भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव । वरार्थिनां वरदोऽसि त्वम्। चतुर्भिborder... wait चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च। हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुभ्यं होत्रात्मने नमः॥ १ संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव - विश्वकी सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म (उत्तमकर्मा), अमृत (कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले), दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा (विश्वका पालन करनेवाले) तथा वरद-वर चाहनेवालोंके लिये वरदानी हैं। चार (आश्रावय), चार (अस्तु श्रौषड्), दो (यज) तथा पाँच (ये यजामहे) और पुनः दो (वषट्) अक्षरों - इस प्रकार ४+४+२+५+२=१७ अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना लोमहर्षण उवाच नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम्। ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्॥ १ उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम्। श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः॥ २ वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः। कश्यप उवाच प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥ ३ वासवस्याborder वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः। अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः॥ ४ अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्। पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी॥ ५ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला समयानुकूल उचित वचन कहा - श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको (इच्छित) वर दूँगा॥ २ १/२ ॥ कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान् भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें। वरकी याचना करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से पुत्रकी प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको प्रकट किया - कहा ॥ ३-५॥