भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ दुरिष्टं किं तु दैत्यानां किं कृत्या विधिनिर्मिता । नाशायैषां समुद्भूता येन निस्तेजसोऽसुराः ॥ ३ पीड़ित हो गये हैं ! क्या दैत्योंका कोई अशुभ होनेवाला है ? अथवा इनके नाशके लिये ब्रह्माने कृत्या (पुरश्चरणसे उत्पन्न की गयी मारिकाशक्ति) - को उत्पन्न कर दिया है, जिससे ये असुरलोग इस प्रकार तेजसे रहित हो गये हैं ॥ २-३ ॥ लोमहर्षण उवाच इत्यसुरवरस्तेन पृष्टः पौत्रेण ब्राह्मणाः । चिरं ध्यात्वा जगादेदमसुरं तं तदा बलिम् ॥ ४ लोमहर्षण बोले - ब्राह्मणो ! अपने पौत्र (पुत्रके पुत्र) राजा बलिके इस प्रकार पूछनेपर दैत्योंमें प्रधान प्रह्लादने देरतक ध्यान करके तब असुर बलिसे कहा - ॥४॥ प्रह्लाद उवाच चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहसा धृतिम् । सद्यः समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः ॥ ५ प्रह्लादने कहा - दानवाधिप ! इस समय पहाड़ डगमगा रहे हैं, पृथ्वी एकाएक अपनी (स्वाभाविक) धीरता छोड़ रही है, समुद्रमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं और दैत्य तेजसे रहित हो गये हैं। सूर्योदय होनेपर अब पहलेके समान ग्रहोंकी चाल नहीं दीखती है। इन कारणों (लक्षणों)-से अनुमान होता है कि देवताओंका अभ्युदय होनेवाला है। महाबाहु ! दानवेश्वर ! यह कोई विशेष कारण अवश्य है। इस कारणको छोटा नहीं मानना चाहिये और आपको इसका कोई प्रतिप्रत्न (उपाय) करना चाहिये ॥ ५-७ ॥ सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः । देवानां च परा लक्ष्मीः कारणेनानुमीयते ॥ ६ महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर । न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं कथंचन ॥ ७ लोमहर्षण उवाच इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः । अत्यर्थभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् ॥ ८ स ध्यानपथगं कृत्वा प्रह्लादश्च मनोऽसुरः । विचारयामास ततो यथा देवो जनार्दनः ॥ ९ स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम् । तदन्तश्च वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ॥ १० साध्यान् विश्वे तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान् । विरोचनं च तनयं बलिं चासुरनायकम् ॥ ११ जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान् । आत्मानमुर्वीं गगनं वायुं वारि हुताशनम् ॥ १२ समुद्राद्रिसरिद्वीपान् सरांसि च पशून् महीम् । व्योममनुष्यानखिलंस्तथैव च सरीसृपान् ॥ १३ समस्तलोकस्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च । ग्रहनक्षत्रताराश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन् ॥ १४ सम्पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः । प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं ततः ॥ १५ लोमहर्षणने कहा - असुरोंमें श्रेष्ठ महान् भक्त प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहकर मनसे श्रीहरिका ध्यान किया। असुर प्रह्लादने अपने मनको भगवान्‌के ध्यान-पथमें लगाकर चिन्तन किया- जैसा कि भगवान्‌का स्वरूप है। उन्होंने उस समय (चिन्तन करते समय) अदितिकी कोखमें वामनके रूपमें भगवान्‌को देखा। उनके भीतर वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों, मरुतों, साध्यों, विश्वेदेवों, आदित्यों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा अपने पुत्र विरोचन एवं असुरनायक बलि, जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा इस प्रकारके दूसरे बहुत-से असुरों एवं अपनेको और पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्रों, पर्वतों, नदियों, द्वीपों, सरों, पशुओं, भूसम्पत्तियों, पक्षियों, सम्पूर्ण मनुष्यों, सरकनेवाले जीवों, समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्मा, शिव, ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। प्रह्लाद इन्हें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये, किंतु क्षणमात्रमें ही पुनः पूर्ववत् प्रकृतिस्थ हो गये और विरोचन-पुत्र दैत्योंके राजा बलिसे बोले - ॥ ८-१५ ॥