वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १५२ | श्रीवामनपुराण | [अध्याय ३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा।<br>वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरुक्ता चतुर्विधा॥ ८ | मानवोंके लिये ब्रह्मज्ञान, गयामें श्राद्ध, गौओंकी रक्षामें मृत्यु और कुरुक्षेत्रमें निवास — यह चार प्रकारकी मुक्ति कही गयी है॥ ५-८॥ |
| सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।<br>तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते॥ ९<br><br>दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रे गच्छामि च वसाम्यहम्।<br>एवं यः सततं ब्रूयात् सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १०<br><br>तत्र चैव सरःस्नायी सरस्वत्यास्तटे स्थितः।<br>तस्य ज्ञानं ब्रह्ममयमत्पत्स्यति न संशयः॥ ११<br><br>देवता ऋषयः सिद्धाः सेवन्ते कुरुजाङ्गलम्।<br>तस्य संसेवनान्नित्यं ब्रह्म चात्मनि पश्यति॥ १२ | सरस्वती और दृषद्वती — इन दो देव-नदियोंके बीच देव-निर्मित देशको ब्रह्मावर्त कहते हैं। दूर देशमें स्थित रहकर भी जो मनुष्य 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, वहाँ निवास करूँगा'— इस प्रकार निरन्तर (मनमें संकल्प करता या) कहता है, वह भी सभी पापोंसे छूट जाता है। वहाँ सरस्वतीके तटपर रहते हुए सरोवरमें स्नान करनेवाले मनुष्यको निश्चित ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो जाता है। देवता, ऋषि और सिद्धलोग सदा कुरुजाङ्गल (तीर्थ)-का सेवन करते हैं। उस तीर्थका नित्य सेवन करनेसे, (वहाँ नित्य निवास करनेसे), मनुष्य अपने भीतर ब्रह्मका दर्शन करता है॥ ९—१२॥ |
| चञ्चलं हि मनुष्यत्वं प्राप्य ये मोक्षकाङ्क्षिणः।<br>सेवन्ति नियतात्मानो अपि दुष्कृतकारिणः॥ १३<br><br>ते विमुक्ताश्च कलुषैरनेकजन्मसंभवैः।<br>पश्यन्ति निर्मलं देवं हृदयस्थं सनातनम्॥ १४<br><br>ब्रह्मवेदिः कुरुक्षेत्रं पुण्यं संनिहितं सरः।<br>सेवमाना नरा नित्यं प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥ १५<br><br>ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम्।<br>कुरुक्षेत्रे मृतानां च पतनं नैव विद्यते॥ १६ | जो भी पापी चञ्चल मानव-जीवन पाकर जितेन्द्रिय होकर मोक्ष प्राप्त करनेकी कामनासे वहाँ निवास करते हैं, वे अनेक जन्मोंके पापोंसे छूट जाते हैं तथा अपने हृदयमें रहनेवाले निर्मल देव—सनातन (ब्रह्म)-का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मवेदी, कुरुक्षेत्र एवं पवित्र 'संनिहित सरोवर' का सदा सेवन करते हैं, वे परम पदको प्राप्त करते हैं। समयपर ग्रह, नक्षत्र एवं ताराओंके भी पतनका भय होता है, किंतु कुरुक्षेत्रमें मरनेवालोंका कभी पतन नहीं होता॥ १३—१६॥ |
| यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः सेवन्ति स्थानकाङ्क्षिणः॥ १७<br><br>गत्वा तु श्रद्धया युक्तः स्नात्वा स्थाणुमहाह्रदे।<br>मनसा चिन्तितं कामं लभते नात्र संशयः॥ १८<br><br>नियमं च ततः कृत्वा गत्वा सरः प्रदक्षिणम्।<br>रन्तुकं च समासाद्य क्षामयित्वा पुनः पुनः॥ १९<br><br>सरस्वत्यां नरः स्नात्वा यक्षं दृष्ट्वा प्रणम्य च।<br>पुष्पं धूपं च नैवेद्यं दत्त्वा वाचमुदीरयेत्॥ २०<br><br>तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र वनानि सरितश्च याः।<br>भ्रमिष्यामि च तीर्थानि अविघ्नं कुरु मे सदा॥ २१ | ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सराएँ और यक्ष उत्तम स्थानकी प्राप्तिके लिये जहाँ (कुरुक्षेत्रमें) निवास करते हैं, वहाँ जाकर स्थाणु नामक महासरोवरमें श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। नियम-परायण होनेके पश्चात् सरोवरकी प्रदक्षिणा करके रन्तुकमें जाकर बार-बार क्षमा-प्रार्थना करनेके बाद सरस्वती नदीमें स्नान कर यक्षका दर्शन करे और उन्हें प्रणाम करे तथा पुष्प, धूप एवं नैवेद्य देकर इस प्रकार वचन कहे— हे यक्षेन्द्र! आपकी कृपासे मैं वनों, नदियों और तीर्थोंमें भ्रमण करूँगा; उसे आप सदा विघ्नरहित करें (मेरी यात्रामें किसी प्रकारका विघ्न न हो)॥ १७—२१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३॥