वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें| अध्याय २९ ] | बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन | १३३ | | :--- | :--- |
| तव गर्भे समुद्भूतस्ततस्ते ये त्वरातयः।<br>तानहं च हनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥ ११ | तुम्हारी कोखसे जन्म लेकर फिर तुम्हारे जितने शत्रु हैं, उन (सभी)-का वध करूँगा। नन्दिनि! तुम शोक छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ १०-११ ॥ | | अदितिरुवाच<br>प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन।<br>नाहं त्वामुदरे वोढुमीश शक्ष्यामि केशव।<br>यस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं विश्वयोनित्वमीश्वरः ॥ १२ | **अदितिने कहा—**देवदेवेश! आप (मुझपर) प्रसन्न हों। विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है। हे केशव! हे ईश! आप विश्वके उत्पत्ति-स्थान और ईश्वर हैं। जिन आप प्रभुमें सारा संसार प्रतिष्ठित है, उन आपके भारको मैं अपनी कोखमें वहन न कर सकूँगी ॥ १२ ॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अहं त्वां च वहिष्यामि आत्मानं चैव नन्दिनि।<br>न च पीडां करिष्यामि स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ १३ | श्रीभगवान्ने कहा— नन्दिनि! मैं स्वयं अपना और तुम्हारा—दोनोंका भार वहन कर लूँगा; मैं तुम्हें पीड़ा नहीं करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। | | इत्युक्त्वान्तर्हिते देवेऽदितिर्गर्भं समादधे।<br>गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।<br>चकम्पिरे महाशैला जग्मुः क्षोभं महाब्धयः ॥ १४ | यह कहकर भगवान्के चले जानेपर अदितिने गर्भको धारण कर लिया। भगवान् (कृष्ण)-के गर्भमें आ जानेपर सारी पृथ्वी डगमगा गयी। बड़े-बड़े पर्वत हिलने लगे एवं विशाल समुद्र विक्षुब्ध हो गये। | | यतो यतोऽदितिर्याति ददाति पदमुत्तमम्।<br>ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम द्विजपुंगवाः ॥ १५ | द्विजश्रेष्ठो! अदिति जहाँ-जहाँ जाती या पैर रखती थीं, वहाँ-वहाँकी पृथ्वी खेद (भार)-के कारण झुक जाती थी। | | दैत्यानामपि सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।<br>बभूव तेजसो हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ १६ | जैसा कि ब्रह्माने (पहले) बतलाया था, मधुसूदनके गर्भमें आनेपर सभी दैत्योंके तेजकी हानि हो गयी ॥ १३-१६ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २८ ॥
उन्तीसवाँ अध्याय
बलिके पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन
| लोमहर्षण उवाच<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः।<br>प्रह्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम् ॥ १ | लोमहर्षण बोले— उसके बाद (दैत्योंके तेजके समाप्त हो जानेपर) असुरराज बलिने समस्त असुरोंको श्रीहीन देखकर अपने पितामह प्रह्लादजीसे पूछा— ॥ १ ॥ | | बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना।<br>किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव ॥ २ | बलिने कहा— तात! (इस समय) दैत्यलोग आगसे झुलसे हुए-से कान्तिहीन हो गये हैं। आज ये ऐसे क्यों हो गये हैं? प्रतीत होता है कि मानो इन्हें ब्राह्मणका अभिशाप लग गया है—ये ब्रह्मदण्डसे जैसे |