वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय २९ ] | बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन | १३७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>दुर्बुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ३९ | हुए हैं, उनके विषयमें विनाशकी ओर चलनेवाले विवेकहीन, मूर्ख, इन्द्रियोंके गुलाम, वृद्धोंके आदेशोंका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारी अपेक्षा कौन ऐसा (कृत्या नामसे) कह सकेगा?॥ ३६—३९॥ |
| शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताऽधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवावमानकः॥ ४०<br><br>तिष्ठत्यनेकंससारसंघातौघविनाशिनि ।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावद्वेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४१<br><br>न मे प्रियतरः कृष्णादपि देहोऽयमात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको भवांश्च दितिनन्दन॥ ४२<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४३<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरुर्नारायणो हरिः॥ ४४ | मैं (ही सचमुच) शोचनीय हूँ, जिसके घरमें तुम्हारा अधम पिता उत्पन्न हुआ, जिसका तुम्हारे-जैसा देवदेव (विष्णु)-का तिरस्कार करनेवाला पुत्र है। जो अनेक संसारके समूहोंके प्रवाहका विनाश करनेवाले हैं, ऐसे कृष्णमें भक्तिके लिये तुम्हें क्या मेरा भी ध्यान नहीं रहा। दितिनन्दन! मेरे विषयमें समस्त संसार एवं तुम भी यह जानते हो कि मुझे यह मेरी देह भी कृष्णसे अधिक प्रिय नहीं है। फिर यह समझते हुए भी कि भगवान् कृष्ण मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, फिर भी तुम मेरी मर्यादापर ध्यान न देकर ठेस पहुँचाते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु (पिता) विरोचन है, उसका गुरु (पिता) मैं हूँ तथा मेरे भी गुरु सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् नारायण श्रीहरि हैं॥ ४०—४४॥ |
| निन्दां करोषि तस्मिंस्त्वं कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात् तस्मादिहैव त्वमैश्वर्याद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४५<br><br>स देवो जगतां नाथो बले प्रभुर्जनार्दनः।<br>नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते भक्तिमानत्र मे गुरुः॥ ४६<br><br>एतावन्मात्रमप्यत्र निन्दता जगतो गुरुम्।<br>नापेक्षितस्त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४७<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं बले।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपं राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४८<br><br>यथा न कृष्णादपरः परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाऽचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ४९ | जिस कारण तुम अपने गुरु (पिता विरोचन)-के गुरु (पिता मैं प्रह्लाद)-के भी गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इस कारण तुम यहीं ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! वे प्रभु जनार्दनदेव जगत्के स्वामी हैं। इस विषयमें मेरा गुरु (अर्थात् मैं) भक्तिमान् हूँ, यह विचारकर तुझे मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। जिस कारणसे जगद्गुरुकी निन्दा करनेवाले तुमने मेरी इतनी भी अपेक्षा नहीं की, इस कारण मैं तुम्हें शाप देता हूँ; क्योंकि बलि! तुम्हारे द्वारा अच्युतके प्रति अपमानजनित ये वचन मेरे लिये सिर कट जानेसे भी अधिक कष्टदायी हैं, अतः तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर गिर जाओ। भवसागरमें भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई रक्षक नहीं है, अतः शीघ्र ही मैं तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट हुआ देखूँगा॥ ४५—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९॥
१३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३०
तीसवाँ अध्याय
बलि का प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा |
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| इति दैत्यपतिः श्रुत्वा वचनं रौद्रमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ १ | —दैत्यपति बलि प्रह्लादकी इस प्रकार कठोर एवं अप्रिय उक्तिको सुनकर उनके चरणोंमें बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए मनाने लगा॥ १॥ |
| बलिरुवाच | बलिने कहा |
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| प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमूढेन मयैतद्वाक्यमीरितम्॥ २<br><br>मोहापहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ३<br><br>राज्यभ्रंशं यशोभ्रंशं प्राप्स्यामीति ततस्त्वहम्।<br>विषण्णोऽसि यथा तात तथैवाविनये कृते॥ ४<br><br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्तात गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५<br><br>प्रसीद तात मा कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपपरिदग्धोऽहं परितप्ये दिवानिशम्॥ ६ | —तात! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों, मैं मूढ़ हो गया था, मेरे ऊपर क्रोध न करें। बलके घमण्डसे विवेकहीन होनेके कारण मैंने यह वचन कहा था। दैत्यश्रेष्ठ! मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, मैं अधम हूँ। मैंने सदाचारका पालन नहीं किया, जिससे मुझ पापाचारीको आपने जो शाप दिया, वह बहुत ठीक किया। तात! आप (यतः) मेरी उद्दण्डताके कारण बहुत दुःखी हैं, अतः मैं राज्यसे च्युत और अपनी कीर्तिसे रहित हो जाऊँगा। तात! संसारमें तीनों लोकोंका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य किसी (वस्तु)-का मिलना बहुत कठिन नहीं है, परंतु आप-जैसे जो गुरुजन हैं, वे संसारमें दुर्लभ हैं। दैत्योंकी रक्षा करनेवाले तात! आप प्रसन्न हों, क्रोध न करें। आपका क्रोध मुझे जला रहा है, इसलिये मैं दिन-रात (आठों प्रहर) संतप्त हो रहा हूँ॥ २—६॥ |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले |
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| वत्स कोपेन मे मोहो जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ७<br><br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं कच्चिच्छपाम्यहम्॥ ८<br><br>यो यः शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुंगव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मात्त्वं मा विषीद वै॥ ९<br><br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ १०<br><br>शापं प्राप्य च मे वीर देवेशः संस्मृतस्त्वया।<br>तथा तथा वदिष्यामि श्रेयस्त्वं प्राप्स्यसे यथा॥ ११ | —वत्स! क्रोधके कारण हमें मोह उत्पन्न हो गया था और उसीने मेरी विचार करनेवाली बुद्धि भी नष्ट कर दी थी, इसीसे मैंने तुम्हें शाप दे दिया। महासुर! यदि मोहवश मेरा ज्ञान दूर नहीं हुआ होता तो मैं भगवान्को सब जगह विद्यमान जानता हुआ भी तुम्हें शाप कैसे देता। असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो क्रोधवश शाप दिया है, वह तो तुम्हारे लिये होगा, किंतु तुम दुःखी मत हो; बल्कि आजसे तुम उन देवोंके भी ईश्वर भगवान् अच्युत हरिकी भक्ति करनेवाले बन जाओ—भक्त हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक हो जायेंगे। वीर! मेरा शाप पाकर तुमने देवेश्वर भगवान्का स्मरण किया है, अतः मैं तुमसे वही कहूँगा, जिससे तुम कल्याणको प्राप्त करो॥ ७—११॥ |
३२- सरस्वती नदीका वर्णन—उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना
अध्याय ३० ] बलिको प्रह्लादको संतुष्ट करना, वामनका प्राकट्य १३९ लोमहर्षण उवाच अदितिर्वरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् । क्रमेण हृदरे देवो वृद्धिं प्राप्तो महायशाः ॥ १२ ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते। अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ॥ १३ अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे। देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ १४ ववुर्वाताः सुखस्पर्शा नीरजस्कमभून्नभः। धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥ १५ नोद्वेगश्चाप्यभूद् देहे मनुजानां द्विजोत्तमाः। तदा हि सर्वभूतानां धर्मे मतिरजायत ॥ १६ तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाव च प्रभुम् ॥ १७ ब्रह्मोवाच जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे। जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८ जयाजित जयाशेष जयाव्यक्तस्थिते जय। परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयार्थनिःसृत ॥ १९ जयाशेष जगत्साक्षिञ्जगत्कर्त्तुर्जगद्गुरो। जगतोऽजगतन्तेश स्थितौ पालयते जय ॥ २० जयाखिल जयाशेष जय सर्वहृदिस्थित। जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१ मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यहृष्ट जयेश्वर । योगिभिर्मुक्तिकामैस्तु दमादिगुणभूषण ॥ २२ जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय। जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३ जय स्वमायायोगस्थ शेषभोग जयाक्षर। जयैकदंष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४ लोमहर्षणने कहा- (उधर) अदितिने सभी कामनाओंकी समृद्धि करनेवाले वरको प्राप्त कर लिया तब उसके उदरमें महायशस्वी देव (भगवान्) धीरे- धीरे बढ़ने लगे। इसके बाद दसवें महीनेमें जब प्रसवका समय आया तब भगवान् गोविन्द वामनाकारमें उत्पन्न हो गये। संसारके स्वामी उन अखिलेश्वरके अवतार ले लेनेपर देवता और देवमाता अदिति दुःखसे मुक्त हो गये। फिर तो (संसारमें) आनन्ददायी वायु बहने लगी, गगनमण्डल बिना धूलिका (स्वच्छ) हो गया एवं सभी जीवोंकी बुद्धि धर्म करनेमें लग गयी। द्विजोत्तमो ! उस समय मनुष्योंकी देहमें कोई घबड़ाहट नहीं थी और तब समस्त प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें लग गयी। उनके उत्पन्न होते ही लोकपितामह ब्रह्माने उनकी तत्काल जातकर्म आदि क्रिया (संस्कार) सम्पन्न करके उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १२-१७॥ ब्रह्मा बोले- अधीश ! आपकी जय हो। अजेय ! आपकी जय हो। विश्वके गुरु हरि ! आपकी जय हो। जन्म-मृत्यु तथा जरासे अतीत अनन्त ! आपकी जय हो। अच्युत ! आपकी जय हो। अजित ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। अव्यक्त स्थितिवाले भगवन् ! आपकी जय हो। परमार्थार्थकी (उत्तम अभिप्रायकी) पूर्तिमें निमित्त ! ज्ञान और ज्ञेयके अर्थके उत्पादक सर्वज्ञ ! आपकी जय हो। अशेष जगत्के साक्षी ! जगत्के कर्ता ! जगद्गुरु ! आपकी जय हो। जगत् (चर) एवं अजगत् (अचर) -के स्थिति, पालन एवं प्रलयके स्वामी ! आपकी जय हो। अखिल ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी जय हो। सभीके हृदयमें रहनेवाले प्रभो ! आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तस्वरूप ! समस्त ज्ञानकी मूर्ति, उत्तम ! आपकी जय हो। मुमुक्षुओंके द्वारा अनिर्देश्य, नित्य-प्रसन्न ईश्वर ! आपकी जय हो। हे मुक्तिकी कामना करनेवाले योगियोंसे सेवित, दम आदि गुणोंसे विभूषित परमेश्वर ! आपकी जय हो ॥ १८-२२॥ हे अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपवाले ! हे दुर्ज्ञेय (कठिनतासे समझमें आनेवाले) ! आपकी जय हो। हे स्थूल और जगत्-मूर्ति ! आपकी जय हो। हे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभो ! आपकी जय हो। हे इन्द्रियोंसे रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त (नाथ) ! आपकी जय हो।
१४० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३० नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण। साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥ २५ निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन। जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥ २६ वर्द्धस्व वर्द्धितानेकविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ॥ २७ न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे। ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः ॥ २८ त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते। कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः ॥ २९ त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुखः प्रभो। स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जनः ॥ ३० तदीश्र्वरेश्र्वरेशान विभो वर्द्धस्व भावन। प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन ॥ ३१ लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः । प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम् ॥ ३२ स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च। मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ३३ भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मया श्रुतम्। यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ३४ सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः। भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ ३५ ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः ॥ ३६ हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले (स्वामी) ! आपकी जय हो। शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी शेषशायी प्रभो! आपकी जय हो। एक दाँतके कोनेपर पृथ्वीको उठानेवाले वराहरूपधारी भगवन्! आपकी जय हो। हे देवताओंके शत्रु (हिरण्यकशिपु)-के वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले केशव! आपकी जय हो। हे अपनी मायासे आवृत तथा संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा एकविध प्रभो! आपकी जय हो। हरे! आपने प्रकृतिके भाँति-भाँति विकार बढ़ाये हैं। आपकी वृद्धि हो। जगत्का यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है ॥ २३-२७॥ हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं। हे जगत्पते ! आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं। हे सर्वेश ! आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो आपको जान सके। प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको जानता है, अन्य नहीं। हे ईश्वरोंके भी ईश्वर ! हे ईशान! हे विभो ! हे भावन ! हे विश्वात्मन् ! हे पृथुलोचन ! इस विश्वके प्रभव (उत्पत्ति - सृष्टिके कारण) विष्णु ! आपकी वृद्धि हो - जय हो ॥ २८-३१॥ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार जब वामनरूपमें अवतीर्ण भगवान्की स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले- पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी स्तुति की थी। मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। इसके बाद अदितिने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा। अतः मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले (इन्द्र) संसारके स्वामी होंगे। मेरा यह कथन सत्य है ॥ ३२-३५॥ (हृषीकेश भगवान्के इस प्रकार अपने वचनकी सत्यता घोषित करनेके बाद) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हें
३३- सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४१
| आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं चीरमथाङ्गिराः॥<br>आसनं चैव पुलहः पुलस्त्यः पीतवाससी॥ ३७<br><br>उपस्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः।<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः॥ ३८<br><br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः।<br>सर्वदेवमयो देवो बलेरध्वरमभ्यगात्॥ ३९ | यज्ञोपवीत दिया। ब्रह्मपुत्र मरीचिने उन्हें पलाशदण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु और अङ्गिराने रेशमी वस्त्र दिया। पुलहने आसन तथा पुलस्त्यने दो पीले वस्त्र दिये। ओंकारके स्वरसे अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा सांख्ययोग आदि दर्शनोंकी उक्तियाँ उनका उपस्थान करने लगीं। समस्त देवताओंके मूर्तिरूप वामनभगवान् जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलु धारण करके बलिकी यज्ञभूमिमें पधारे॥ ३६—३९॥ |
| यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे वामनो ददौ।<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्राभिपीडिता॥ ४०<br><br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम्॥ ४१<br><br>बृहस्पतिस्तु शनकैर्मार्गं दर्शयते शुभम्।<br>तथा क्रीडाविनोदार्थमतिजाड्यगतोऽभवत्॥ ४२<br><br>ततः शेषो महानागो निःसृत्यासौ रसातलात्।<br>साहाय्यं कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिणः॥ ४३<br><br>तदद्यापि च विख्यातमहेर्बिलमनुत्तमम्।<br>तस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत्॥ ४४ | ब्राह्मणो! पृथ्वीपर वामनभगवान् जिस-जिस स्थानपर डग रखते थे, वहाँकी दबी हुई भूमिमें दरार पड़ जाता था—गड्डा हो जाता था। मधुरभावसे धीरे-धीरे चलते हुए वामनभगवान्ने समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसे युक्त सारी पृथ्वीको कँपा दिया। बृहस्पति भी शनैः-शनैः उन्हें सारे कल्याणकारी मार्गको दिखाने लगे एवं स्वयं भी क्रीडापूर्ण मनोरञ्जनके लिये अत्यन्त धीरे-धीरे चलने लगे। उसके बाद महानाग शेष रसातलसे ऊपर आकर देवदेव चक्रधारी भगवान्की सहायता करने लगे। आज भी वह श्रेष्ठ सर्पोंका बिल विख्यात है और उसके दर्शनमात्रसे नागोंसे भय नहीं होता॥ ४०—४४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणे तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना
| लोमहर्षण उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वी दृष्ट्वा संक्षुभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br><br>आचार्य क्षोभमायाति साब्धिभूमिधरा मही।<br>कस्माच्च नासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br><br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३ | लोमहर्षण बोले— बलिने वनों और पर्वतोंके साथ सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षोभसे भरी देखकर हाथ जोड़ करके शुक्राचार्यको प्रणाम कर पूछा—आचार्यदेव! समुद्र तथा पर्वतोंके साथ पृथ्वीके क्षुब्ध होनेका क्या कारण है और अग्निदेव असुरोंके भागोंको क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? बलिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् शुक्राचार्यने चिरकालतक ध्यान लगाकर (और |
