वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२६- कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति
अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य [ ११७
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
|---|---|
| कृत्वा सीरं स सौवर्णं गृह्य रुद्रवृषं प्रभुः।<br>पौण्ड्रकं याम्यमहिषं स्वयं कर्षितुमुद्यतः॥ २३<br>तं कर्षन्तं नरवरं समभ्येत्य शतक्रतुः।<br>प्रोवाच राजन् किमिदं भवान् कर्तुमिहोद्यतः॥ २४<br>राजाब्रवीत् सुरवरं तपः सत्यं क्षमां दयाम्।<br>कृषामि शौचं दानं च योगं च ब्रह्मचारिताम्॥ २५ | राजाने सुवर्णमय हल बनवाकर उसमें शङ्करके बैल एवं यमराजके पौण्ड्रक नामक भैंसेको नाँधकर स्वयं जोतनेके लिये तैयार हुए। इसपर इन्द्रने उनके पास जाकर कहा—राजन्! आप यहाँ यह क्या करनेके लिये उद्यत हुए हैं? राजा बोले—मैं यहाँ तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य—इन अष्टाङ्गोंकी खेती कर रहा हूँ॥ २२—२५॥ |
| तस्योवाच हरिर्देवः कस्माद्बीजो नरेश्वर।<br>लब्धोऽष्टाङ्गेति सहसा अवहस्य गतस्ततः॥ २६<br>गतेऽपि शक्रे राजर्षिरहन्यहनि सीरधृक्।<br>कृषतेऽन्यान् समन्ताच्च सप्तक्रोशान् महीपतिः॥ २७<br>ततोऽहमब्रुवं गत्वा कुरु किमिदमित्यथ।<br>तदाऽष्टाङ्गं महाधर्मं समाख्यातं नृपेण हि॥ २८<br>ततो मयाऽस्य गदितं नृप बीजं क्व तिष्ठति।<br>स चाह मम देहस्थं बीजं तमहमब्रुवम्।<br>देह्यहं वापयिष्यामि सीरं कृषतु वै भवान्॥ २९<br>ततो नृपतिना बाहुर्दक्षिणः प्रसृतः कृतः।<br>प्रसृतं तं भुजं दृष्ट्वा मया चक्रेण वेगतः॥ ३०<br>सहस्रधा ततश्छिद्य दत्तो युष्माकमेव हि।<br>ततः सव्यो भुजो राज्ञा दत्तश्छिन्नोऽप्यसौ मया॥ ३१<br>तथैवोरुयुगं प्रादान्मया छिन्नौ च तावुभौ।<br>ततः स मे शिरः प्रादात् तेन प्रीतोऽस्मि तस्य च।<br>वरदोऽस्मीत्यथेत्युक्ते कुरुर्वरमयाचत॥ ३२ | इसपर इन्द्र उनसे बोले—नरेश्वर! आपने (कृषिके लिये साधनभूत) हल और बीज कहाँसे प्राप्त किये हैं? यह कहते हुए उपहास कर इन्द्र वहाँसे शीघ्र ही चले गये। इन्द्रके चले जानेपर भी राजा प्रतिदिन हल लेकर चारों ओर सात कोसोंतक पृथ्वी जोतते रहे। तब मैंने (विष्णुने) उनसे जाकर कहा—कुरु! तुम यह क्या कर रहे हो? (इसपर) राजाने कहा—मैं (पूर्वोक्त) अष्टाङ्ग-महाधर्मोंकी खेती कर रहा हूँ। फिर मैंने उनसे पूछा—राजन्! बीज कहाँ है? राजाने कहा—बीज मेरे शरीरमें है। मैंने उनसे कहा—उसे मुझे दे दो। मैं (उसे) बोऊँगा, तुम हल चलाओ। तब राजाने अपना दाहिना हाथ फैला दिया। फैलाये हुए हाथको देखकर मैंने चक्रसे शीघ्र ही उसके हजारों टुकड़े कर डाले और उन टुकड़ोंको तुम देवताओंको दे दिया। उसके बाद राजाने वाम बाहु दिया और उसे भी मैंने काट दिया। इसी प्रकार उसने दोनों ऊरुओंको दिया। उन दोनोंको भी मैंने काट दिया। तब उसने अपना मस्तक दिया, जिससे मैं उसके ऊपर प्रसन्न हो गया और कहा—तुम्हें मैं वर दूँगा। मेरे ऐसा कहनेपर कुरुने (मुझसे) वर माँगा—॥ २६—३२॥ |
| कुरुरुवाच<br>यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु च।<br>स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह॥ ३३<br>उपवासं च दानं च स्नानं जप्यं च माधव।<br>होममज्ञादिकं चान्यच्छुभं वाप्यशुभं विभो॥ ३४<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>अक्षयं प्रवरे क्षेत्रे भवत्वत्र महाफलम्॥ ३५<br>तथा भवान् सुरैः सार्धं समं देवेन शूलिना।<br>वस त्वं पुण्डरीकाक्ष मन्नामव्यञ्जकेऽच्युत।<br>इत्येवमुक्तस्तेनाहं राज्ञा बाढमुवाच तम्॥ ३६ | **कुरुने कहा—**जितने स्थानको मैंने जोता है, वह धर्मक्षेत्र हो जाय और यहाँ स्नान करनेवालों एवं मरनेवालोंको महापुण्यकी प्राप्ति हो। माधव! विभो! शङ्खचक्रगदाधारी हृषीकेश! यहाँ किये गये उपवास, स्नान, दान, जप, हवन, यज्ञ आदि तथा अन्य शुभ या अशुभ कर्म भी इस श्रेष्ठ क्षेत्रमें आपकी कृपासे अक्षय एवं महान् फल देनेवाले हों तथा हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मेरे नामके व्यञ्जक (प्रकाशक) इस कुरुक्षेत्रमें आप सभी देवताओं एवं शिवजीके साथ निवास करें। राजाके ऐसा कहनेपर मैंने उनसे कहा—बहुत |
२७- भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना
११८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २२ तथा च त्वं दिव्यवपुर्भव भूयो महीपते। तथाऽन्तकाले मामेव लयमेष्यसि सुव्रत ॥ ३७ कीर्तिश्च शाश्वती तुभ्यं भविष्यति न संशयः। तत्रैव याजका यज्ञान् यजिष्यन्ति सहस्त्रशः ॥ ३८ तस्य क्षेत्रस्य रक्षार्थं ददौ स पुरुषोत्तमः। यक्षं च चन्द्रनामानं वासुकिं चापि पन्नगम् ॥ ३९ विद्याधरं शङ्कुकर्णं सुकेशिं राक्षसेश्वरम्। अजावनं च नृपतिं महादेवं च पावकम् ॥ ४० एतानि सर्वतोऽभ्येत्य रक्षन्ति कुरुजाङ्गलम्। अमीषां बलिनोऽन्ये च भृत्याश्चैवानुयायिनः ॥ ४१ अष्टौ सहस्राणि धनुर्धराणां ये वारयन्तीह सुदुष्कृतान् वै। स्नातुं न यच्छन्ति महोग्ररूपा- स्त्वन्यस्य भूताः सचराचराणाम् ॥ ४२ तस्यैव मध्ये बहुपुण्य उक्तः पृथूदकः पापहरः शिवश्च। पुण्या नदी प्राङ्मुखतां प्रयाता यत्रौघयुक्तस्य शुभा जलाढ्या ॥ ४३ पूर्वं प्रजेयं प्रपितामहेन सृष्टा समं भूतगणैः समस्तैः। मही जलं वह्निसमीरमेव खं त्वेवमादौ विबभौ पृथूदकः ॥ ४४ तथा च सर्वाणि महार्णवानि तीर्थानि नद्यः स्त्रवणाः सरांसि । संनिर्मितानीह महाभुजेन तच्चैक्यमागात् सलिलं महीषु ॥ ४५ देवदेव उवाच सरस्वतीदृषद्वत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले। मुनिप्रवरमासीनं पुराणं लोमहर्षणम्। अपृच्छन्त द्विजवराः प्रभावं सरसस्तदा ॥ ४६ प्रमाणं सरसो ब्रूहि तीर्थानां च विशेषतः। देवतानां च माहात्म्यमुत्पत्तिं वामनस्य च ॥ ४७ एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां रोमहर्षसमन्वितः । प्रणिपत्य पुराणर्षिरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८ अच्छा, ऐसा ही होगा। राजन्! तुम पुनः दिव्य शरीरवाले हो जाओ तथा हे सुव्रत ! (दृढ़तासे व्रतका सुष्ठु पालन करनेवाले) अन्तकालमें तुम मुझमें ही लीन हो जाओगे ॥ ३३-३७ ॥ [ भगवान् विष्णुने आगे कहा-] निःसंदेह तुम्हारी कीर्ति सदा रहनेवाली होगी। यहाँपर यज्ञ करनेवाले व्यक्ति (यजमान) यज्ञ करेंगे। फिर, उस क्षेत्रकी रक्षा करनेके लिये उन पुरुषोत्तमभगवान्ने राजाको चन्द्र नामक यक्ष, वासुकि नामक सर्प, शङ्कुकर्ण नामक विद्याधर, सुकेशी नामक राक्षसेश्वर, अजावन नामक राजा और महादेव नामक अग्निको दे दिया। ये सभी तथा इनके अन्य बली भृत्य एवं अनुयायी वहाँ आकर कुरुजाङ्गलकी सब ओरसे रक्षा करते हैं ॥ ३८-४१ ॥ आठ हजार धनुषधारी, जो पापियोंको यहाँसे हटाते रहते हैं, वे उग्र रूप धारणकर चराचरके दूसरे भूतगण (पापियों)-को स्नान नहीं करने देते। उसी (कुरुजाङ्गल)-के मध्य पाप दूर करनेवाला एवं अति पवित्र कल्याणकारी पृथूदक (पोहोआ) नामक तीर्थ है, जहाँ शुभ जलसे पूर्ण एक पवित्र नदी पूर्वकी ओर बहती है। इसे प्रपितामह ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशादि समस्त भूतोंके साथ ही रचा था, महाबाहु ब्रह्माने पृथ्वीपर जिन महासमुद्रों, तीर्थों, नदियों, स्रोतों एवं सरोवरोंकी रचना की उन सभीके जल उसमें एकत्र प्राप्त हैं ॥ ४२-४५ ॥ [ यहाँसे कुरुक्षेत्र और उसके सरोवरका माहात्म्य कहते हैं— ] देवदेव भगवान् विष्णु बोले - पहले समयमें ब्राह्मणोंने सरस्वती और दृषद्वती (घग्गर)-के बीचमें स्थित कुरुक्षेत्रमें आसीन मुनिप्रवर वृद्ध लोमहर्षणसे वहाँ स्थित सरोवरकी महिमा पूछी और इस सरोवरके विस्तार, विशेषतः तीर्थों और देवताओंके माहात्म्य एवं वामनके प्रादुर्भावकी कथा कहनेकी प्रार्थना की। उनके इस वचनको सुनकर रोमाञ्चित होते हुए पौराणिक ऋषि लोमहर्षण उन्हें प्रणाम कर (फिर) इस प्रकार बोले - ॥ ४६-४८ ॥
अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य १९९ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणजी बोले- सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च। रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना तीर्थका वर्णन करता हूँ। ब्रह्माने पहले कहा था कि तीर्थं महत् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४९ वह 'संनिहित' सरोवर 'रन्तुक' नामक स्थानसे लेकर रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् । 'औजस' नामक स्थानतक तथा 'पावन' से 'चतुर्मुख' सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥ ५० तक फैला हुआ है। ब्राह्मणश्रेष्ठो ! किंतु अब कलि कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना । और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥ ५१ जो (वर्तमान) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग सुनें। 'विश्वेश्वर' स्थानसे 'अस्थिपुर' तक और 'वृद्धा- विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी। कन्या' से लेकर 'ओघवती' नदीतक यह सरोवर यावदोधवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥ ५२ स्थित है ॥ ४९-५२॥ मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने । ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ५३ सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको सुनें। विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती। सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन (दो कोसों)-में सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ५४ फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये। मोक्षकी इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः । लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥ ५५ स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं। योगेश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना । इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्के पालनकी विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ५६ कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३-५६ ॥ रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना । (इसी प्रकार) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ ५७ रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी (उन) हरको स्थाणुत्व (स्थिरत्व) प्राप्त हुआ। आदिमें आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामह्रदः स्मृतः । यह 'ब्रह्मवेदी' कहा गया था, किंतु आगे चलकर कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ ५८ इसका नाम 'रामह्रद' हुआ। उसके बाद राजर्षि कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम 'कुरुक्षेत्र' पड़ा। तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् । रामह्रद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ ५९ कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥
| १२० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २३ |
|---|
तेईसवाँ अध्याय
वामन-चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br><br>ब्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः।<br>यथा बलिर्नियमतो दत्तं राज्यं शतक्रतोः॥ १ | ऋषियोंने कहा—(कृपया आप) वामनके माहात्म्य और विशेषकर उनकी उत्पत्तिका वर्णन (विस्तारसे) करें तथा यह भी बतलायें कि बलिको किस प्रकार बाँधकर इन्द्रको राज्य दिया गया॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br><br>शृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः।<br>उत्पत्तिं च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले॥ २<br><br>तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>यस्य वंशे समभवद् बलिवैरोचनिः पुरा॥ ३<br><br>दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा।<br>तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः॥ ४<br><br>तस्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्जज्ञे विरोचनात्।<br>हते हिरण्यकशिपौ देवानुत्साद्य सर्वतः॥ ५<br><br>राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>कृतयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यतां गते॥ ६ | **लोमहर्षणने कहा—**मुनियो! आपलोग प्रसन्नतापूर्वक महात्मा वामनकी उत्पत्ति, उनका प्रभाव और कुरुजाङ्गल स्थानमें उनके निवासका वर्णन सुनें! द्विजश्रेष्ठो! आपलोग दैत्योंके उस वंशके सम्बन्धमें भी सुनें, जिस वंशमें प्राचीनकालमें विरोचनके पुत्र बलि उत्पन्न हुए थे। पहले समयमें दैत्योंका आदिपुरुष हिरण्यकशिपु था। उसका प्रह्लाद नामक पुत्र अत्यन्त तेजस्वी दानव था। उससे विरोचन उत्पन्न हुआ और विरोचनसे बलि। हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर बलिने सभी स्थानोंसे देवताओंको खदेड़ दिया और वह चराचरसहित तीनों लोकोंका राज्य स्वच्छन्दतासे करने लगा। (विरोधमें) देवताओंके (बहुत) प्रयत्न करते रहनेपर भी तीनों लोक दैत्योंके अधीन हो ही गये (एवं त्रैलोक्यपर देवताओंका अधिकार नहीं रह गया)॥ २—६॥ |
| जये तथा बलवतोर्मयशम्बरयोस्तथा।<br>शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि॥ ७<br><br>संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे।<br>प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि॥ ८<br><br>दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते।<br>देवेषु मखशोभां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च॥ ९<br><br>प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे।<br>अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते॥ १० | बलशाली मय और शम्बरकी विजय-वैजयन्ती फहराने लग गयी। धर्मकार्य सर्वत्र होने लग गये। फलतः दिशाएँ शुद्ध हो गयीं। सूर्य दैत्योंके मार्ग (दक्षिण अयन)-में चले गये। (दैत्योंके शासनमें) प्रह्लाद, शम्बर, मय तथा अनुह्लाद—ये सभी दैत्य सभी दिशाओंकी रक्षा करने लगे। आकाश भी दैत्योंसे रक्षित हो गया। देवगण स्वर्गमें होनेवाले यज्ञोंकी शोभा देखने लगे। सारा संसार प्रकृतिमें स्थित और (व्यवस्थित) हो गया तथा सभी सन्मार्गपर चलने लगे। सर्वत्र पापोंका अभाव और धर्मभावका उत्कर्ष हो गया॥ ७—१०॥ |
अध्याय २३ ] वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना १२१ चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे। प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु। स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥ ११ फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया। सभी राजा (भलीभाँति) प्रजापालन करते हुए सुशोभित होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने- अपने धर्मका पालन करने लगे। ऐसे समयमें असुरोंने बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया। असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद (जय-जयकार) करने लगा। इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलिके समीप आयीं ॥ ११-१३॥ अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा। हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥ १२ अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा। पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३ श्रीरुवाच बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते। प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४ लक्ष्मीने कहा - बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी दैत्यराज बलि ! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है। इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी हूँ। दानव ! असुरोंके स्वामी ! हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है - इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। राजन् ! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट (प्रभावशाली) हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका भोग कर रहे हैं ॥ १४-१७॥ यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् । दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५ नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले। प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥ १६ विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः । येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७ दैत्यराज बलिसे ऐसा कहनेके बाद सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य एवं (सबको) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा बलिमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - ह्री, कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या, महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न होकर दैत्येन्द्र (बलि) - का सेवन करने लगीं। इस प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर-अचरवाले त्रिलोकीका अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥ एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् । प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥ १८ तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्युतिरेव च। प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९ श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया । सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥ २० प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम्। प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
२८- अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना
