भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १३१ यस्तु संचिन्त्यमानोऽपि सर्वं पापं व्यपोहति। नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेधसे ॥ २६ ये पश्यन्त्यखिलाधारमीशानमजमव्ययम्। न पुनर्जन्ममरणं प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७ यो यज्ञो यज्ञपरमौरिज्यते यज्ञसंस्थितः। तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८ गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्विदां गतिः। यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २९ यतो विश्वं समुद्भूतं यस्मिन् प्रलयमेष्यति । विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ॥ ३० आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं व्याप्तं येन चराचरम्। मायाजालसमुन्नद्धं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३१ योऽत्र तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः। विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२ मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः। रात्रिंजं सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३ यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्। पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४ यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्। नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ॥ ३५ यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनार्दन । सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६ स्मरण करनेवालेके सारे पाप नष्ट कर देते हैं, उन विशुद्ध हरिमेधाको मेरा नमस्कार है। जो प्राणी अविनाशी भगवान्‌को अखिलाधार, ईशान एवं अजके रूपमें देखते हैं, वे कभी भी जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते । प्रभो ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। आपकी आराधना यज्ञोंद्वारा होती है, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, यज्ञमें आपकी स्थिति है; यज्ञपुरुष ! आप ईश्वर, प्रभु विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २५-२८ ॥ वेदोंमें आपका गुणगान हुआ है - इसे वेदज्ञ गाते हैं। आप विद्वज्जनोंके आश्रय हैं, वेदोंसे जानने योग्य एवं नित्यस्वरूप हैं; आप विष्णुको मेरा नमस्कार है। विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है और जिनमें विलीन होगा तथा जो विश्वके उद्भव एवं प्रतिष्ठाके स्वरूप हैं, उन महान् आत्मा (परमात्मा)-को मेरा नमस्कार है। जिनके द्वारा मायाजालसे बँधा हुआ ब्रह्मासे लेकर चराचर (विश्व) व्याप्त है, उन उपेन्द्र- भगवान्‌को मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जल- स्वरूपमें स्थित होकर अखिल विश्वका भरण करते हैं, उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २९-३२ ॥ जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रिसे उत्पन्न, रूपधारी तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम करती हूँ। जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा-रूप दोनों आँखें समस्त लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंको सतत देखती रहती हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके विषयमें मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है- असत्य नहीं है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्रष्टा विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ। हे जनार्दन ! यदि मैंने यह सत्य कहा है तो उस सत्यके प्रभावसे मेरे मनकी सारी अभिलाषाएँ परिपूर्ण हों ॥ ३३-३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २७ ॥