१४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१ अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः। तथ्य समझकर) दैत्येन्द्रसे कहा-कश्यपके घरमें वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः ॥ ४ जगद्योनि - संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं ॥ १-४ ॥ स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव । दानवश्रेष्ठ ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥ ५ उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः। सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं। इस भूमिमें उन नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम् ॥ ६ भूतपति भगवान्को वहन करनेकी शक्ति नहीं है। ये ही सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। (परमात्मा) देव, असुर, गन्धर्व-देवों, मनुष्यों एवं अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः । महासुरोंको धारण करते हैं। जगत्को धारण करनेवाले धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥ ७ भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर (अचिन्त्य) माया है, इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गह्नरी। जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥ ८ रहा है ॥ ५-८ ॥ तत्संनिधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विषः। उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥ ९ दैत्यलोग यज्ञ-भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं, अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले रहे हैं। शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमाऽब्रवीद् बलिः । खड़े हो गये। उसके बाद बलिने (शुक्राचार्यसे) धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। कहा-ब्रह्मन् ! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥ १० स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें पधार रहे हैं। कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है ? सदैव सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको यं योगिनः सदोद्युक्ताः परमात्मानमव्ययम् । देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें (कृपाकर) द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति। पधार रहे हैं। आचार्य! मुझे जो करना चाहिये, उसे यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥ ११ आप आदिष्ट कीजिये ॥ ९-११ ॥ शुक्र उवाच शुक्राचार्य बोले - असुर ! वेदोंका विधान है यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर । कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं। परंतु दैत्य ! तुमने यज्ञभागका भोक्ता दानवोंको बना दिया है। (यह वेद-विधानके त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥ १२ विपरीत किया है-विधानका उल्लङ्घन किया है।) ये ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् । पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १३ ही प्रभु स्वयं प्रजाका (जीवोंका) अन्त भी करते हैं। विष्णु स्थितिके कार्यमें (कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें) भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः । तत्पर हो गये हैं। अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना विदित्त्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥ १४ है। महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी
३४- कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवंसम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४३ त्वयाऽस्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि । प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥ १५ कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः । अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः । कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १६ बलिरुवाच ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः । नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः ॥ १७ व्रतोपवासैर्विविधैर्यः प्रभुर्गृह्यते हरिः। स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ १८ यदर्थं सुसमारम्भा दमशौचगुणान्वितैः । यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥ १९ तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः। यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥ २० नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम् । प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्वचित् ॥ २१ नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् । वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ॥ २२ श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाच्चापत्समागमः । न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥ २३ मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः । न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥ २४ इच्छा हो वैसा करो। दैत्यपते! (देखना) तुम थोड़ी- सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना। व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना। महासुर! कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा देवताओंके ऐश्वर्यके लिये प्रयत्नशील भगवान् श्रीकृष्णके याचना करनेपर 'मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा' ऐसा कहना ॥ १२- १६ ॥ बलि बोले- ब्रह्मन् ! मैं दूसरोंके याचना करनेपर भी 'नहीं है' - ऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर संसारके पापोंको दूर करनेवाले (उन) देवसे कहनेकी तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे ही गोविन्द मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो इससे बढ़कर (मेरे लिये) और (भाग्य) क्या हो सकता है? जिनके लिये दम-शमादि शौच -भीतरी-बाहरी पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश (यज्ञके स्वामी) यदि मुझसे 'दो' इस प्रकार कहेंगे तो मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी स्वयं मुझसे 'दो'- इस तरह कहेंगे ॥ १७-२०॥ गुरुदेव ! क्या अपने यहाँ (याचकरूपमें) आये उन परमेश्वरसे 'नहीं है' - मैं ऐसा कहूँ? (यह तो उचित नहीं जँचता) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु किसी भी याचक मनुष्यसे 'नहीं है' - यह नहीं कह सकता। दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने 'नहीं है'-ऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि 'नहीं है'? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं। क्योंकि दानका महत्त्व उससे और बढ़ जाता है। गुरो! (हाँ, साधारणतया यह समझा जाता है कि-) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता, वह निःसंदेह बलवान् कहा गया है। (पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं आ सकता; क्योंकि) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दुःखी ही है, न कोई किसीके द्वारा उद्वेलित किया गया है और न कोई
| १४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः सर्वसुखान्वितः।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २५ | शम आदि गुणोंसे रहित है। महाभाग ! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, पुण्यात्मा-धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं। अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ ॥ २१—२५ ॥ |
| एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे।<br>विदितं मुनिशार्दूल मयैतत्त्वन्मुखाच्छ्रुतम् ॥ २६<br><br>मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः ॥ २७<br><br>एतद्बीजवरे दानबीजं पतति चेद् गुरौ।<br>जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥ २८<br><br>विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टाश्च देवताः।<br>उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम्॥ २९ | मुनिशार्दूल ! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह मालूम हो गया कि मैं यहाँपर विशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ। वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे (हरि) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं। यदि श्रेष्ठ बीज (ऐसा दान) महान् (योग्य) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला ? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ-गुना सुख देनेवाला माना गया है ॥ २६—२९ ॥ |
| मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३०<br><br>अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः।<br>मां निहंतुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३१<br><br>एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे।<br>नैव भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३२ | यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है। देवताओंके देवभागकी प्राप्तिमें रुकावट होनेके कारण यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा। मुनिश्रेष्ठ ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें ॥ ३०—३२ ॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ ३३<br><br>तं दृष्ट्वा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम्।<br>जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३४<br><br>जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः ॥ ३५<br><br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः।<br>ततःसंक्षोभमापन्नो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥ ३६ | **लोमहर्षण बोले—**शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये। उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर दैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र तेजसे रहित हो गये। उस महायज्ञमें एकत्र (उपस्थित) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना-अपना जप करने लगे। बलिने भी अपने सम्पूर्ण जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद (इधर) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण किसीने कुछ भी नहीं कहा ॥ ३३—३६ ॥ |
| प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा।<br>अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान् ॥ ३७ | उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की। उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवान्ने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक दृष्टिसे (चारों ओर देखकर) उन विनम्र दैत्यपति एवं |
अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवदेवपतिः साक्षाद् विष्णुर्वामनरूपधृक्।<br>तुष्टाव यज्ञं वह्निं च यजमानमथार्चितः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदम् ॥ ३८<br>सदस्याः पात्रमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् ॥ ३९<br>स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः॥ ४० | मुनिवरोंको देखा तथा यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्ममें अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्यकी सामग्रियोंकी प्रशंसा की। विप्रो! तत्काल ही सभी सदस्यगण यज्ञमण्डपमें उपस्थित पात्रस्वरूप वामनके प्रति ‘साधु-साधु’ कहने लगे। उस समय हर्षमें विह्वल होकर महासुर बलिने अर्घ लिया और गोविन्दकी पूजा की तथा उनसे यह कहा॥ ३७-४०॥ |
| बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातो गजाश्वसमितिस्तथा।<br>स्त्रियो वस्त्रान्यलंकारान् गावो ग्रामाश्च पुष्कलाः॥ ४१<br>सर्वे च सकला पृथ्वी भवतो वा यदीप्सितम्।<br>तद् ददामि वृणुष्वेष्टं ममार्थः सन्ति ते प्रियाः॥ ४२ | बलिने कहा— (वामनदेव!) अनन्त सुवर्ण और रत्नोंके ढेर तथा हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, गायें तथा ग्रामसमूह—ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपकी जो अभिलाषा हो वह मैं देता हूँ। आप अपना अभीष्ट बतलायें। मेरे प्रिय लगनेवाले समस्त अर्थ आपके लिये हैं॥ ४१-४२॥ |
| इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४३<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम्।<br>सुवर्णग्रामरत्नादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४४ | दैत्यपति बलिके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उदार वचन कहनेपर वामनका आकार धारण करनेवाले भगवान्ने हँसते हुए दुर्बोध वाणीमें कहा—राजन्! मुझे अग्निशालाके लिये तीन पग (भूमि) दें। सुवर्ण, ग्राम एवं रत्न आदि उनकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको प्रदान करें॥ ४३-४४॥ |
| बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पदैः पदवतां वर।<br>शतं शतसहस्रं वा पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४५ | बलिने कहा— हे पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग भूमिसे आपका कौन-सा स्वार्थ सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये॥ ४५॥ |
| श्रीवामन उवाच<br>एतावता दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमिच्छया दास्यते भवान् ॥ ४६<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः।<br>वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने ॥ ४७<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ४८<br>चन्द्रसूर्यौ तु नयने द्यौः शिरश्चरणौ क्षितिः।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ४९ | श्रीवामनने कहा— हे दैत्यपते! मैं इतना पानेसे ही कृतकृत्य हूँ। (मेरा स्वार्थ इतनेसे ही सिद्ध हो जायगा।) आप दूसरे याचना करनेवाले याचकोंको उनके इच्छानुकूल दान दीजियेगा। महात्मा वामनकी यह वाणी सुनकर (बलिने) उन महात्मा वामनको तीन पग भूमि देनेके लिये वचन दे दिया। दान देनेके लिये हाथपर जल गिरते ही वामन अवामन (विराट्) बन गये। तत्क्षण उन्होंने उन्हें अपना सर्वदेवमय स्वरूप दिखाया। चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश सिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैरकी अँगुलियाँ एवं गुह्यक हाथोंकी अँगुलियाँ थे॥ ४६-४९॥ |
| विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखास्वप्सरसस्तथा ॥ ५० | जानुओंमें विश्वेदेवगण, दोनों जङ्घाओंमें सुरश्रेष्ठ साध्यगण, नखोंमें यक्ष एवं रेखाओंमें अप्सराएँ थीं। |
३५- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन
१४६ श्रीवामनपुराण [ अध्यायः ३१ दृष्टिर्ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः। तारका रोमकूपाणि रोमेशु च महर्षयः ॥ ५१ बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः। अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५२ प्रसादे चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः। सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५३ ग्रीवाऽदितिर्देवमाता विद्यास्तद्गलयास्तथा। स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५४ मुखे वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः। हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः ॥ ५५ पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसन्धिषु। वक्षःस्थले तथा रुद्रो धैर्ये चास्य महार्णवः ॥ ५६ उदरे चास्य गन्धर्वा मरुतश्च महाबलाः। लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः ॥ ५७ सर्वज्योतींषि यानीह तपश्च परमं महत्। तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमूत्तमम् ॥ ५८ तनौ कुक्षिषु वेदाश्च जानुनी च महामखाः। इष्टयः पशवश्चास्य द्विजानां चेष्टितानि च ॥ ५९ तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महात्मनः। उपसर्पन्ति ते दैत्याः पतङ्गा इव पावकम् ॥ ६० चिक्षुरस्तु महादैत्यः पादाङ्गुष्ठं गृहीतवान्। दन्ताभ्यां तस्य वै ग्रीवामङ्गुष्ठेनाहनद्धरिः ॥ ६१ प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः। कृत्वा रूपं महाकायं संजहाराशु मेदिनीम् ॥ ६२ तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे। नभो विक्रममाणस्य सक्थिदेशे स्थितावुभौ ॥ ६३ परं विक्रममाणस्य जानुमूले प्रभाकरौ। विष्णोरास्तां स्थितस्यैतौ देवपालनकर्मणि ॥ ६४ जित्वा लोकत्रयं तांश्च हत्वा चासुरपुंगवान्। पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुविक्रमः ॥ ६५ समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभुके केश, तारकाएँ उनके रोमकूप एवं महर्षिगण रोमोंमें स्थित थे। विदिशाएँ उनकी बाँहें, दिशाएँ उन महात्माके कर्ण, दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एवं वायु उन महात्माके नासिका-स्थानपर थे। उनके प्रसादमें (मधुर हास्यछटामें) चन्द्रदेव तथा मनमें धर्म आश्रित थे। सत्य उनकी वाणी तथा जिह्वा सरस्वतीदेवी थीं ॥ ५०-५३ ॥ देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी वलियाँ, स्वर्गद्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एवं पूषा उनकी भौंहें थे। वैश्वानर उनके मुख तथा प्रजापति वृषण थे। परंब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुंस्त्व थे। उनकी पीठमें वसु देवता, सभी सन्धियोंमें मरुद्गण, वक्षःस्थलमें रुद्र तथा उनके धैर्यमें महार्णव आश्रित थे। उनके उदरमें गन्धर्व एवं महाबली मरुद्गण स्थित थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एवं सभी विद्याएँ उनकी कटिमें स्थित थीं ॥ ५४-५७ ॥ समस्त ज्योतियाँ एवं परम महत् तप उन देवाधिदेवके उत्तम तेज थे। उनके शरीर एवं कुक्षियोंमें वेद थे तथा बड़े-बड़े यज्ञ इष्टियाँ थीं, पशु एवं ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ उनकी दोनों जानुएँ थीं। उन महात्मा विष्णुके सर्वदेवमय रूपको देखकर वे दैत्य उनके निकट उसी प्रकार जाते थे, जिस प्रकार अग्निके निकट पतंगे जाते हैं। महादैत्य चिक्षुरने दाँतोंसे उनके पैरके अँगूठेको दबोच लिया। फिर भगवान्ने अँगूठेसे उसकी ग्रीवापर प्रहार किया और - ॥ ५८-६१ ॥ अपने पैरों एवं हाथोंके तलवोंसे समस्त असुरोंको रगड़ डाला तथा विराट् शरीर धारण करके शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वीको उनसे छीन लिया। भूमिको नापते समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनोंके मध्य स्थित थे तथा आकाशके नापते समय उनके सक्थिप्रदेश (जाँघ)-में स्थित हो गये एवं परम (ऊर्ध्व) लोकका अतिक्रमण करते समय देवताओंकी रक्षा करनेमें स्थित श्रीविष्णुके जानुमूल (घुटनेके स्थान)-में चन्द्र एवं सूर्य स्थित हो गये। उरुक्रम (लंबी डगोंवाले) विष्णुने तीनों लोकोंको जीतकर एवं उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर तीनों लोक इन्द्रको दे दिये ॥ ६२-६५ ॥