१२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २४ चौबीसवाँ अध्याय वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा - आप हमें यह बतलायें कि देवानां ब्रूहि नः कर्म यद्वृत्तास्ते पराजिताः । देवताओंने कौन-सा कर्म किया, जिससे प्रभावित कथं देवाधिदेवोऽसौ विष्णुर्वामनतां गतः ॥ १ होकर वे (दैत्य) पराजित हुए तथा देवाधिदेव भगवान् विष्णु कैसे वामन (बौना) बने ॥ १ ॥ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया) - इन्द्रदेवने बलिसंस्थं च त्रैलोक्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः । जब तीनों लोकोंको बलिके अधिकारमें देखा तब वे मेरुपृस्थं ययौ शक्रः स्वमातुर्निलयं शुभम् ॥ २ मेरु (पर्वत) - पर स्थित (रहनेवाली) अपनी कल्याणमयी माताके घर गये। माताके समीप जाकर उन्होंने उनसे समीपं प्राप्य मातुश्च कथयामास तां गिरम् । (मातासे) यह बात कही - जिससे देवगण युद्धमें दानव आदित्याश्च यथा युद्धे दानवेन पराजिताः ॥ ३ बलिसे पराजित हुए थे ॥ २-३ ॥ अदितिरुवाच (माता) अदितिने कहा- पुत्र ! यदि ऐसी बात यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे । है तो तुमलोग सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ मिलकर भी बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ संग्राममें विरोचनके पुत्र बलिको नहीं मार सकते। सहस्राक्ष ! युद्धमें केवल हजारों सिरवाले (सहस्रशीर्षा) सहस्रशिरसा शक्यः केवलं हन्तुमाहवे । भगवान् विष्णु ही (उसे) मार सकते हैं। उनके सिवा तेनैकेन सहस्त्राक्ष न स ह्यन्येन शक्यते ॥ ५ किसी दूसरेसे वह नहीं मारा जा सकता। अतः इस विषयमें उस महान् आत्मा (महाबलवान्) बलि नामक तद्गत् पृच्छामि पितरं कश्यपं ब्रह्मवादिनम् । दैत्यकी पराजयके लिये मैं तुम्हारे पिता ब्रह्मवादी पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ कश्यपसे (उपाय) पूछूँगी ॥ ४-६ ॥ ततोऽदित्या सह सुराः संप्राप्ताः कश्यपान्तिकम् । इस प्रकार माता अदितिके कहनेपर सभी देवता तत्रापश्यन्त मारीचं मुनिं दीप्ततपोनिधिम् ॥ ७ उनके साथ कश्यपजीके पास पहुँच गये। वहाँ (जाकर आद्यं देवगुरुं दिव्यं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा । उन लोगोंने) तपस्याके धनी, मरीचिके पुत्र, आद्य एवं तेजसा भास्कराकारं स्थितमग्निशिखोपमम् ॥ ८ दिव्य पुरुष, देवताओंके गुरु, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान और अपने तेजसे सूर्यके समान तेजस्वी, अग्निशिखाकी न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनाम्बरम् । भाँति दीप्त, संन्यासीके रूपमें, तपोयुक्त वल्कल तथा वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तमिव तेजसा ॥ ९ मृगचर्म धारण किये हुए (आहुतिके) घीकी गन्धसे हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यगन्धपुरस्कृतम् । आप्यायित (वासित) अग्निके समान जलते हुए, स्वाध्यायमें स्वाध्यायवन्तं पितरं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० लगे हुए मानो शरीरधारी अग्नि ही हों एवं ब्रह्मवादी, ब्रह्मवादिसत्यवादिसुरासुरगुरुं प्रभुम् । सत्यवादी देवों तथा दानवोंके गुरु, अनुपम ब्रह्मतेजसे ब्राह्मण्याऽप्रतिमं लक्ष्म्या कश्यपं दीप्ततेजसम् ॥ ११ पूर्ण एवं शोभासे दीप्त कश्यपजीको देखा ॥ ७-११ ॥ वे (देवताओंके पिता श्रीकश्यपजी) सभी लोकोंके यः स्रष्टा सर्वलोकानां प्रजानां पतिरुत्तमः । रचनेवाले, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आत्मभाव अर्थात् आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ अध्यात्मतत्त्वकी विज्ञताकी विशिष्टताके कारण ऐसे लग
२९- बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन
अध्याय २४] वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना १२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३<br><br>अजेयो युधि शक्रेण बलिर्दैत्यो बलाधिकः ।<br>तस्माद् विधत्त नः श्रेयो देवानां पुष्टिवर्धनम् ॥ १४<br><br>श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपः प्रभुः ।<br>अकरोद् गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ | रहे थे जैसे तीसरे प्रजापति ही हों। फिर अदितिके साथ समस्त देववीर उन्हें प्रणाम कर उनसे हाथ जोड़कर ऐसे बोले जैसे ब्रह्मासे उनके मानस-पुत्र बोलते हैं— बलशाली दैत्यराज बलि युद्धमें इन्द्रसे अपराजेय हो गया है। अतः हम देवोंके सामर्थ्यकी पुष्टि-वृद्धिके लिये आप कल्याणकारी उपाय करें। उन पुरुषोंकी बातें सुनकर लोकोंको रचनेवाले सामर्थ्यशाली कश्यपने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया॥ १२—१५॥ |
| कश्यप उवाच<br>शक्र गच्छाम सदनं ब्रह्मणः परमाद्भुतम् ।<br>तथा पराजयं सर्वे ब्रह्मणः ख्यातुमुद्यताः ॥ १६<br><br>सहादित्या ततो देवा याताः काश्यपमाश्रमम् ।<br>प्रस्थिता ब्रह्मसदनं महर्षिगणसेवितम् ॥ १७<br><br>ते मुहूर्तेन संप्राप्ता ब्रह्मलोकं सुवर्चसः ।<br>दिव्यैः कामगमैर्यानैर्यथार्हस्ते महाबलाः ॥ १८<br><br>ब्रह्माणं द्रष्टुमिच्छन्तस्तपोराशिनमव्ययम् ।<br>अध्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम् ॥ १९ | (फिर) कश्यपने कहा— इन्द्र! हम सभी अपनी पराजयकी बात ब्रह्माजीसे कहनेके लिये तैयार होकर उनके परम अद्भुत लोकको चलें। कश्यपके इस प्रकार कहनेपर अदितिके साथ कश्यपके आश्रममें आये हुए सभी देवताओंने महर्षिगणोंसे सेवित ब्रह्मसदनकी ओर प्रस्थान किया। यथायोग्य इच्छाके अनुसार चलनेवाले दिव्य यानोंसे महाबली एवं तेजस्वी वे सभी देवता क्षणमात्रमें ही ब्रह्मलोकमें पहुँच गये और तब वे लोग तपराशि अव्यय ब्रह्माको देखनेकी इच्छा करते हुए ब्रह्माकी विशाल परम श्रेष्ठ सभामें पहुँचे॥ १६—१९॥ |
| षट्पदोद्गीतमधुरां सामगैः समुदीरिताम् ।<br>श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुस्तदा ॥ २०<br><br>ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रोक्ताः क्रमपदाक्षराः ।<br>शुश्रुवुर्विबुधव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २१<br><br>यज्ञविद्यावेदविदः पदक्रमविदस्तथा ।<br>स्वरेण परमर्षीणां सा बभूव प्रणादिता ॥ २२<br><br>यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।<br>छन्दसां चैव चार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥ २३<br><br>लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वरमीरितम् ।<br>तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा नियताः शंसितव्रताः ॥ २४<br><br>जपहोमपरा मुख्या ददृशुः कश्यपात्मजाः ।<br>तस्यां सभायामास्ते स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २५ | वे (देवतालोग) भ्रमरोंकी गुञ्जारसे गुञ्जित, सामगानसे मुखरित, कल्याणकी विधायिका और शत्रुओंका विनाश करनेवाली उस सभाको देखकर प्रसन्न हो गये। (उस स्थानपर) उन श्रेष्ठ देवगणोंने विस्तृत (विशाल) अनेक कर्मानुष्ठानोंके समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियोंके द्वारा 'क्रमपदादि' (वेद पढ़नेकी विशिष्ट शैलियोंसे) उच्चरित ऋचाओं (वेदमन्त्रों)-को सुना। वह सभा यज्ञविद्याके ज्ञाता एवं 'पदक्रम' प्रभृति वेदपाठके ज्ञानवाले परमर्षियोंके उच्चारणकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हो रही थी। देवोंने वहाँ यज्ञके संस्तवोंके ज्ञाताओं, शिक्षाविदों और वेदमन्त्रोंके अर्थ जाननेवालों, समस्त विद्याओंमें पारङ्गत द्विजों एवं श्रेष्ठ लोकायतिकोंके (चार्वाकके मतानुयायियों)-द्वारा उच्चरित स्वरको भी सुना। कश्यपके पुत्रोंने वहाँ सर्वत्र नियमपूर्वक तीर्थ-व्रतको धारण करनेवाले जप-होम करनेमें लगे हुए श्रेष्ठ विप्रोंको देखा। उसी सभामें लोक-पितामह ब्रह्मा विराजमान थे॥ २०—२५॥ |
| सुरासुरगुरुः श्रीमान् विद्यया वेदमायया ।<br>उपासन्त च तत्रैव प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥ २६ | (उस) सभामें वेदमाया विद्यासे सम्पन्न, सुरों एवं असुरोंके गुरु (श्रीमान् ब्रह्माजी) भी उपस्थित थे। प्रजापतिगण उन (प्रभुता-सम्पन्न) प्रभुकी उपासना कर |
