भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ येनैकदंष्ट्रेण समुद्धृतेयं धरा चला धारयतीह सर्वम्। शेते ग्रसित्वा सकलं जगद् य- स्तमीड्यमीशं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६ अंशावतीर्णेन च येन गर्भे हतानि तेजांसि महासुराणाम्। नमामि तं देवमनन्तमीश- मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २७ देवो जगद्योनिरयं महात्मा स षोडशांशेन महाऽसुरेन्द्राः। सुरेन्द्रमातुर्जठरं प्रविष्टो हतानि वस्तेन बलं वपूंषि॥ २८ बलिरुवाच तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्। सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः ॥ २९ विप्रचित्तिः शिबिः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च। हयशिरा अश्वशिरा भङ्कारो महाहनुः ॥ ३० प्रतापी प्रघशः शम्भुः कुक्कुराक्षश्च दुर्जयः। एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा ॥ ३१ महाबला महावीर्या भूभारधरणक्षमाः। एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्द्धेन सम्मितः ॥ ३२ लोमहर्षण उवाच पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः। सक्रोधश्च बलिं प्राह वैकुण्ठाक्षेपवादिनम् ॥ ३३ विनाशमुपयास्यन्ति दैत्या ये चापि दानवाः। येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिर्विवेकवान् ॥ ३४ देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्। त्वामृते पापसंकल्प कोऽन्य एवं वदिष्यति ॥ ३५ य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः। सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरान्ता विभूतयः ॥ ३६ त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीवनम्। ससमुद्रद्वीपलोकोऽयं यश्चेदं सचराचरम्॥ ३७ यस्याभिवाद्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः। एकांशांशकलाजन्म कस्तमेवं प्रवक्ष्यति ॥ ३८ जिनके द्वारा एक मोटे तथा बड़े दाँतसे निकाली गयी चिरस्थायिनी पृथ्वी सभी कुछ धारण करनेमें समर्थ है तथा जो समस्त संसारको अपनेमें स्थान देकर सोनेका स्वाँग धारण करते हैं, उन स्तुत्य ईश विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपने अंशसे अदितिके गर्भमें आकर महासुरोंके तेजका अपहरण कर लिया, उन समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठाररूप धारण करनेवाले अनन्त देवाधीश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। हे महासुरो! जगत्की उत्पत्तिके स्थान वे ही महात्मा देव अपने सोलहवें अंशकी कलासे इन्द्रकी माताके गर्भमें प्रविष्ट हुए हैं और उन्होंने ही तुमलोगोंके शारीरिक बलको अपहृत कर लिया है॥ २४-२८॥ बलिने कहा - तात! जिनसे हम सबको डर है वे हरि कौन हैं? हमारे पास वासुदेवसे अधिक शक्तिशाली सैकड़ों दैत्य हैं; जैसे-विप्रचित्ति, शिबि, शङ्कु, अयःशङ्कु, हयशिरा, अश्वशिरा, (विघटन करनेवाला) भङ्कार, महाहनु, प्रतापी, प्रघश, शम्भु, कुक्कुराक्ष एवं दुर्जय। ये तथा अन्य भी ऐसे अनेक दैत्य एवं दानव हैं। ये सभी महाबलवान् तथा महापराक्रमी एवं पृथ्वीके भारको धारण करनेमें समर्थ हैं। कृष्ण तो हमारे इन बलवान् दैत्योंमेंसे पृथक्-पृथक् एक-एकके आधे बलके समान भी नहीं हैं॥ २९-३२॥ लोमहर्षणने कहा- अपने पौत्रकी इस उक्तिको सुनकर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद क्रुद्ध हो गये और भगवान्‌की निन्दा करनेवाले बलिसे बोले - बलि! तेरे-जैसे विवेकहीन एवं दुर्बुद्धि राजाके साथ ये सारे दैत्य एवं दानव मारे जायेंगे। हे पापको ही सोचनेवाले पापबुद्धि! तुम्हारे सिवा ऐसा कौन है, जो देवाधिदेव महाभाग अज एवं सर्वव्यापी वासुदेवको इस तरह कहेगा ॥ ३३-३५॥ तुमने जिन-जिनका नाम लिया है, वे सभी दैत्य एवं दानव तथा ब्रह्माके साथ सभी देवता एवं चराचरकी समस्त विभूतियाँ, तुम और मैं, पर्वत तथा वृक्ष, नदी और वनसे युक्त सारा जगत् तथा समुद्र एवं द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण लोक तथा चर और अचर जिन सर्ववन्द्य श्रेष्ठ सर्वव्यापी परमात्माके एक अंशकी अंशकलासे उत्पन्न