अध्याय ३१] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४७
| सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात्।<br>बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ६६<br>अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः।<br>तत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया॥ ६७<br>कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम्।<br>वैवस्वते तथाऽतीते काले मन्वन्तरे तथा॥ ६८<br>सावर्णि के तु संप्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति।<br>इदानीं भुवनं सर्वं दत्तं शक्राय वै पुरा॥ ६९<br>चतुर्युगव्यवस्था च साधिका ह्येकसप्ततिः।<br>नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः॥ ७० | शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पृथ्वीतलके नीचे स्थित सुतल नामक पातालको बलिके लिये दे दिया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णुने दैत्येश्वरसे कहा—मैंने तुम्हारे द्वारा दानके लिये दिये हुए जलको अपने हाथमें ग्रहण किया है; अतः तुम्हारी उत्तम आयु कल्पप्रमाणकी होगी तथा वैवस्वत मन्वन्तरका काल व्यतीत होनेपर एवं सावर्णि क मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्रपद प्राप्त करोगे—इन्द्र बनोगे। इस समयके लिये मैंने समस्त भुवनको पहले ही इन्द्रको दे रखा है। इकहत्तर चतुर्युगीके कालसे कुछ अधिक कालतक जो समयकी व्यवस्था है अर्थात् एक मन्वन्तरके कालतक मैं उसके (इन्द्रके) विरोधियोंको अनुशासित करूँगा॥ ६६–७०॥ |
| तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले।<br>सुतलं नाम पातालं समासाद्य वचो मम॥ ७१<br>वसासुर ममादेशं यथावत्परिपालयन्।<br>तत्र देवसुखोपेत प्रासादशतसंकुले॥ ७२<br>प्रोत्फुल्लपद्मसरसि हृदशुद्धसरिद्वरे।<br>सुगन्धी रूपसम्पन्नो वराभरणभूषितः॥ ७३<br>स्रक्चन्दनादिदिग्धाङ्गो नृत्यगीतमनोहरान्।<br>उपभुञ्जन् महाभोगान् विविधान् दानवेश्वर॥ ७४<br>ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः।<br>यावत्सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं गमिष्यसि॥ ७५<br>तावत्त्वं भुङ्क्ष्व संभोगान् सर्वकामसमन्वितान्।<br>यदा सुरैश्च विप्रैश्च विरोधं त्वं करिष्यसि।<br>बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणा घोरदर्शनाः॥ ७६ | बलि! पूर्वकालमें उसने बड़ी श्रद्धासे मेरी आराधना की थी, अतः तुम मेरे कहनेसे सुतल नामक पातालमें जाकर मेरे आदेशका भलीभाँति पालन करो तथा देवताओंके सुखसे भरे-पूरे सैकड़ों प्रासादोंसे पूर्ण विकसित कमलोंवाले सरोवरों, हृदों एवं शुद्ध श्रेष्ठ सरिताओंवाले उस स्थानपर निवास करो। दानवेश्वर! सुगन्धिसे अनुलिप्त हो तथा श्रेष्ठ आभरणोंसे भूषित एवं माला और चन्दन आदिसे अलंकृत सुन्दर स्वरूपवाले तुम नृत्य और गीतसे युक्त विविध भाँतिके महान् भोगोंका उपभोग करते हुए सैकड़ों स्त्रियोंसे आवृत होकर इतने कालतक मेरी आज्ञासे वहाँ निवास करो। जबतक तुम देवताओं एवं ब्राह्मणोंसे विरोध न करोगे, तबतक समस्त कामनाओंसे युक्त भोगोंको भोगोगे। किंतु जब तुम देवों एवं ब्राह्मणोंके साथ विरोध करोगे तो देखनेमें भयंकर वरुणके पाश तुम्हें बाँध लेंगे॥ ७१–७६॥ |
| बलिरुवाच<br>तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया।<br>किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम्।<br>आप्यायितो येन देव स्मरेयं त्वामहं सदा॥ ७७ | बलिने पूछा—हे भगवन्! हे देव! आपकी आज्ञासे वहाँ पातालमें निवास करनेवाले मेरे भोगोंका साधन क्या होगा? जिससे तृप्त होकर मैं सदा आपका स्मरण करूँगा॥ ७७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम्॥ ७८ | श्रीभगवान्ने कहा—अविधिपूर्वक दिये गये दान, श्रोत्रिय ब्राह्मणसे रहित श्राद्ध तथा बिना श्रद्धाके किये गये जो हवन हैं, वे तुम्हारे भाग होंगे। |
| १४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३१ |
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| अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः।<br>फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च॥ ७९<br><br>उदकेन विना पूजा विना दर्भेण या क्रिया।<br>आज्येन च विना होमं फलं दास्यन्ति ते बले॥ ८०<br><br>यश्चेदं स्थानमाश्रित्य क्रियाः काश्चित् करिष्यति।<br>न तत्र चासुरो भागो भविष्यति कदाचन॥ ८१<br><br>ज्येष्ठाश्रमे महापुण्ये तथा विष्णुपदे ह्रदे।<br>ये च श्राद्धानि दास्यन्ति व्रतं नियममेव च॥ ८२<br><br>क्रिया कृता च या काचिद् विधिनाऽविधिनापि वा।<br>सर्वं तदक्षयं तस्य भविष्यति न संशयः॥ ८३<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां वामनं दृष्ट्वा स्नात्वा विष्णुपदे ह्रदे।<br>दानं दत्त्वा यथाशक्त्या प्राप्नोति परमं पदम्॥ ८४ | दक्षिणारहित यज्ञ, अविधिपूर्वक किये गये कर्म और व्रतसे रहित अध्ययन तुम्हें फल प्रदान करेंगे। हे बलि! जलके बिना की गयी पूजा, बिना कुशकी की गयी क्रिया और बिना घीके किये गये हवन तुमको फल देंगे। इस स्थानका आश्रय कर जो मनुष्य किन्हीं भी क्रियाओंको करेगा, उसमें कभी भी असुरोंका अधिकार न होगा। अत्यन्त पवित्र ज्येष्ठाश्रम तथा विष्णुपद सरोवरमें जो श्राद्ध, दान, व्रत या नियम-पालन करेगा तथा विधि या अविधिपूर्वक जो कोई क्रिया वहाँ की जायगी, उसके लिये वे सभी निःसंदेह अक्षय फलदायी होगा। जो मनुष्य ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें एकादशीके दिन उपवास कर द्वादशीके दिन विष्णुपद नामके सरोवरमें स्नान कर वामनका दर्शन करनेके बाद यथाशक्ति दान देगा, वह परम पदको प्राप्त करेगा॥ ७८-८४॥ | | लोमहर्षण उवाच<br><br>बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय च त्रिविष्टपम्।<br>व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८५<br><br>शशास च यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यमूर्जितः।<br>निःशेषं च तदा कालं बलिः पातालमास्थितः॥ ८६<br><br>इत्येतत् कथितं तस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>शृणुयाद्यो वामनस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ८७<br><br>बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः।<br>बलेर्विष्णोश्च चरितं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः॥ ८८<br><br>नाधयो व्याधयस्तेषां न च मोहाकुलं मनः।<br>भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन॥ ८९<br><br>च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टप्राप्तिं वियोगवान्।<br>समाप्नोति महाभागा नरः श्रुत्वा कथामिमाम्॥ ९०<br><br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो जयते महीम्।<br>वैश्यो धनसमृद्धिं च शूद्रः सुखमवाप्नुयात्।<br>वामनस्य च माहात्म्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते॥ ९१ | लोमहर्षणजी बोले—भगवान् उस सर्वव्यापी रूपसे बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्ग प्रदानकर अन्तर्हित हो गये। तबसे बलशाली इन्द्र पहलेकी भाँति तीनों लोकोंका शासन करने लगे और बलि सर्वदा पातालमें निवास करने लगे। इस प्रकार उन भगवान् (वामन) विष्णुका उत्तम माहात्म्य कहा गया; जो इसे (वामन-माहात्म्यको) सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठो! बलि एवं प्रह्लादके संवाद, बलि एवं शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि एवं विष्णुके चरितका जो मनुष्य स्मरण करेंगे, उन्हें कभी कोई आधि एवं व्याधि न होगी तथा उनका मन भी मोहसे आकुल नहीं होगा। हे महाभागो! इस कथाको सुनकर राज्यच्युत व्यक्ति अपने राज्यको एवं वियोगी मनुष्य अपने प्रियको प्राप्त करता है। (इनको सुननेसे) ब्राह्मणको वेदकी प्राप्ति होती है, क्षत्रिय पृथ्वीकी जय प्राप्त करता है तथा वैश्यको धन-समृद्धि एवं शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। वामनका माहात्म्य सुननेसे पापोंसे मुक्ति होती है॥ ८५-९१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥
३६- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन
| १५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३२ |