१२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमाः । भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ॥ २७ विद्यास्थान्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही । शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥ २८ प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं महत् । साङ्गोपाङ्गाश्च चत्वारो वेदा लोकपतिस्तथा ॥ २९ नयाश्च क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च । एते चान्ये च बहवः स्वयंभुवमुपासते ॥ ३० अर्थो धर्मश्च कामश्च क्रोधो हर्षश्च नित्यशः । शुक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्त्तोऽथ बुधस्तथा ॥ ३१ शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः । मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्च द्विजोत्तमाः ॥ ३२ दिवाकरश्च सोमश्च दिवा रात्रिस्तथैव च । अर्द्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च संस्थिताः ॥ ३३ तां प्रविश्य सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामिकाम् । कश्यपस्त्रिदशैः सार्द्धं पुत्रैर्धर्मभृतां वरः ॥ ३४ सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् । ब्राह्मया श्रिया सेव्यमानामचिन्त्यां विगतक्लमाम् ॥ ३५ ब्रह्माणं प्रेक्ष्य ते सर्वे परमासनमास्थितम् । शिरोभिः प्रणता देवं देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ ३६ ततः प्रणम्य चरणौ नियताः परमात्मनः । विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः ॥ ३७ दृष्ट्वा तु तान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् । आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः ॥ ३८ रहे थे। द्विजोत्तमो! दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम और नारद एवं सभी विद्याएँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध एवं प्रकृति, विकार, अन्यान्य महत् कारण, अङ्गों एवं उपाङ्गोंके साथ चारों वेद और लोकपति, नीति, यज्ञ, संकल्प, प्राण - ये तथा अन्यान्य देव, ऋषि, भूत, तत्त्वादि ब्रह्माकी उपासना कर रहे थे। द्विजश्रेष्ठो ! अर्थ, धर्म, काम, क्रोध, हर्ष, शुक्र, बृहस्पति, संवर्त, बुध, शनैश्चर और राहु आदि सभी ग्रह भी वहाँ यथास्थान बैठे थे। मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा छः ऋतुएँ भी वहाँ उपस्थित थीं ॥ २६-३३ ॥ धार्मिकोंमें श्रेष्ठ कश्यपने अपने पुत्र देवताओंके साथ ब्रह्माकी उस सर्वमनोरथमयी, सर्वतेजोमयी, दिव्य एवं ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित तथा ब्रह्म-विचारमयी सरस्वती एवं लक्ष्मीसे सेवित अचिन्त्य तथा खिन्नतासे रहित सभामें प्रवेश किया। तब उनके साथमें गये सभी देवताओंने श्रेष्ठ आसनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा और उन्हें ब्रह्मर्षियोंके साथ झुककर सिरसे प्रणाम किया। नियमका पालन करनेवाले वे सभी परमात्माके चरणोंमें प्रणाम करके सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर निर्मल एवं शान्त हो गये। (फिर) महान् तेजस्वी देवेश्वर ब्रह्माने कश्यपके साथ आये हुए उन सभी देवताओंको देखकर कहा - ॥ ३४-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥ पचीसवाँ अध्याय वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना ब्रह्मोवाच यदर्थमिह संप्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि। चिन्तयाम्यहमप्यग्रे तदर्थं च महाबलाः ॥ १ भविष्यति च वः सर्वं काङ्क्षितं यत् सुरोत्तमाः । बलेर्दानवमुख्यस्य योऽस्य जेता भविष्यति ॥ २ ब्रह्माने कहा- महाबलशाली देवगण ! आपलोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसके विषयमें मैं पहलेसे ही सोच रहा हूँ। सुरश्रेष्ठ ! आपलोगोंको जो अभिलषित है, वह पूर्ण होकर रहेगा। दानवोंमें प्रधान बलिको पराजित करनेवाले एवं विश्वको रचनेवाले
अध्याय २५ ] वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५ न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत्। त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामति स प्रभुः॥ ३ यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः। पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम्॥ ४ तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति। देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः॥ ५ (परमात्मा) न केवल (आप सब) देवोंके, प्रत्युत हमारे भी सहारे हैं। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा देवोंके भी शासक हैं। इन्हें ही सनातन आदिदेव भी कहते हैं॥१-४॥ उन महान् आत्मा (सनातन आदिदेव)-को देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम (समस्त) देवोंको, मुझे तथा श्रुति (वेद) एवं समस्त विश्वको जानते हैं (संसारके समस्त क्रिया-कलाप उनकी जानकारीमें ही होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं)। उन्हींके कृपा-प्रसादसे (आपलोगोंको) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ। (आपलोग सुनें।) आप सभी उत्तर-दिशामें क्षीरसागरके उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे विचारशील विद्वान् लोग (अमृत) नामसे उच्चारित करते हैं। विश्वकी रचना करनेवाले (परमात्मा) वहीं योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं। आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायें और आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५-८॥ तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम्। यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्॥ ६ क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत्। अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः॥ ७ भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः। अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्॥ ८ ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्। उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम्॥ ९ (जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने लगेंगे) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी, स्निग्ध-गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य-स्वरूपिणी, सत्यताकी ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीको सुनेंगे। उसके बाद भावितात्माके (आत्मज्ञानसे परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर) व्रतकी समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव आपसे कहेंगे-सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये, आपलोगोंका स्वागत है। मैं (आपलोगोंको) वरदान देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो-किसे कौन-सा वर दूँ॥९-१३॥ रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम्। वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम्॥ १० दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्। सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः॥ ११ तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने। अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः॥ १२ कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः। स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः॥ १३
१२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा। प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥ १४ भगवान्नेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः। उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥ १५ देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च। तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम्। श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥ १६ तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम्। यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥ १७ और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और वरकी याचना करेंगे कि 'भगवान् ही हमारे पुत्र बनें; इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों' तब वे ब्रह्मवाणीके द्वारा 'ऐसा ही हो' - यह कहेंगे। (इस प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं सभी देवताओंने 'ऐसा ही हो' - यह कहकर प्रभु (ब्रह्मा) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। वे अत्यन्त शीघ्रतासे सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर पहुँच गये ॥ १४-१७॥ ते क्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान्। नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥ १८ अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम्। अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥ १९ अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना। दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २० प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते। नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय भूतये ॥ २१ ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च। क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥ २२ कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः। उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २३ उन देववरोंने पृथिवीके सभी समुद्रों, वनसे भरे हुए पर्वतों एवं भाँति-भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार किया। उसके बाद (उसके आगे) उन लोगोंने ऐसे स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था, जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी। इस प्रकारके उस 'अमृत' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा कश्यपने प्रज्ञा-सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति, सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे (देवताओंको) सहस्रवार्षिक (हजारों वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले) दिव्य (देव-सम्बन्धी) इच्छा पूर्ण करनेवाले कामद-व्रतकी दीक्षा दी। फिर वे सभी देवता क्रमशः अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने लगे। वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका (सूक्त या स्तोत्रका) स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥ १८-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय २६ ] कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति १२७
