वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ अदितिरुवाच नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने। नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १७ नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये। नमः पङ्कजसंभूतिसंभावायात्मयोनये ॥ १८ श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे। नमः पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ॥ १९ तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने। निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ २० जगच्च तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते। नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ २१ यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः। अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थितः ॥ २२ बहिर्ज्योतिरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिषः परः। यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिलं जगत् ॥ २३ तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः। आद्यः प्रजापतिः सोऽपि पितॄणां परमं पतिः। पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ २४ यः प्रवृत्तैर्निवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते। स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ॥ २५ अदिति बोलीं - कृत्यासे उत्पन्न दुःखका नाश करनेवाले प्रभुको नमस्कार है। कमलकी मालाको धारण करनेवाले पुष्करमाली भगवान्को नमस्कार है। परम मङ्गलकारी, कल्याणस्वरूप आदिविधाता प्रभो! आपको नमस्कार है। कमलनयन! आपको नमस्कार है। पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके स्थान, आत्मजन्म! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप लक्ष्मीपति, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, संयमियोंके द्वारा दर्शन पाने योग्य, हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले एवं खड्ग (तलवार) धारण करते हैं; आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आत्मज्ञानके द्वारा यज्ञ करनेवाले, योगियोंके द्वारा ध्यान करने योग्य, योगकी साधना करनेवाले योगी, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे रहित किंतु (दयादि) विशिष्ट गुणोंसे युक्त ब्रह्मरूपी श्रीहरि भगवान्को नमस्कार है ॥ १७-२० ॥ जिन आप परमेश्वरमें सारा संसार स्थित है, किंतु जो संसारसे दृश्य नहीं हैं, ऐसे स्थूल तथा अतिसूक्ष्म आप शार्ङ्गधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्की अपेक्षा करनेवाले प्राणी जिन आपके दर्शनसे वञ्चित रहते हैं, आपका वे दर्शन नहीं कर पाते, परंतु जिन्होंने जगत्की अपेक्षा नहीं की, उन्हें आप उनके हृदयमें स्थित दीखते हैं। आपकी ज्योति बाहर है एवं अलक्ष्य है, सर्वोत्तम ज्योति है; यह सारा जगत् आपमें स्थित है, आपसे उत्पन्न होता है और आपका ही है, जगत्के देवता उन आपको नमस्कार है। जो आप सबके आदिमें प्रजापति रहे हैं एवं पितरोंके श्रेष्ठ स्वामी हैं, देवताओंके स्वामी हैं; उन आप श्रीकृष्णको बार-बार नमस्कार है ॥ २१-२४ ॥ जो प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंसे विरक्त तथा स्वर्ग और मोक्षके फलके देनेवाले हैं, उन गदा धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। जो