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| त्रयो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तथा क्रमात्।<br>त्रैधातवस्तथावस्थाः पितरश्चैवमादयः॥ ११<br><br>एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति।<br>विभिन्नदर्शनामाद्यां ब्रह्मणो हि सनातनीम्॥ १२ | वर्ग; सत्त्व, रज, तम —ये तीनों गुण; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—ये तीनों वर्ण; तीनों देव; वात, पित्त, कफ—ये तीनों धातुएँ तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ एवं पिता, पितामह, प्रपितामह—ये तीनों पितर इत्यादि—ये सभी ओंकारके मात्रात्रयस्वरूप आपके रूप हैं। आपको ब्रह्मकी विभिन्न रूपोंवाली आद्या एवं सनातनी मूर्ति कहा जाता है॥ ८—१२॥ | | सोमसंस्था हविःसंस्था पाकसंस्था सनातनी।<br>तास्त्वदुच्चारणाद् देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः॥ १३<br><br>अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्द्धमात्राश्रितं परम्।<br>अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम्॥ १४<br><br>तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम्।<br>न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते॥ १५<br><br>स विष्णुः स वृषो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च।<br>विश्वावासं विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम्॥ १६ | देवि! ब्रह्मवादी लोग आपकी शक्तिसे ही उच्चारण करके सोमसंस्था, हविःसंस्था एवं सनातनी पाकसंस्थाको सम्पन्न करते हैं। अर्धमात्रामें आश्रित आपका यह अनिर्देश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य तथा अपरिणामी है। यह आपका अनिर्देश्य पद परम रूप है, जिसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। न तो मुखसे ही इसका वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, तालु, ओष्ठ आदिसे ही। तुम्हारा वह रूप ही विष्णु, वृष (धर्म), ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एवं ज्योति है। उसीको विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एवं अनीश्वर (स्वतन्त्र) कहते हैं॥ १३—१६॥ | | सांख्यसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्।<br>अनादिमध्यनिधनं सदसच्च सदैव तु॥ १७<br><br>एकं त्वनेकधाप्येकभाववेदसमाश्रितम्।<br>अनाख्यं षड्गुणाख्यं च बह्वाख्यं त्रिगुणाश्रयम्॥ १८<br><br>नानाशक्तिविभावज्ञं नानाशक्तिविभावकम्।<br>सुखात् सुखं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम्॥ १९<br><br>एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत्।<br>अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्॥ २० | आपका यह रूप सांख्य-सिद्धान्त तथा वेदद्वारा वर्णित, (वेदोंकी) बहुत-सी शाखाओंद्धारा स्थिर किया हुआ, आदि-मध्य-अन्तसे रहित, सत्-असत् अथवा एकमात्र सत् (ही) है। यह एक तथा अनेक प्रकारका, वेदोंद्वारा एकाग्र भक्तिसे अवलम्बित, आख्या (नाम)-विहीन, ऐश्वर्य आदि षड्गुणोंसे युक्त, बहुत नामोंवाला तथा त्रिगुणाश्रय है। आपका यह तत्त्वगुणात्मक रूप सुखसे भी परम सुख, महान् सुखरूप नाना शक्तियोंके विभावको जाननेवाला है। हे देवि! वह अद्वैत तथा द्वैतमें आश्रित ‘निष्कलं’ तथा ‘सकल ब्रह्म’ आपके द्वारा व्याप्त है॥ १७—२०॥ | | येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये<br>येऽर्थाः स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः।<br>ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा<br>तेषां देवि त्वत्त एवोपलब्धिः॥ २१<br><br>यद्वा मूर्तं यदमूर्तं समस्तं<br>यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किंचित्।<br>यच्च द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्यं<br>तत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च॥ २२ | (सरस्वती) देवि! जो पदार्थ नित्य हैं तथा जो विनष्ट हो जानेवाले हैं, जो पदार्थ स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्म हैं, जो भूमिपर हैं तथा जो अन्तरिक्षमें हैं या जो इनसे भिन्न स्थानोंमें हैं, उन समस्त पदार्थोंकी प्राप्ति आपसे ही होती है। जो मूर्त या अमूर्त है वह सब कुछ और जो सब भूतोंमें एक रूपसे स्थित है एवं केवल एकमात्र है और जो द्वैतमें अलग-अलग रूपसे दिखलायी पड़ता है, वह सब कुछ आपके स्वर-व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है। |
| अध्याय ३३ ] | सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करनेका महत्त्व | १५१ |
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| एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिह्वा सरस्वती।<br>प्रत्युवाच महात्मानं मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>यत्र त्वं नेष्यसे विप्र तत्र यास्याम्यतन्द्रिता॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुकी जीभरूपिणी सरस्वतीने महामुनि महात्मा मार्कण्डेयसे कहा—हे विप्र! तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं आलस्य छोड़कर चली जाऊँगी॥ २१—२३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं ततो रामह्रदः स्मृतः।<br>कुरुणा ऋषिणा कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम्।<br>तस्य मध्येन वै गाढं पुण्या पुण्यजलावहा॥ २४ | मार्कण्डेयने कहा—आरम्भमें (इसका) पवित्र नाम ब्रह्मसर था, फिर रामह्रद प्रसिद्ध हुआ एवं उसके बाद कुरु ऋषिद्वारा कृष्ट होनेसे कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। (अब) उसके मध्यमें अत्यन्त पवित्र जलवाली गहरी सरस्वती प्रवाहित हों॥ २४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३२ ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
</div>| लोमहर्षण उवाच<br>इत्युषेर्वचनं श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>नदी प्रवाहसंयुक्ता कुरुक्षेत्रं विवेश ह॥ १<br><br>तत्र सा रन्तुकं प्राप्य पुण्यतोया सरस्वती।<br>कुरुक्षेत्रं समाप्लाव्य प्रयाता पश्चिमां दिशम्॥ २<br><br>तत्र तीर्थसहस्राणि ऋषिभिः सेवितानि च।<br>तान्यहं कीर्तयिष्यामि प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शनं पापनाशनम्।<br>स्नानं मुक्तिकरं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मणः॥ ४ | लोमहर्षणने कहा— बुद्धिमान् मार्कण्डेय ऋषिके इस उपर्युक्त वचनको सुनकर प्रवाहसे भरी हुई सरस्वती नदी कुरुक्षेत्रमें प्रविष्ट हुई। वह पवित्रसलिला सरस्वती नदी वहाँ रन्तुकमें जाकर कुरुक्षेत्रको जलसे प्लावित करती हुई, जो पश्चिम दिशाकी ओर चली गयी, वहाँ (कुरुक्षेत्रमें) हजारों तीर्थ ऋषियोंसे सेवित हैं। परमेष्ठी (ब्रह्मा)-के प्रसादसे मैं उनका वर्णन करूँगा। पापियोंके लिये भी तीर्थोंका स्मरण पुण्यदायक, उनका दर्शन पापनाशक और स्नान मुक्तिदायक कहा गया है (पुण्यशालियोंके लिये तो कहना ही क्या है) ॥ १—४॥ |
| ये स्मरन्ति च तीर्थानि देवताः प्रीणयन्ति च।<br>स्नान्ति च श्रद्दधानाश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५ | जो श्रद्धापूर्वक तीर्थोंका स्मरण करते हैं और उनमें स्नान करते हैं तथा देवताओंको प्रसन्न करते हैं, वे परम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। |
| अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।<br>यः स्मरेत कुरुक्षेत्रं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ६ | (मनुष्य) अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी अवस्थामें पड़ा हुआ हो, यदि कुरुक्षेत्रका स्मरण करे तो वह बाहर तथा भीतरसे (हर प्रकारसे) पवित्र हो जाता है। |
| कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्।<br>इत्येवं वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ | 'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा और मैं कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा'—इस प्रकारका वचन कहनेसे (भी) मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| १५२ | श्रीवामनपुराण | [अध्याय ३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा।<br>वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरुक्ता चतुर्विधा॥ ८ | मानवोंके लिये ब्रह्मज्ञान, गयामें श्राद्ध, गौओंकी रक्षामें मृत्यु और कुरुक्षेत्रमें निवास — यह चार प्रकारकी मुक्ति कही गयी है॥ ५-८॥ |
| सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।<br>तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते॥ ९<br><br>दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रे गच्छामि च वसाम्यहम्।<br>एवं यः सततं ब्रूयात् सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १०<br><br>तत्र चैव सरःस्नायी सरस्वत्यास्तटे स्थितः।<br>तस्य ज्ञानं ब्रह्ममयमत्पत्स्यति न संशयः॥ ११<br><br>देवता ऋषयः सिद्धाः सेवन्ते कुरुजाङ्गलम्।<br>तस्य संसेवनान्नित्यं ब्रह्म चात्मनि पश्यति॥ १२ | सरस्वती और दृषद्वती — इन दो देव-नदियोंके बीच देव-निर्मित देशको ब्रह्मावर्त कहते हैं। दूर देशमें स्थित रहकर भी जो मनुष्य 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, वहाँ निवास करूँगा'— इस प्रकार निरन्तर (मनमें संकल्प करता या) कहता है, वह भी सभी पापोंसे छूट जाता है। वहाँ सरस्वतीके तटपर रहते हुए सरोवरमें स्नान करनेवाले मनुष्यको निश्चित ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो जाता है। देवता, ऋषि और सिद्धलोग सदा कुरुजाङ्गल (तीर्थ)-का सेवन करते हैं। उस तीर्थका नित्य सेवन करनेसे, (वहाँ नित्य निवास करनेसे), मनुष्य अपने भीतर ब्रह्मका दर्शन करता है॥ ९—१२॥ |