छब्बीसवाँ अध्याय
कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति
| कश्यप उवाच | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृषाच्चे सिन्धुवृष वृषाकपे सुरवृष अनादिसम्भव रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषावर्त्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय अमृतेशाय सनातन त्रिधाम तुषित महातत्त्व लोकनाथ पद्मनाभ विरिञ्चे बहुरूप अक्षय अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक्र मुञ्जकेश हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाभ गभस्तिनाभ शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः समुद्रवासः अजः सहस्रशिरः सहस्रपाद अधोमुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्त्ते सहस्रास्य सहस्रसम्भव सहस्रसत्त्वं त्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव वौषट् वषट्कारं त्वामाहुरग्र्यं मखेषु प्राशितारं सहस्रधारं च भूश्च भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय ब्राह्मणप्रिय त्वमेव द्यौरसि मातरिश्वाऽसि धर्मोऽसि होता पोता मन्ता नेता होमहेतुस्त्वमेव अग्र्य विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर्गतिर्दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि । धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोऽसि दक्षिणाऽसि विश्वमसि । स्थविर हिरण्यनाभ नारायण त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर शम्भो स्वयम्भो भूतादिः महाभूतोऽसि विश्वभूत विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसि | कश्यपने कहा— हे देवदेव, एकशृङ्ग, वृषार्चि, सिन्धुवृष, वृषाकपि, सुरवृष, अनादिसम्भव, रुद्र, कपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति (सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी), ध्रुव, धर्माधर्म, वैकुण्ठ, वृषावर्त्त, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्रव, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशाय, सनातन, त्रिधाम, तुषित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिञ्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक्र, मुञ्जकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ठ, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाभ, शतक्रतुनाभ, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रास्य, सहस्रसम्भव ! मेरा आपके चरणोंमें नमस्कार है। (आपके भक्तजन) आपको सहस्रसत्त्व कहते हैं। (खिले हुए पुष्पके समान मधुर मुसकानवाले) पुष्पहास, चरम (सर्वोत्तम) ! लोग आपको ही वौषट् एवं वषट्कार कहते हैं। आप ही अग्र्य, (सर्वश्रेष्ठ) यज्ञोंमें प्राशिता (भोक्ता) हैं; सहस्रधार, भूः, भुवः एवं स्वः हैं। आप ही वेदवेद्य (वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य), ब्रह्मशय, ब्राह्मणप्रिय (अग्निके प्रेमी), द्यौः (आकाशके समान सर्वव्यापी), मातरिश्वा (वायुके समान गतिमान्), धर्म, होता, पोता (विष्णु), मन्ता, नेता एवं होमके हेतु हैं। आप ही विश्वतेजके द्वारा अग्र्य (सर्वश्रेष्ठ) हैं और दिशाओंके द्वारा सुभाण्ड (विस्तृत पात्ररूप) हैं अर्थात् दिशाएँ आपमें समाविष्ट हैं। आप (यजन करनेयोग्य) इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एवं दाता हैं। आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा (सृष्टि करनेवाले), धाता (धारण और पोषण करनेवाले), परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एवं विश्व हैं। आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, त्रिनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शम्भु, स्वयम्भू, भूतादि, महाभूत, विश्वभूत एवं विश्व हैं। आप ही |
३०- बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना
१२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव । वरार्थिनां वरदोऽसि त्वम्। चतुर्भिborder... wait चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च। हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुभ्यं होत्रात्मने नमः॥ १ संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव - विश्वकी सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म (उत्तमकर्मा), अमृत (कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले), दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा (विश्वका पालन करनेवाले) तथा वरद-वर चाहनेवालोंके लिये वरदानी हैं। चार (आश्रावय), चार (अस्तु श्रौषड्), दो (यज) तथा पाँच (ये यजामहे) और पुनः दो (वषट्) अक्षरों - इस प्रकार ४+४+२+५+२=१७ अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना लोमहर्षण उवाच नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम्। ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्॥ १ उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम्। श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः॥ २ वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः। कश्यप उवाच प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥ ३ वासवस्याborder वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः। अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः॥ ४ अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्। पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी॥ ५ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला समयानुकूल उचित वचन कहा - श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको (इच्छित) वर दूँगा॥ २ १/२ ॥ कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान् भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें। वरकी याचना करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से पुत्रकी प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको प्रकट किया - कहा ॥ ३-५॥
अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२९ देवा ऊचुः निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर। त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥ ६ ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च। सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः। मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७ हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः। हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितृनपि ॥ ८ करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा। यथायातेन मार्गेण निवर्त्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९ लोमहर्षण उवाच एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना। ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥ १० विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च। नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११ प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम्। ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥ १२ प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन्। सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा॥ १३ तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम्। आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना ॥ १४ दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः । वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम्। तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थविबोधिनी ॥ १५ शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम्। देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६ [अदितिके अभिप्रायको जानकर] देवताओंने कहा - महेश्वर ! सभी देवताओंके परम कल्याणके लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन- पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें। इसके बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे। देवश्रेष्ठो ! परमेष्ठी (ब्रह्मा) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व- प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा। सुरोत्तमो ! अब आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस लौट जायँ ॥ ६-९ ॥ लोमहर्षणने कहा - प्रभावशाली भगवान् विष्णुने जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े। जब देवगण कुरुक्षेत्र-वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके लिये प्रेरित किया। (फिर) उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ कठिन तपस्या की ॥ १०-१३ ॥ श्रेष्ठ ऋषियो ! (जिस वनमें अदितिने तप किया) उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा। वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी है। ऋषिश्रेष्ठो ! परम अर्थको जाननेवाली (तत्त्वज्ञा) अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा; उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है; इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि-मध्य और अन्तके रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना प्रारम्भ कर दिया ॥ १४-१६ ॥
