भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२९ देवा ऊचुः निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर। त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥ ६ ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च। सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः। मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७ हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः। हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितृनपि ॥ ८ करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा। यथायातेन मार्गेण निवर्त्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९ लोमहर्षण उवाच एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना। ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥ १० विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च। नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११ प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम्। ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥ १२ प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन्। सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा॥ १३ तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम्। आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना ॥ १४ दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः । वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम्। तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थविबोधिनी ॥ १५ शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम्। देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६ [अदितिके अभिप्रायको जानकर] देवताओंने कहा - महेश्वर ! सभी देवताओंके परम कल्याणके लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन- पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें। इसके बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे। देवश्रेष्ठो ! परमेष्ठी (ब्रह्मा) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व- प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा। सुरोत्तमो ! अब आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस लौट जायँ ॥ ६-९ ॥ लोमहर्षणने कहा - प्रभावशाली भगवान् विष्णुने जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े। जब देवगण कुरुक्षेत्र-वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके लिये प्रेरित किया। (फिर) उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ कठिन तपस्या की ॥ १०-१३ ॥ श्रेष्ठ ऋषियो ! (जिस वनमें अदितिने तप किया) उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा। वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी है। ऋषिश्रेष्ठो ! परम अर्थको जाननेवाली (तत्त्वज्ञा) अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा; उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है; इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि-मध्य और अन्तके रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना प्रारम्भ कर दिया ॥ १४-१६ ॥