| चञ्चलं हि मनुष्यत्वं प्राप्य ये मोक्षकाङ्क्षिणः।<br>सेवन्ति नियतात्मानो अपि दुष्कृतकारिणः॥ १३<br><br>ते विमुक्ताश्च कलुषैरनेकजन्मसंभवैः।<br>पश्यन्ति निर्मलं देवं हृदयस्थं सनातनम्॥ १४<br><br>ब्रह्मवेदिः कुरुक्षेत्रं पुण्यं संनिहितं सरः।<br>सेवमाना नरा नित्यं प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥ १५<br><br>ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम्।<br>कुरुक्षेत्रे मृतानां च पतनं नैव विद्यते॥ १६ | जो भी पापी चञ्चल मानव-जीवन पाकर जितेन्द्रिय होकर मोक्ष प्राप्त करनेकी कामनासे वहाँ निवास करते हैं, वे अनेक जन्मोंके पापोंसे छूट जाते हैं तथा अपने हृदयमें रहनेवाले निर्मल देव—सनातन (ब्रह्म)-का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मवेदी, कुरुक्षेत्र एवं पवित्र 'संनिहित सरोवर' का सदा सेवन करते हैं, वे परम पदको प्राप्त करते हैं। समयपर ग्रह, नक्षत्र एवं ताराओंके भी पतनका भय होता है, किंतु कुरुक्षेत्रमें मरनेवालोंका कभी पतन नहीं होता॥ १३—१६॥ |
| यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः सेवन्ति स्थानकाङ्क्षिणः॥ १७<br><br>गत्वा तु श्रद्धया युक्तः स्नात्वा स्थाणुमहाह्रदे।<br>मनसा चिन्तितं कामं लभते नात्र संशयः॥ १८<br><br>नियमं च ततः कृत्वा गत्वा सरः प्रदक्षिणम्।<br>रन्तुकं च समासाद्य क्षामयित्वा पुनः पुनः॥ १९<br><br>सरस्वत्यां नरः स्नात्वा यक्षं दृष्ट्वा प्रणम्य च।<br>पुष्पं धूपं च नैवेद्यं दत्त्वा वाचमुदीरयेत्॥ २०<br><br>तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र वनानि सरितश्च याः।<br>भ्रमिष्यामि च तीर्थानि अविघ्नं कुरु मे सदा॥ २१ | ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सराएँ और यक्ष उत्तम स्थानकी प्राप्तिके लिये जहाँ (कुरुक्षेत्रमें) निवास करते हैं, वहाँ जाकर स्थाणु नामक महासरोवरमें श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। नियम-परायण होनेके पश्चात् सरोवरकी प्रदक्षिणा करके रन्तुकमें जाकर बार-बार क्षमा-प्रार्थना करनेके बाद सरस्वती नदीमें स्नान कर यक्षका दर्शन करे और उन्हें प्रणाम करे तथा पुष्प, धूप एवं नैवेद्य देकर इस प्रकार वचन कहे— हे यक्षेन्द्र! आपकी कृपासे मैं वनों, नदियों और तीर्थोंमें भ्रमण करूँगा; उसे आप सदा विघ्नरहित करें (मेरी यात्रामें किसी प्रकारका विघ्न न हो)॥ १७—२१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३॥
अध्याय ३४ ] कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य १५३ चौंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य ऋषय ऊचुः वनानि सप्त नो ब्रूहि नव नद्यश्च याः स्मृताः। तीर्थानि च समग्राणि तीर्थस्नानफलं तथा॥ १ येन येन विधानेन यस्य तीर्थस्य यत् फलम्। तत् सर्वं विस्तरेणेह ब्रूहि पौराणिकोत्तम॥ २ लोमहर्षण उवाच शृणु सप्त वनानीह कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः। येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च॥ ३ काम्यकं च वनं पुण्यं तथाऽदितिवनं महत्। व्यासस्य च वनं पुण्यं फलकीवनमेव च॥ ४ तत्र सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्। पुण्यं शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम्॥ ५ वनान्येतानि वै सप्त नदीः शृणुत मे द्विजाः। सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी॥ ६ आपगा च महापुण्या गङ्गा मन्दाकिनी नदी। मधुस्रवा वासुनदी कौशिकी पापनाशिनी॥ ७ दृषद्वती महापुण्या तथा हिरण्वती नदी। वर्षाकालवहाः सर्वा वर्जयित्वा सरस्वतीम्॥ ८ एतासामुदकं पुण्यं प्रावृट्काले प्रकीर्तितम्। रजस्वलात्वमेतासां विद्यते न कदाचन। तीर्थस्य च प्रभावेण पुण्या ह्येताः सरिद्वराः॥ ९ शृण्वन्तु मुनयः प्रीतास्तीर्थस्नानफलं महत्। गमनं स्मरणं चैव सर्वकल्मषनाशनम्॥ १० रन्तुकं च नरो दृष्ट्वा द्वारपालं महाबलम्। यक्षं समभिवाद्यैव तीर्थयात्रां समाचरेत्॥ ११ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नाम्नाऽदितिवनं महत्। अदित्या यत्र पुत्रार्थं कृतं घोरं महत्तपः॥ १२ तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च अदितिं देवमातरम्। पुत्रं जनयते शूरं सर्वदोषविवर्जितम्। आदित्यशतसंकाशं विमानं चाधिरोहति॥ १३ ऋषियोंने [ लोमहर्षणजीसे ] कहा - (मुने! आप) हमसे उन सात वनों, नौ नदियों, समग्र तीर्थों एवं तीर्थ-स्नानके फलका वर्णन करें। पुराणवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ मुने! जिस-जिस विधानसे जिस तीर्थका जो फल होता है, उन सबको आप विस्तारपूर्वक बतलावें॥ १-२॥ लोमहर्षणने कहा- (ऋषियो!) कुरुक्षेत्रके मध्यमें जो सात वन हैं, उनका मैं वर्णन करता हूँ, आपलोग उसे सुनें। उन वनोंके नाम सभी पापोंको नष्ट करनेवाले तथा पवित्र हैं। (उन वनोंके नाम हैं-) पवित्र काम्यकवन, महान् अदितिवन, पुण्यप्रद व्यासवन, फलकीवन, सूर्यवन, महान् मधुवन तथा सर्वकल्मष- नाशक पवित्र शीतवन - ये ही सात वन हैं। हे द्विजो! (अब) नदियों (-के नाम)-को मुझसे सुनो। (उनके नाम हैं-) पवित्र सरस्वती नदी, वैतरणी नदी, महापवित्र आपगा, मन्दाकिनी गङ्गा, मधुस्रवा, वासु नदी, पापनाशिनी कौशिकी, महापवित्र दृषद्वती (कग्गर) तथा हिरण्वती नदी। इनमें सरस्वतीके अतिरिक्त सभी नदियाँ वर्षाकालमें (ही) बहनेवाली हैं॥ ३-८॥ वर्षाकालमें इनका जल पवित्र माना जाता है। इनमें कभी भी रजस्वलात्व दोष नहीं होता। तीर्थके प्रभावसे ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पवित्र हैं। हे मुनियो! आपलोग (अब) प्रसन्न होकर तीर्थस्नानका महान् फल सुनें। वहाँ जाना एवं उनका स्मरण करना समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। महाबलवान् रन्तुक नामक द्वारपालका दर्शन करनेके बाद यक्षको प्रणाम कर तीर्थयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद महान् अदितिवनमें जाना चाहिये, जहाँ अदितिने पुत्रके लिये अत्यन्त कठोर तप किया था॥ ९-१२॥ वहाँ स्नानकर तथा देवमाता अदितिका दर्शनकर मनुष्य समस्त दोषोंसे रहित (निर्मल) वीर पुत्र उत्पन्न करता है और सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान विमानपर
१५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३४ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा विष्णोः स्थानमनुत्तमम् । सवनं नाम विख्यातं यत्र संनिहितो हरिः ॥ १४ विमले च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा च विमलेश्वरम् । निर्मलं स्वर्गमायाति रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १५ हरिं च बलदेवं च एकत्राससमन्वितौ । दृष्ट्वा मोक्षमवाप्नोति कलिकल्मषसम्भवैः ॥ १६ ततः पारिप्लवं गच्छेत् तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च ब्रह्माणं वेदसंयुतम् ॥ १७ ब्रह्मवेदफलं प्राप्य निर्मलं स्वर्गमाप्नुयात् । तत्रापि संगमं प्राप्य कौशिक्स्यां तीर्थसम्भवम् । संगमे च नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १८ धरण्यास्तीर्थमासाद्य सर्वपापविमोचनम् । क्षान्तियुक्तो नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १९ धरण्यामपराधानि कृतानि पुरुषेण वै। सर्वाणि क्षमते तस्य स्नानमात्रस्य देहिनः ॥ २० ततो दक्षाश्रमं गत्वा दृष्ट्वा दक्षेश्वरं शिवम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ २१ ततः शालूकिनीं गत्वा स्नात्वा तीर्थे द्विजोत्तमाः । हरिं हरेण संयुक्तं पूज्य भक्तिसमन्वितः । प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान् सर्वपापविवर्जितान् ॥ २२ सर्पिर्दधि समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नानं नरः कृत्वा मुक्तो नागभयाद् भवेत् ॥ २३ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम् । तत्रोष्य रजनीमेकां स्नात्वा तीर्थवरे शुभे ॥ २४ द्वितीयं पूजयेद् यत्र द्वारपालं प्रयत्नतः । ब्राह्मणान् भोजयित्वा च प्रणिपत्य क्षमापयेत् ॥ २५ तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र मुक्तो भवति किल्बिषैः । सिद्धिर्मयाभिलषिता तया सार्द्धं भवाम्यहम् । एवं प्रसाद्य यक्षेन्द्रं ततः पञ्चनदं व्रजेत् ॥ २६ पञ्चनदाश्च रुद्रेण कृता दानवभीषणाः । तत्र सर्वेषु लोकेषु तीर्थं पञ्चनदं स्मृतम् ॥ २७ कोटितीर्थानि रुद्रेण समाहृत्य यतः स्थितम् । तेन त्रैलोक्यविख्यातं कोटितीर्थं प्रचक्षते ॥ २८ आरूढ़ होता है। विप्रेन्द्रो ! इसके बाद 'सवन' नामसे विख्यात सर्वोत्तम विष्णु-स्थानको जाना चाहिये, जहाँ भगवान् हरि सदा संनिहित रहते हैं। विमल तीर्थमें स्नानकर विमलेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्य निर्मल हो जाता है तथा रुद्रलोकमें जाता है। एक आसनपर स्थित कृष्ण और बलदेवका दर्शन करनेसे मनुष्य कलिके दुष्कर्मोंसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३-१६ ॥ उसके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात पारिप्लव नामक तीर्थमें जाय । वहाँ स्नान करनेके पश्चात् वेदों- सहित ब्रह्माका दर्शन करनेसे अथर्ववेदका ज्ञान प्राप्त कर निर्मल स्वर्गको प्राप्त करता है। कौशिकी-संगम तीर्थमें जाकर स्नान कर मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले धरणीके तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे क्षमाशील मनुष्य परम पदकी प्राप्ति करता है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे पृथ्वीपर मनुष्यद्वारा किये गये समस्त अपराध क्षमा कर दिये जाते हैं ॥ १७-२० ॥ उसके बाद दक्षाश्रममें जाकर दक्षेश्वर शिवका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। द्विजोत्तमो ! तदनन्तर शालूकिनी तीर्थमें जाकर स्नान करनेके उपरान्त भक्तिपूर्वक हरसे संयुक्त हरिका पूजन कर मनुष्य समस्त पापोंसे रहित इच्छाके अनुकूल लोकोंको प्राप्त करता है। सर्पिर्दधि नामवाले नागोंके उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य नाग-भयसे मुक्त हो जाता है। विप्रश्रेष्ठो ! तदनन्तर रन्तुक नामक द्वारपालके पास जाय। वहाँ एक रात्रि निवास करे तथा कल्याणकारी (उस) श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेके बाद दूसरे दिन प्रयत्नपूर्वक (निष्ठाके साथ मन लगाकर) द्वारपालका पूजन करे एवं ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर उन्हें प्रणाम कर इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे-'हे यक्षेन्द्र ! तुम्हारी कृपासे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। मैं अपनी अभीष्ट सिद्धिको प्राप्त करूँ (मेरी मनःकामना पूर्ण हो)।' इस प्रकार यक्षेन्द्रको प्रसन्न करनेके पश्चात् पञ्चनद तीर्थमें जाना चाहिये। जहाँ भगवान् रुद्रने दानवोंके लिये भयंकर पाँच नदोंका निर्माण किया है, उस स्थानपर समस्त संसारमें प्रसिद्ध पञ्चनद तीर्थ है; ॥ २१-२७ ॥ क्योंकि करोड़ों तीर्थोंको एकत्र (स्थापित) कर भगवान् वहाँ स्थित हैं, अतः उसे त्रैलोक्य-प्रसिद्ध
