भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ३४ ] कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य १५३ चौंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य ऋषय ऊचुः वनानि सप्त नो ब्रूहि नव नद्यश्च याः स्मृताः। तीर्थानि च समग्राणि तीर्थस्नानफलं तथा॥ १ येन येन विधानेन यस्य तीर्थस्य यत् फलम्। तत् सर्वं विस्तरेणेह ब्रूहि पौराणिकोत्तम॥ २ लोमहर्षण उवाच शृणु सप्त वनानीह कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः। येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च॥ ३ काम्यकं च वनं पुण्यं तथाऽदितिवनं महत्। व्यासस्य च वनं पुण्यं फलकीवनमेव च॥ ४ तत्र सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्। पुण्यं शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम्॥ ५ वनान्येतानि वै सप्त नदीः शृणुत मे द्विजाः। सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी॥ ६ आपगा च महापुण्या गङ्गा मन्दाकिनी नदी। मधुस्रवा वासुनदी कौशिकी पापनाशिनी॥ ७ दृषद्वती महापुण्या तथा हिरण्वती नदी। वर्षाकालवहाः सर्वा वर्जयित्वा सरस्वतीम्॥ ८ एतासामुदकं पुण्यं प्रावृट्काले प्रकीर्तितम्। रजस्वलात्वमेतासां विद्यते न कदाचन। तीर्थस्य च प्रभावेण पुण्या ह्येताः सरिद्वराः॥ ९ शृण्वन्तु मुनयः प्रीतास्तीर्थस्नानफलं महत्। गमनं स्मरणं चैव सर्वकल्मषनाशनम्॥ १० रन्तुकं च नरो दृष्ट्वा द्वारपालं महाबलम्। यक्षं समभिवाद्यैव तीर्थयात्रां समाचरेत्॥ ११ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नाम्नाऽदितिवनं महत्। अदित्या यत्र पुत्रार्थं कृतं घोरं महत्तपः॥ १२ तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च अदितिं देवमातरम्। पुत्रं जनयते शूरं सर्वदोषविवर्जितम्। आदित्यशतसंकाशं विमानं चाधिरोहति॥ १३ ऋषियोंने [ लोमहर्षणजीसे ] कहा - (मुने! आप) हमसे उन सात वनों, नौ नदियों, समग्र तीर्थों एवं तीर्थ-स्नानके फलका वर्णन करें। पुराणवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ मुने! जिस-जिस विधानसे जिस तीर्थका जो फल होता है, उन सबको आप विस्तारपूर्वक बतलावें॥ १-२॥ लोमहर्षणने कहा- (ऋषियो!) कुरुक्षेत्रके मध्यमें जो सात वन हैं, उनका मैं वर्णन करता हूँ, आपलोग उसे सुनें। उन वनोंके नाम सभी पापोंको नष्ट करनेवाले तथा पवित्र हैं। (उन वनोंके नाम हैं-) पवित्र काम्यकवन, महान् अदितिवन, पुण्यप्रद व्यासवन, फलकीवन, सूर्यवन, महान् मधुवन तथा सर्वकल्मष- नाशक पवित्र शीतवन - ये ही सात वन हैं। हे द्विजो! (अब) नदियों (-के नाम)-को मुझसे सुनो। (उनके नाम हैं-) पवित्र सरस्वती नदी, वैतरणी नदी, महापवित्र आपगा, मन्दाकिनी गङ्गा, मधुस्रवा, वासु नदी, पापनाशिनी कौशिकी, महापवित्र दृषद्वती (कग्गर) तथा हिरण्वती नदी। इनमें सरस्वतीके अतिरिक्त सभी नदियाँ वर्षाकालमें (ही) बहनेवाली हैं॥ ३-८॥ वर्षाकालमें इनका जल पवित्र माना जाता है। इनमें कभी भी रजस्वलात्व दोष नहीं होता। तीर्थके प्रभावसे ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पवित्र हैं। हे मुनियो! आपलोग (अब) प्रसन्न होकर तीर्थस्नानका महान् फल सुनें। वहाँ जाना एवं उनका स्मरण करना समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। महाबलवान् रन्तुक नामक द्वारपालका दर्शन करनेके बाद यक्षको प्रणाम कर तीर्थयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद महान् अदितिवनमें जाना चाहिये, जहाँ अदितिने पुत्रके लिये अत्यन्त कठोर तप किया था॥ ९-१२॥ वहाँ स्नानकर तथा देवमाता अदितिका दर्शनकर मनुष्य समस्त दोषोंसे रहित (निर्मल) वीर पुत्र उत्पन्न करता है और सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान विमानपर

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