वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २८ अट्ठाईसवाँ अध्याय अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना लोमहर्षण उवाच एवं स्तुतोऽथ भगवान् वासुदेव उवाच ताम्। अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥ १ लोमहर्षणने कहा- इस प्रकार स्तुति किये जानेपर समस्त प्राणियोंके दृष्टि-पथमें न आनेवाले भगवान् वासुदेव उसके सामने प्रकट हुए और उससे (इस प्रकार) बोले - ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छस्यभिवाञ्छितान्। तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २ श्रीभगवान् बोले- धर्मज्ञे (धर्मके मर्मको जाननेवाली) अदिति ! तुम मुझसे जिन मनचाही कामनाओंकी पूर्ति चाहती हो, उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें कोई संदेह नहीं। महाभागे ! सुनो, तुम्हारे मनमें जिन वरोंकी इच्छा है, उन्हें तुम मुझसे माँगो; क्योंकि मेरे दर्शन करनेका फल कभी व्यर्थ नहीं होता। तुम्हारे इस (अदिति) वनमें रहकर जो तीन रातोंतक निवास करेगा, उसकी सभी मनचाही कामनाएँ पूरी होंगी। जो मनुष्य दूर देशमें स्थित रहकर भी तुम्हारे इस वनका स्मरण करेगा, वह परम धामको प्राप्त कर लेगा। फिर यहाँ रहनेवाले मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य ? जो मानव इस स्थानपर पाँच, तीन अथवा दो या एक ही ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक भोजन करायेगा, वह उत्तम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करेगा ॥ २-६ ॥ अदितिने कहा- भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र तीनों लोकोंका स्वामी हो जाय। असुरोंने उसके राज्यको तथा यज्ञमें मिलनेवाले भागको छीन लिया है। अतः वरदाता प्रभो! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र उसे (राज्यको) प्राप्त कर ले। केशव ! मेरे पुत्रके राज्यके असुरोंद्वारा छीने जानेका मुझे दुःख नहीं है, किंतु (उसके) प्राप्त होनेवाले उचित भागका छिन जाना मेरे हृदयको कुरेद रहा है ॥ ७-९ ॥ श्रीभगवान् बोले- देवि ! तुम्हारी इच्छाके अनुकूल मैंने तुम्हारे ऊपर कृपा-प्रसाद प्रकट किया है। (सुनो,) कश्यपसे तुम्हारे गर्भमें मैं अपने अंशसे जन्म लूँगा और शृणु त्वं च महाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः। मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥ ३ यश्चेह त्वद्वने स्थित्वा त्रिरात्रं वै करिष्यति। सर्वे कामाः समृध्यन्ते मनसा यानिहेच्छति ॥ ४ दूरस्थोऽपि वनं यस्तु अदित्याः स्मरते नरः। सोऽपि याति परं स्थानं किं पुनर्निवसन् नरः ॥ ५ यश्चेह ब्राह्मणान् पञ्च त्रीन् वा द्वावेकमेव वा। भोजयेच्छ्रद्धया युक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ६ अदितिरुवाच यदि देव प्रसन्नस्त्वं भक्त्या मे भक्तवत्सल। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ॥ ७ हृतं राज्यं हतश्चास्य यज्ञभाग इहासुरैः। त्वयि प्रसन्ने वरद तत् प्राप्नोतु सुतो मम ॥ ८ हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव। प्रपन्नदायविध्वंशो बाधां मे कुरुते हृदि ॥ ९ श्रीभगवानुवाच कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितम्। स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ॥ १०