भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३७ कोटिश्वरं नरो दृष्ट्वा तस्मिंस्तीर्थे महेश्वरम् । महादेवप्रसादेन गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ७२ तत्रैव सुमहत् तीर्थं सूर्यस्य च महात्मनः । तस्मिन् स्नात्वा भक्तियुक्तः सूर्यलोके महीयते ॥ ७३ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम् । कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा ॥ ७४ वर्णानामाश्रमाणां च तारणाय सुनिर्मलम् । ब्रह्मचर्यात्परं मोक्षं य इच्छन्ति सुनिर्मलम् । तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७५ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । कुलानि तारयेत् स्नातः सप्त सप्त च सप्त च ॥ ७६ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये तत्परायणाः । स्नाता भक्तियुताः सर्वे पश्यन्ति परमं पदम् ॥ ७७ दूरस्थोऽपि स्मरेद् यस्तु कुरुक्षेत्रं सवामनम् । सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्निवसन्नरः ॥ ७८ उस तीर्थमें 'कोटिश्वर' महादेवका दर्शन कर मनुष्य उन महादेवकी कृपासे गाणपत्य पद (गणनायक्त्वकी उपाधि) प्राप्त करता है। और वहीं महात्मा सूर्यदेवका महान् तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें महान् माना जाता है॥ ७०-७३॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कोटि तीर्थके बाद पापका नाश करनेवाले 'कुलोत्तारण तीर्थ' में जाना चाहिये, जिसे प्राचीनकालमें विष्णुने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंको तारनेके लिये बनाया था। जो मनुष्य ब्रह्मचर्यव्रतसे विशुद्ध मुक्तिकी इच्छा करते हैं ऐसे लोग भी उस तीर्थमें जाकर परम पदका दर्शन कर लेते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी वहाँ स्नानकर अपने कुलके (७+७+७=२१) इक्कीस पूर्व पुरुषोंका उद्धार कर देते हैं। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र उस तीर्थमें तीर्थपरायण होकर एवं भक्तिसे स्नान करते हैं, वे सभी परम पदका दर्शन करते हैं। और जो दूर रहता हुआ भी वामनसहित कुरुक्षेत्रका स्मरण करता है, वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है; फिर वहाँ निवास करनेवालेका तो कहना ही क्या? ॥ ७४-७८॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥ सैंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन लोमहर्षण उवाच पवनस्य हृदे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥ १ पुत्रशोकेन पवनो यस्मिंल्लीनो बभूव ह । ततः सब्रह्मकैर्देवैः प्रसाद्य प्रकटीकृतः ॥ २ अतो गच्छेत अमृतं स्थानं तच्छूलपाणिनः । यत्र देवैः सगन्धर्वैः हनुमान् प्रकटीकृतः ॥ ३ लोमहर्षण बोले- पवनके हृदमें, पुत्र (हनुमान्जी)- के शोकके कारण जिस सरोवरमें पवन लीन हो गये थे, उसमें स्नान करके महेश्वरदेवका दर्शन कर मनुष्य समस्त पापोंसे विमुक्त हो शिवपदको प्राप्त करता है। उसके बाद ब्रह्माके साथ सभी देवोंने मिलकर उन्हें प्रसन्न एवं प्रत्यक्ष प्रकट किया। यहाँसे शूलपाणि (भगवान् शंकर)- के अमृत नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ गन्धर्वोंके साथ देवताओंने हनुमान्जीको प्रकट किया था।