भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174
१६४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वा ह्यलेपके।<br>पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते॥ ४४<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम्।<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः।<br>तपश्चरन्ति विपुलं दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ ४५<br><br>दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः।<br>अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः॥ ४६सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त करता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी (चौदस) तिथिको 'अलेपक' नामक तीर्थमें स्नान कर वहाँ शिवकी पूजा करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता—पाप दूर भाग जाता है। विप्रवरो! वहाँसे उत्तम फलकीवनमें जाना चाहिये। वहाँ देवता, गन्धर्व, साध्य और ऋषिलोग रहते हैं एवं दिव्य सहस्र वर्षोंतक बहुत तप करते हैं। दृषद्वती (कग्गर) नदीमें स्नानकर देवताओंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र नामक यज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४३—४६॥
सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिने तथा।<br>यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ४७<br><br>गयायां च यथा श्राद्धं पितॄन् प्रीणाति नित्यशः।<br>तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फलकीवनमाश्रितैः॥ ४८<br><br>मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम्।<br>तस्यापि पितरस्तृप्तिं प्रयास्यन्ति न संशयः॥ ४९<br><br>तत्रापि तीर्थं सुमहत् सर्वदेवैरलंकृतम्।<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५०<br><br>पाणिखाते नरः स्नात्वा पितॄन् संतर्प्य मानवः।<br>अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्यं योगं च विन्दति॥ ५१सोमवारके दिन चन्द्रमाके क्षीण हो जानेपर अर्थात् सोमवती अमावास्याको जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसका पुण्यफल सुनो। जैसे गया-क्षेत्रमें किया गया श्राद्ध पितरोंको नित्य तृप्त करता है, वैसे ही फलकीवनमें रहनेवालोंको श्राद्ध करनेसे पितरोंको तृप्ति होती है। जो मनुष्य मनसे फलकीवनका स्मरण करता है, उसके भी पितर निःसंदेह तृप्ति प्राप्त करते हैं। वहीं सभी देवोंसे सुशोभित एक 'सुमहत्' तीर्थ है; उसमें स्नान करनेवाला पुरुष हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। मानव पाणिखात तीर्थमें स्नान करके एवं पितरोंका तर्पण कर राजसूय-यज्ञ तथा सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म)-के अनुष्ठान करनेसे होनेवाले फलको प्राप्त करता है॥ ४७—५१॥
ततो गच्छेत सुमहत्तीर्थं मिश्रकमुत्तमम्।<br>तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना॥ ५२<br><br>व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थं महात्मना।<br>सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः॥ ५३<br><br>ततो व्यासवनं गच्छेद्व्रियतो नियताशनः।<br>मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणिं शिवम्॥ ५४<br><br>मनसा चिन्तितं सर्वं सिध्यते नात्र संशयः।<br>गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः॥ ५५<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्चयेद् देवान् पितॄंश्च प्रयतो नरः।<br>स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धिं लभेन्नरः॥ ५६पाणिखातके बाद 'मिश्रक' नामक महान् एवं श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठो! वहाँ महात्मा व्यासदेवने दधीचिऋषिके हेतु तीर्थोंको एकमें मिश्रित किया था। इस मिश्रकतीर्थमें स्नान कर लेनेवाला मनुष्य (मानो) सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। फिर संयमशील तथा नियमित आहार करनेवाला होकर व्यासवनमें जाना चाहिये। 'मनोजव' तीर्थमें स्नानकर 'देवमणि' शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्यको अभीष्ट-सिद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें संदेह नहीं। मनुष्यको देवीके मधुवटी नामक तीर्थमें जाकर स्नान करके संयत होकर देवों एवं पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति देवीकी आज्ञासे (जैसी चाहता है, वैसी) सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ ५२—५६॥
कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्यां नरोत्तमः।<br>स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५७जो मनुष्य 'कौशिकी' और 'दृषद्वती' (कग्गर) नदियोंके संगममें स्नान करता और नियत भोजन करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।