें भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई रक्षक नहीं है, अतः शीघ्र ही मैं तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट हुआ देखूँगा॥ ४५—४९॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९॥