वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ३६ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन | १६५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता।<br>पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥ ५८<br><br>कृतो देवैश्च विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा।<br>अभिगम्य स्थलीं तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥ ५९<br><br>किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च।<br>गच्छेत परमां सिद्धिं ऋणैर्मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>अहं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे।<br>तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ६१ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! 'व्यासस्थली' नामका एक स्थान है, जहाँ पुत्रशोकसे दुःखी होकर वेदव्यासने अपने शरीरत्यागका निश्चय कर लिया था, पर देवोंने उन्हें पुनः सँभाल लिया। उसके बाद उस भूमिमें जानेवाले मनुष्यको पुत्रशोक नहीं होता। 'किंदत्त कूप'में जाकर एक पसर (तौलका एक परिमाण) तिलका दान करनेसे मनुष्य परमसिद्धि और ऋणसे मुक्ति प्राप्त करता है। 'अह' एवं 'सुदिन' नामक ये दो तीर्थ पृथ्वीमें दुर्लभ हैं। इन दोनोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विशुद्धात्मा होकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है॥ ५७—६१॥ |
| कृतजप्यं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां प्रयतः स्थितः ॥ ६२<br><br>अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत्।<br>कोटितीर्थं च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥ ६३<br><br>तत्र स्नात्वा श्रद्धधानः कोटियज्ञफलं लभेत्।<br>ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६४<br><br>यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥ ६५ | उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'कृतजप्य' नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ नियमपूर्वक संयत रहते हुए गङ्गामें स्नान करना चाहिये। वहाँपर महादेवका पूजन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहींपर कोटितीर्थ स्थित है। वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नानकर 'कोटीश्वर' नाथका दर्शन करनेसे मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध 'वामनक' तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ प्रभावशाली विष्णुने वामनरूप धारणकर बलिको राज्य छीन कर इन्द्रको दे दिया था॥ ६२—६५॥ |
| तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ६६<br><br>ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम्।<br>तं तु दृष्ट्वा नरो मुक्तिं संप्रयाति न संशयः ॥ ६७<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां च नरः स्नात्वा ज्येष्ठत्वं लभते नृषु ॥ ६८<br><br>तत्र प्रतिष्ठिता विप्रा विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥ ६९ | वहाँ 'विष्णुपद' तीर्थमें स्नान कर वामनदेवकी पूजा कर समस्त पापोंसे शुद्ध होकर (छूटकर) मनुष्य विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है। वहींपर सभी पापोंको नष्ट करनेवाला ज्येष्ठाश्रम नामका तीर्थ है, उसका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं। ज्येष्ठ महीनेके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको उपवास कर द्वादशी तिथिके दिन स्नानकर मानव मनुष्योंमें श्रेष्ठता (बड़प्पन) प्राप्त करता है। वहाँ (सर्वाधिक) प्रभावशाली विष्णुभगवान्ने यज्ञादिमें दीक्षित (लगे हुए), प्रतिष्ठित एवं सम्मान्य तथा विष्णु-भगवान्की आराधनामें परायण ब्राह्मणोंको सम्मानित किया था॥ ६६—६९॥ |
| तेभ्यो दत्तानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च।<br>अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥ ७०<br><br>तत्रैव कोटितीर्थं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥ ७१ | उन्हें दिये गये (पात्रक) श्राद्ध और अनेक प्रकारके दान अक्षय एवं मन्वन्तरतक स्थिर रहते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात 'कोटितीर्थ' है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य करोड़ों यज्ञोंके फल प्राप्त करता है। |