१३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ अदितिरुवाच नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने। नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १७ नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये। नमः पङ्कजसंभूतिसंभावायात्मयोनये ॥ १८ श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे। नमः पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ॥ १९ तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने। निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ २० जगच्च तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते। नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ २१ यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः। अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थितः ॥ २२ बहिर्ज्योतिरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिषः परः। यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिलं जगत् ॥ २३ तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः। आद्यः प्रजापतिः सोऽपि पितॄणां परमं पतिः। पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ २४ यः प्रवृत्तैर्निवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते। स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ॥ २५ अदिति बोलीं - कृत्यासे उत्पन्न दुःखका नाश करनेवाले प्रभुको नमस्कार है। कमलकी मालाको धारण करनेवाले पुष्करमाली भगवान्को नमस्कार है। परम मङ्गलकारी, कल्याणस्वरूप आदिविधाता प्रभो! आपको नमस्कार है। कमलनयन! आपको नमस्कार है। पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके स्थान, आत्मजन्म! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप लक्ष्मीपति, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, संयमियोंके द्वारा दर्शन पाने योग्य, हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले एवं खड्ग (तलवार) धारण करते हैं; आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आत्मज्ञानके द्वारा यज्ञ करनेवाले, योगियोंके द्वारा ध्यान करने योग्य, योगकी साधना करनेवाले योगी, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे रहित किंतु (दयादि) विशिष्ट गुणोंसे युक्त ब्रह्मरूपी श्रीहरि भगवान्को नमस्कार है ॥ १७-२० ॥ जिन आप परमेश्वरमें सारा संसार स्थित है, किंतु जो संसारसे दृश्य नहीं हैं, ऐसे स्थूल तथा अतिसूक्ष्म आप शार्ङ्गधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्की अपेक्षा करनेवाले प्राणी जिन आपके दर्शनसे वञ्चित रहते हैं, आपका वे दर्शन नहीं कर पाते, परंतु जिन्होंने जगत्की अपेक्षा नहीं की, उन्हें आप उनके हृदयमें स्थित दीखते हैं। आपकी ज्योति बाहर है एवं अलक्ष्य है, सर्वोत्तम ज्योति है; यह सारा जगत् आपमें स्थित है, आपसे उत्पन्न होता है और आपका ही है, जगत्के देवता उन आपको नमस्कार है। जो आप सबके आदिमें प्रजापति रहे हैं एवं पितरोंके श्रेष्ठ स्वामी हैं, देवताओंके स्वामी हैं; उन आप श्रीकृष्णको बार-बार नमस्कार है ॥ २१-२४ ॥ जो प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंसे विरक्त तथा स्वर्ग और मोक्षके फलके देनेवाले हैं, उन गदा धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। जो
३१- वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना
अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १३१ यस्तु संचिन्त्यमानोऽपि सर्वं पापं व्यपोहति। नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेधसे ॥ २६ ये पश्यन्त्यखिलाधारमीशानमजमव्ययम्। न पुनर्जन्ममरणं प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७ यो यज्ञो यज्ञपरमौरिज्यते यज्ञसंस्थितः। तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८ गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्विदां गतिः। यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २९ यतो विश्वं समुद्भूतं यस्मिन् प्रलयमेष्यति । विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ॥ ३० आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं व्याप्तं येन चराचरम्। मायाजालसमुन्नद्धं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३१ योऽत्र तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः। विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२ मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः। रात्रिंजं सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३ यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्। पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४ यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्। नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ॥ ३५ यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनार्दन । सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६ स्मरण करनेवालेके सारे पाप नष्ट कर देते हैं, उन विशुद्ध हरिमेधाको मेरा नमस्कार है। जो प्राणी अविनाशी भगवान्को अखिलाधार, ईशान एवं अजके रूपमें देखते हैं, वे कभी भी जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते । प्रभो ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। आपकी आराधना यज्ञोंद्वारा होती है, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, यज्ञमें आपकी स्थिति है; यज्ञपुरुष ! आप ईश्वर, प्रभु विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २५-२८ ॥ वेदोंमें आपका गुणगान हुआ है - इसे वेदज्ञ गाते हैं। आप विद्वज्जनोंके आश्रय हैं, वेदोंसे जानने योग्य एवं नित्यस्वरूप हैं; आप विष्णुको मेरा नमस्कार है। विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है और जिनमें विलीन होगा तथा जो विश्वके उद्भव एवं प्रतिष्ठाके स्वरूप हैं, उन महान् आत्मा (परमात्मा)-को मेरा नमस्कार है। जिनके द्वारा मायाजालसे बँधा हुआ ब्रह्मासे लेकर चराचर (विश्व) व्याप्त है, उन उपेन्द्र- भगवान्को मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जल- स्वरूपमें स्थित होकर अखिल विश्वका भरण करते हैं, उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २९-३२ ॥ जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रिसे उत्पन्न, रूपधारी तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम करती हूँ। जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा-रूप दोनों आँखें समस्त लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंको सतत देखती रहती हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके विषयमें मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है- असत्य नहीं है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्रष्टा विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ। हे जनार्दन ! यदि मैंने यह सत्य कहा है तो उस सत्यके प्रभावसे मेरे मनकी सारी अभिलाषाएँ परिपूर्ण हों ॥ ३३-३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २७ ॥