अध्याय ३४] कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य १५५ तस्मिन् तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटीश्वरं हरम् । कोटितीर्थ कहा जाता है। मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें पञ्चयज्ञानवाप्नोति नित्यं श्रद्धासमन्वितः ॥ २९ स्नान कर तथा कोटीश्वर हरका दर्शन कर पाँच प्रकारके (महा) यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त करता है। उसी तत्रैव वामनो देवः सर्वदेवैः प्रतिष्ठितः । स्थानपर सब देवताओंने भगवान् वामनदेवकी स्थापना तत्रापि च नरः स्नात्वा ह्यग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ३० की है। वहाँ भी स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रद्धावान् जितेन्द्रिय मनुष्य अश्विनोस्तीर्थमासाद्य श्रद्धावान् यो जितेन्द्रियः । अश्विनीकुमारोंके तीर्थमें जाकर रूपवान् और यशस्वी रूपस्य भागी भवति यशस्वी च भवेन्नरः ॥ ३१ होता है॥ २८-३१॥ वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम् । विष्णुद्वारा वर्णित वाराह नामक विख्यात तीर्थ है। तस्मिन् स्नात्वा श्रद्धधानः प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ३२ श्रद्धालु पुरुष उसमें स्नान कर परमपदको प्राप्त करता ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सोमतीर्थमनुत्तमम् । है। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद श्रेष्ठ सोमतीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमा पूर्वकालमें तपस्या कर व्याधिसे मुक्त हुए यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा व्याधिमुक्तोऽभवत् पुरा ॥ ३३ थे। उस शुभ तीर्थमें स्नान कर सोमेश्वर भगवान्का दर्शन तत्र सोमेश्वरं दृष्ट्वा स्नात्वा तीर्थवरे शुभे । करनेसे मनुष्य राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३४ व्याधियों और सभी दोषोंसे मुक्त होकर सोमलोकमें व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तः सर्वदोषविवर्जितः । जाता एवं चिरकालतक वहाँ सानन्द विहार करता सोमलोकमवाप्नोति तत्रैव रमते चिरम् ॥ ३५ है॥ ३२-३५॥ भूतेश्वरं च तत्रैव ज्वालामालेश्वरं तथा। वहींपर भूतेश्वर एवं ज्वालामालेश्वर नामक तावुभौ लिङ्गावभ्यर्च्य न भूयो जन्म चाप्नुयात् ॥ ३६ लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गोंकी पूजा करनेसे (मनुष्य) पुनर्जन्म नहीं पाता। एकहंस (सरोवर)-में स्नान कर एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । मनुष्य हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ३७ 'कृतशौच' नामक तीर्थमें जाकर मनोयोगपूर्वक तीर्थकी सेवा करनेवाला द्विजोत्तम 'पुण्डरीक' यज्ञविशेषके फलको पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेन्नरः । प्राप्त करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है (-वह ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः ॥ ३८ पवित्र हो जाता है)। उसके बाद बुद्धिमान् महादेवके उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् । मुञ्जवट नामक तीर्थमें एक रात्रि निवास करके मनुष्य तत्रैव च महाग्राही यक्षिणी लोकविश्रुता ॥ ३९ गाणपत्य (गणनायके पदको) प्राप्त करता है। वहीं विश्वप्रसिद्ध महाग्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान स्नात्वाऽभिगत्वा तत्रैव प्रसाद्य यक्षिणीं ततः । करनेके बाद यक्षिणीको प्रसन्न कर उपवास करनेसे उपवासं च तत्रैव महापातकनाशनम् ॥ ४० महान् पातकोंका नाश होता है॥ ३६-४०॥ कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं पुण्यवर्धनम् । पुण्यकी वृद्धि करनेवाले कुरुक्षेत्रके उस विख्यात प्रदक्षिणमुपावर्त्य ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः । द्वारकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर पुष्करं च ततो गत्वा अभ्यर्च्य पितृदेवताः ॥ ४१ पुष्करमें जाकर पितृदेवोंकी अर्चना करे। उस तीर्थका महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने निर्माण किया था। जामदग्न्येन रामेण आहृतं तन्महात्मना । वहाँ (जाकर) मनुष्य सफल-मनोरथ हो जाता है और कृतकृत्यो भवेद् राजा अश्वमेधं च विन्दति ॥ ४२ राजाको अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। कार्तिकी कन्यादानं च यस्तत्र कार्तिकायां वै करिष्यति । पूर्णिमाको जो मनुष्य वहाँ कन्यादान करेगा, उसके ऊपर प्रसन्ना देवतास्तस्य दास्यन्त्यभिमतं फलम् ॥ ४३ देवता प्रसन्न होकर उसे मनोवाञ्छित फल देंगे। वहाँ
३७- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन
| १५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कपिलश्च महायक्षो द्वारपालः स्वयं स्थितः।<br>विघ्नं करोति पापानां दुर्गतिं च प्रयच्छति॥ ४४<br><br>पत्नी तस्य महायक्षी नाम्नोदूखलमेखला।<br>आहत्य दुन्दुभिं तत्र भ्रमते नित्यमेव हि॥ ४५<br><br>सा ददर्श स्त्रियं चैकां सपुत्रां पापदेशजाम्।<br>तामुवाच तदा यक्षी आहत्य निशि दुन्दुभिम्॥ ४६<br><br>युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले।<br>तद्वद् भूतालये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमिच्छसि॥ ४७<br><br>दिवा मया ते कथितं रात्रौ भक्ष्यामि निश्चितम्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रणिपत्य च यक्षिणीम्॥ ४८<br><br>उवाच दीनया वाचा प्रसादं कुरु भामिनि।<br>ततः सा यक्षिणी तां तु प्रोवाच कृपयान्विता॥ ४९<br><br>यदा सूर्यस्य ग्रहणं कालेन भविता क्वचित्।<br>सन्निहत्यां तदा स्नात्वा पूता स्वर्गं गमिष्यसि॥ ५० | कपिल नामक महायक्ष स्वयं द्वारपालके रूपमें स्थित हैं, जो पापियोंके मार्गमें विघ्न उपस्थित कर उनकी दुर्गति करते हैं (जिससे वे पापाचरण न करें तथा धर्मकी मर्यादा स्थित रहे)। 'उदूखलमेखला' नामक उनकी महायक्षी पत्नी दुन्दुभि बजाकर वहाँ नित्य भ्रमण करती रहती है॥ ४१-४५॥<br><br>उस यक्षीने पापवाले देशमें उत्पन्न पुत्रके साथ एक रात्रिमें स्त्रीको देखनेके बाद दुन्दुभि बजाकर उससे कहा—युगन्धरमें दही खाकर तथा अच्युतस्थलमें निवास करनेके बाद भूतालयमें स्नान कर तुम पुत्रके साथ निवास करना चाहती हो। मैंने दिनमें यह बात तुमसे कही है। रात्रिमें मैं अवश्य तुमको खा जाऊँगी।* उसकी यह बात सुननेके बाद यक्षिणीको प्रणाम कर उसने दीन वाणीमें उससे कहा—'हे भामिनि! मेरे ऊपर दया करो।' फिर उस यक्षिणीने उससे कृपापूर्वक कहा—जब किसी समय सूर्य-ग्रहण होगा, उस समय सान्निहत्य (सरोवर)-में स्नान करके पवित्र होकर तुम स्वर्ग चली जाओगी॥ ४६-५०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा— |
|---|---|
| ततो रामह्रदं गच्छेत् तीर्थसेवी द्विजोत्तमः।<br>यत्र रामेण विप्रेण तरसा दीप्ततेजसा॥ १<br><br>क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः।<br>पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति नः श्रुतम्॥ २<br><br>पितरस्तर्पितास्तेन तथैव प्रपितामहाः।<br>ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्द्विजोत्तमाः॥ ३<br><br>राम राम महाबाहो प्रीताः स्मस्तव भार्गव।<br>अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो॥ ४ | इसके बाद तीर्थका सेवन करनेवाले उत्तम द्विजको रामकुण्ड नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ उद्दीप्त तेजस्वी विप्र-वीर राम (परशुराम)-ने बलपूर्वक क्षत्रियोंका संहारकर पाँच कुण्डोंको स्थापित किया था। पुरुषसिंह! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि परशुरामने उन (कुण्डों)-को रक्तसे भरकर उसने अपने पितरों एवं प्रपितामहोंका तर्पण किया था। द्विजोत्तमो! उसके बाद उन प्रसन्न पितरोंने परशुरामसे कहा था कि महाबाहु भार्गव राम! परशुराम! विभो! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम सब तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हैं॥ १-४॥ |
* इन सबकी सटिप्पण विस्तृत व्याख्या गीताप्रेसके महाभारत वनपर्व १२९। ९-१० में द्रष्टव्य है।