१३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २८ अट्ठाईसवाँ अध्याय अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतोऽथ भगवान् वासुदेव उवाच ताम्। अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥ १ लोमहर्षणने कहा- इस प्रकार स्तुति किये जानेपर समस्त प्राणियोंके दृष्टि-पथमें न आनेवाले भगवान् वासुदेव उसके सामने प्रकट हुए और उससे (इस प्रकार) बोले - ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छस्यभिवाञ्छितान्। तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २ श्रीभगवान् बोले- धर्मज्ञे (धर्मके मर्मको जाननेवाली) अदिति ! तुम मुझसे जिन मनचाही कामनाओंकी पूर्ति चाहती हो, उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें कोई संदेह नहीं। महाभागे ! सुनो, तुम्हारे मनमें जिन वरोंकी इच्छा है, उन्हें तुम मुझसे माँगो; क्योंकि मेरे दर्शन करनेका फल कभी व्यर्थ नहीं होता। तुम्हारे इस (अदिति) वनमें रहकर जो तीन रातोंतक निवास करेगा, उसकी सभी मनचाही कामनाएँ पूरी होंगी। जो मनुष्य दूर देशमें स्थित रहकर भी तुम्हारे इस वनका स्मरण करेगा, वह परम धामको प्राप्त कर लेगा। फिर यहाँ रहनेवाले मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य ? जो मानव इस स्थानपर पाँच, तीन अथवा दो या एक ही ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक भोजन करायेगा, वह उत्तम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करेगा ॥ २-६ ॥ अदितिने कहा- भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र तीनों लोकोंका स्वामी हो जाय। असुरोंने उसके राज्यको तथा यज्ञमें मिलनेवाले भागको छीन लिया है। अतः वरदाता प्रभो! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र उसे (राज्यको) प्राप्त कर ले। केशव ! मेरे पुत्रके राज्यके असुरोंद्वारा छीने जानेका मुझे दुःख नहीं है, किंतु (उसके) प्राप्त होनेवाले उचित भागका छिन जाना मेरे हृदयको कुरेद रहा है ॥ ७-९ ॥ श्रीभगवान् बोले- देवि ! तुम्हारी इच्छाके अनुकूल मैंने तुम्हारे ऊपर कृपा-प्रसाद प्रकट किया है। (सुनो,) कश्यपसे तुम्हारे गर्भमें मैं अपने अंशसे जन्म लूँगा और शृणु त्वं च महाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः। मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥ ३ यश्चेह त्वद्वने स्थित्वा त्रिरात्रं वै करिष्यति। सर्वे कामाः समृध्यन्ते मनसा यानिहेच्छति ॥ ४ दूरस्थोऽपि वनं यस्तु अदित्याः स्मरते नरः। सोऽपि याति परं स्थानं किं पुनर्निवसन् नरः ॥ ५ यश्चेह ब्राह्मणान् पञ्च त्रीन् वा द्वावेकमेव वा। भोजयेच्छ्रद्धया युक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ६ अदितिरुवाच यदि देव प्रसन्नस्त्वं भक्त्या मे भक्तवत्सल। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ॥ ७ हृतं राज्यं हतश्चास्य यज्ञभाग इहासुरैः। त्वयि प्रसन्ने वरद तत् प्राप्नोतु सुतो मम ॥ ८ हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव। प्रपन्नदायविध्वंशो बाधां मे कुरुते हृदि ॥ ९ श्रीभगवानुवाच कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितम्। स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ॥ १०
| अध्याय २९ ] | बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन | १३३ | | :--- | :--- |
| तव गर्भे समुद्भूतस्ततस्ते ये त्वरातयः।<br>तानहं च हनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥ ११ | तुम्हारी कोखसे जन्म लेकर फिर तुम्हारे जितने शत्रु हैं, उन (सभी)-का वध करूँगा। नन्दिनि! तुम शोक छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ १०-११ ॥ | | अदितिरुवाच<br>प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन।<br>नाहं त्वामुदरे वोढुमीश शक्ष्यामि केशव।<br>यस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं विश्वयोनित्वमीश्वरः ॥ १२ | **अदितिने कहा—**देवदेवेश! आप (मुझपर) प्रसन्न हों। विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है। हे केशव! हे ईश! आप विश्वके उत्पत्ति-स्थान और ईश्वर हैं। जिन आप प्रभुमें सारा संसार प्रतिष्ठित है, उन आपके भारको मैं अपनी कोखमें वहन न कर सकूँगी ॥ १२ ॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अहं त्वां च वहिष्यामि आत्मानं चैव नन्दिनि।<br>न च पीडां करिष्यामि स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ १३ | श्रीभगवान्ने कहा— नन्दिनि! मैं स्वयं अपना और तुम्हारा—दोनोंका भार वहन कर लूँगा; मैं तुम्हें पीड़ा नहीं करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। | | इत्युक्त्वान्तर्हिते देवेऽदितिर्गर्भं समादधे।<br>गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।<br>चकम्पिरे महाशैला जग्मुः क्षोभं महाब्धयः ॥ १४ | यह कहकर भगवान्के चले जानेपर अदितिने गर्भको धारण कर लिया। भगवान् (कृष्ण)-के गर्भमें आ जानेपर सारी पृथ्वी डगमगा गयी। बड़े-बड़े पर्वत हिलने लगे एवं विशाल समुद्र विक्षुब्ध हो गये। | | यतो यतोऽदितिर्याति ददाति पदमुत्तमम्।<br>ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम द्विजपुंगवाः ॥ १५ | द्विजश्रेष्ठो! अदिति जहाँ-जहाँ जाती या पैर रखती थीं, वहाँ-वहाँकी पृथ्वी खेद (भार)-के कारण झुक जाती थी। | | दैत्यानामपि सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।<br>बभूव तेजसो हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ १६ | जैसा कि ब्रह्माने (पहले) बतलाया था, मधुसूदनके गर्भमें आनेपर सभी दैत्योंके तेजकी हानि हो गयी ॥ १३-१६ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २८ ॥
उन्तीसवाँ अध्याय
बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन
| लोमहर्षण उवाच<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः।<br>प्रह्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम् ॥ १ | लोमहर्षण बोले— उसके बाद (दैत्योंके तेजके समाप्त हो जानेपर) असुरराज बलिने समस्त असुरोंको श्रीहीन देखकर अपने पितामह प्रह्लादजीसे पूछा— ॥ १ ॥ | | बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना।<br>किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव ॥ २ | बलिने कहा— तात! (इस समय) दैत्यलोग आगसे झुलसे हुए-से कान्तिहीन हो गये हैं। आज ये ऐसे क्यों हो गये हैं? प्रतीत होता है कि मानो इन्हें ब्राह्मणका अभिशाप लग गया है—ये ब्रह्मदण्डसे जैसे |
१३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ दुरिष्टं किं तु दैत्यानां किं कृत्या विधिनिर्मिता । नाशायैषां समुद्भूता येन निस्तेजसोऽसुराः ॥ ३ पीड़ित हो गये हैं ! क्या दैत्योंका कोई अशुभ होनेवाला है ? अथवा इनके नाशके लिये ब्रह्माने कृत्या (पुरश्चरणसे उत्पन्न की गयी मारिकाशक्ति) - को उत्पन्न कर दिया है, जिससे ये असुरलोग इस प्रकार तेजसे रहित हो गये हैं ॥ २-३ ॥ लोमहर्षण उवाच इत्यसुरवरस्तेन पृष्टः पौत्रेण ब्राह्मणाः । चिरं ध्यात्वा जगादेदमसुरं तं तदा बलिम् ॥ ४ लोमहर्षण बोले - ब्राह्मणो ! अपने पौत्र (पुत्रके पुत्र) राजा बलिके इस प्रकार पूछनेपर दैत्योंमें प्रधान प्रह्लादने देरतक ध्यान करके तब असुर बलिसे कहा - ॥४॥ प्रह्लाद उवाच चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहसा धृतिम् । सद्यः समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः ॥ ५ प्रह्लादने कहा - दानवाधिप ! इस समय पहाड़ डगमगा रहे हैं, पृथ्वी एकाएक अपनी (स्वाभाविक) धीरता छोड़ रही है, समुद्रमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं और दैत्य तेजसे रहित हो गये हैं। सूर्योदय होनेपर अब पहलेके समान ग्रहोंकी चाल नहीं दीखती है। इन कारणों (लक्षणों)-से अनुमान होता है कि देवताओंका अभ्युदय होनेवाला है। महाबाहु ! दानवेश्वर ! यह कोई विशेष कारण अवश्य है। इस कारणको छोटा नहीं मानना चाहिये और आपको इसका कोई प्रतिप्रत्न (उपाय) करना चाहिये ॥ ५-७ ॥ सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः । देवानां च परा लक्ष्मीः कारणेनानुमीयते ॥ ६ महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर । न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं कथंचन ॥ ७ लोमहर्षण उवाच इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः । अत्यर्थभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् ॥ ८ स ध्यानपथगं कृत्वा प्रह्लादश्च मनोऽसुरः । विचारयामास ततो यथा देवो जनार्दनः ॥ ९ स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम् । तदन्तश्च वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ॥ १० साध्यान् विश्वे तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान् । विरोचनं च तनयं बलिं चासुरनायकम् ॥ ११ जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान् । आत्मानमुर्वीं गगनं वायुं वारि हुताशनम् ॥ १२ समुद्राद्रिसरिद्वीपान् सरांसि च पशून् महीम् । व्योममनुष्यानखिलंस्तथैव च सरीसृपान् ॥ १३ समस्तलोकस्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च । ग्रहनक्षत्रताराश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन् ॥ १४ सम्पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः । प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं ततः ॥ १५ लोमहर्षणने कहा - असुरोंमें श्रेष्ठ महान् भक्त प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहकर मनसे श्रीहरिका ध्यान किया। असुर प्रह्लादने अपने मनको भगवान्के ध्यान-पथमें लगाकर चिन्तन किया- जैसा कि भगवान्का स्वरूप है। उन्होंने उस समय (चिन्तन करते समय) अदितिकी कोखमें वामनके रूपमें भगवान्को देखा। उनके भीतर वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों, मरुतों, साध्यों, विश्वेदेवों, आदित्यों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा अपने पुत्र विरोचन एवं असुरनायक बलि, जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा इस प्रकारके दूसरे बहुत-से असुरों एवं अपनेको और पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्रों, पर्वतों, नदियों, द्वीपों, सरों, पशुओं, भूसम्पत्तियों, पक्षियों, सम्पूर्ण मनुष्यों, सरकनेवाले जीवों, समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्मा, शिव, ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। प्रह्लाद इन्हें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये, किंतु क्षणमात्रमें ही पुनः पूर्ववत् प्रकृतिस्थ हो गये और विरोचन-पुत्र दैत्योंके राजा बलिसे बोले - ॥ ८-१५ ॥
अध्याय २९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन १३५ तत्संजातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम्। तेजसो हानिरुत्पन्ना शृण्वन्तु तदशेषतः ॥ १६ देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिजः । अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः ॥ १७ परावराणां परमः परापरसतां गतिः । प्रभुः प्रमाणं मानानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः । स्थितिं कर्तुं जगन्नाथं सोऽचिन्त्यो गर्भतां गतः ॥ १८ प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा- मनादिमध्यो भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेकः कर्तुं महात्माऽदितिजोऽवतीर्णः ॥ १९ न यस्य रुद्रा न च पद्मयोनि- र्नेन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमिश्राः । जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ २० यमक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यं ज्ञानविधूतपापाः । यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति तं वासुदेवं प्रणमामि देवम् ॥ २१ भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम् । लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति तं वासुदेवं प्रणतोऽस्म्यचिन्त्यम् ॥ २२ न यस्य रूपं न बलं प्रभावो न च प्रतापः परमस्य पुंसः । विज्ञायते सर्वपितामहाद्यै- स्तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम् ॥ २३ रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगेषा स्पर्शग्रहित्री रसना रसस्य । घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तं न घ्राणचक्षुः श्रवणादि तस्य ॥ २४ स्वयंप्रकाशः परमार्थतो यः सर्वेश्वरो वेदितव्यः स युक्त्या। शक्यं तमीड्यमनघं च देवं ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम् ॥ २५ (दैत्यो!) मैंने तुमलोगोंकी कान्तिहीनताके (वास्तविक) सब कारणको - अच्छी तरहसे समझ लिया है। (अब) उसे तुमलोग भलीभाँति सुनो। देवोंके देव, जगद्योनि, (विश्वको उत्पन्न करनेवाले) किंतु स्वयं अयोनि, विश्वके प्रारम्भमें विद्यमान पर स्वयं अनादि, फिर भी विश्वके आदि, वर देनेवाले वरणीय हरि, सर्वश्रेष्ठोंमें भी परम (श्रेष्ठ), बड़े-छोटे सज्जनोंकी गति, मानोंके भी प्रमाणभूत प्रभु, सातों लोकोंके गुरुओंके भी गुरु एवं चिन्तनमें न आने योग्य विश्वके स्वामी मर्यादा (धर्महेतु)-की स्थापना करनेके लिये (अदितिके) गर्भमें आ गये हैं। प्रभुओंके प्रभु, श्रेष्ठोंमें श्रेष्ठ, आदि-मध्यसे रहित, अनन्त भगवान् तीनों लोकोंको सनाथ करनेके लिये अदितिके पुत्रके रूपमें अंशावतारस्वरूपसे अवतीर्ण हुए हैं ॥ १६-१९॥ दैत्यपते ! जिन वासुदेव भगवान्के वास्तविक स्वरूपको रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ पुरुष नहीं जानते, वे ही वासुदेव भगवान् अपनी एक कलासे अवतीर्ण हुए हैं। वेदके जाननेवाले जिन्हें अक्षर कहते हैं तथा ब्रह्मज्ञानके होनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं - ऐसे निष्पाप शुद्ध प्राणी जिनमें प्रवेश पाते हैं और जिनके भीतर प्रविष्ट हुए लोग पुनः जन्म नहीं लेते - ऐसे उन वासुदेव भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। समुद्रकी लहरोंके समान जिनसे समस्त जीव निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं तथा प्रलयकालमें जिनके भीतर विलीन हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि जिन परम पुरुषके रूप, बल, प्रभाव और प्रतापको नहीं जान पाते उन वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २०-२३ ॥ जिन परमेश्वरने रूप देखनेके लिये आँखोंको, स्पर्शज्ञानके लिये त्वचाको, खट्टे-मीठे स्वाद लेनेके लिये जीभको और सुगन्ध-दुर्गन्ध सूंघनेके लिये नाकको नियत किया है; पर स्वयं उनके नाक, आँख और कान आदि नहीं हैं। जो वस्तुतः स्वयं प्रकाशस्वरूप हैं, वे सर्वेश्वर युक्ति के द्वारा (कुछ-कुछ) जाने जा सकते हैं; उन सर्वसमर्थ, स्तुतिके योग्य, किसी भी प्रकारके मलसे रहित, (भक्तिसे) ग्राह्य, ईश हरिदेवको मैं प्रणाम करता हूँ।
१३६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ येनैकदंष्ट्रेण समुद्धृतेयं धरा चला धारयतीह सर्वम्। शेते ग्रसित्वा सकलं जगद् य- स्तमीड्यमीशं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६ अंशावतीर्णेन च येन गर्भे हतानि तेजांसि महासुराणाम्। नमामि तं देवमनन्तमीश- मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २७ देवो जगद्योनिरयं महात्मा स षोडशांशेन महाऽसुरेन्द्राः। सुरेन्द्रमातुर्जठरं प्रविष्टो हतानि वस्तेन बलं वपूंषि॥ २८ बलिरुवाच तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्। सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः ॥ २९ विप्रचित्तिः शिबिः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च। हयशिरा अश्वशिरा भङ्कारो महाहनुः ॥ ३० प्रतापी प्रघशः शम्भुः कुक्कुराक्षश्च दुर्जयः। एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा ॥ ३१ महाबला महावीर्या भूभारधरणक्षमाः। एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्द्धेन सम्मितः ॥ ३२ लोमहर्षण उवाच पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः। सक्रोधश्च बलिं प्राह वैकुण्ठाक्षेपवादिनम् ॥ ३३ विनाशमुपयास्यन्ति दैत्या ये चापि दानवाः। येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिर्विवेकवान् ॥ ३४ देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्। त्वामृते पापसंकल्प कोऽन्य एवं वदिष्यति ॥ ३५ य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः। सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरान्ता विभूतयः ॥ ३६ त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीवनम्। ससमुद्रद्वीपलोकोऽयं यश्चेदं सचराचरम्॥ ३७ यस्याभिवाद्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः। एकांशांशकलाजन्म कस्तमेवं प्रवक्ष्यति ॥ ३८ जिनके द्वारा एक मोटे तथा बड़े दाँतसे निकाली गयी चिरस्थायिनी पृथ्वी सभी कुछ धारण करनेमें समर्थ है तथा जो समस्त संसारको अपनेमें स्थान देकर सोनेका स्वाँग धारण करते हैं, उन स्तुत्य ईश विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपने अंशसे अदितिके गर्भमें आकर महासुरोंके तेजका अपहरण कर लिया, उन समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठाररूप धारण करनेवाले अनन्त देवाधीश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। हे महासुरो! जगत्की उत्पत्तिके स्थान वे ही महात्मा देव अपने सोलहवें अंशकी कलासे इन्द्रकी माताके गर्भमें प्रविष्ट हुए हैं और उन्होंने ही तुमलोगोंके शारीरिक बलको अपहृत कर लिया है॥ २४-२८॥ बलिने कहा - तात! जिनसे हम सबको डर है वे हरि कौन हैं? हमारे पास वासुदेवसे अधिक शक्तिशाली सैकड़ों दैत्य हैं; जैसे-विप्रचित्ति, शिबि, शङ्कु, अयःशङ्कु, हयशिरा, अश्वशिरा, (विघटन करनेवाला) भङ्कार, महाहनु, प्रतापी, प्रघश, शम्भु, कुक्कुराक्ष एवं दुर्जय। ये तथा अन्य भी ऐसे अनेक दैत्य एवं दानव हैं। ये सभी महाबलवान् तथा महापराक्रमी एवं पृथ्वीके भारको धारण करनेमें समर्थ हैं। कृष्ण तो हमारे इन बलवान् दैत्योंमेंसे पृथक्-पृथक् एक-एकके आधे बलके समान भी नहीं हैं॥ २९-३२॥ लोमहर्षणने कहा- अपने पौत्रकी इस उक्तिको सुनकर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद क्रुद्ध हो गये और भगवान्की निन्दा करनेवाले बलिसे बोले - बलि! तेरे-जैसे विवेकहीन एवं दुर्बुद्धि राजाके साथ ये सारे दैत्य एवं दानव मारे जायेंगे। हे पापको ही सोचनेवाले पापबुद्धि! तुम्हारे सिवा ऐसा कौन है, जो देवाधिदेव महाभाग अज एवं सर्वव्यापी वासुदेवको इस तरह कहेगा ॥ ३३-३५॥ तुमने जिन-जिनका नाम लिया है, वे सभी दैत्य एवं दानव तथा ब्रह्माके साथ सभी देवता एवं चराचरकी समस्त विभूतियाँ, तुम और मैं, पर्वत तथा वृक्ष, नदी और वनसे युक्त सारा जगत् तथा समुद्र एवं द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण लोक तथा चर और अचर जिन सर्ववन्द्य श्रेष्ठ सर्वव्यापी परमात्माके एक अंशकी अंशकलासे उत्पन्न