भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ३७ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन १६७ तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा अमृतत्वमवाप्नुयात्। कुलोत्तारणमासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ४ कुलानि तारयेत् सर्वान् मातामहपितामहान्। शालिहोत्रस्य राजर्षेस्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ५ तत्र स्नात्वा विमुक्तस्तु कलुषैर्देहसंभवैः । श्रीकुञ्जं तु सरस्वत्यां तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ६ तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अग्निष्टोमफलं लभेत् । ततो नैमिषकुञ्जं तु समासाद्य नरः शुचिः ॥ ७ नैमिषस्य च स्नानेन यत् पुण्यं तत् समाप्नुयात् । तत्र तीर्थं महाख्यातं वेदवत्या निषेवितम् ॥ ८ रावणेन गृहीतायाः केशेषु द्विजसत्तमाः। तद्ध्याय च सा प्राणान् मुमुचे शोककर्शिता ॥ ९ ततो जाता गृहे राज्ञो जनकस्य महात्मनः। सीता नामेति विख्याता रामपत्नी पतिव्रता ॥ १० सा हृता रावणेनेह विनाशाय आत्मनः स्वयम्। रामेण रावणं हत्वा अभिषिच्य विभीषणम् ॥ ११ समानीता गृहं सीता कीर्तिरात्मवता यथा। तस्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा कन्यायज्ञफलं लभेत् ॥ १२ विमुक्तः कलुषैः सर्वैः प्राप्नोति परं पदम्। ततो गच्छेत सुमहद् ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥ १३ यत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः। ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥ १४ ततो गच्छेत सोमस्य तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् । यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा द्विजराज्यमवाप्नुयात् ॥ १५ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च स्वपितॄन् दैवतानि च । निर्मलः स्वर्गमायाति कार्तिकां चन्द्रमा यथा ॥ १६ उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य अमृतपदको पा लेता है। नियमानुसार तीर्थका सेवन करनेवाला श्रेष्ठ ब्राह्मण 'कुलोत्तारण' तीर्थमें जाकर अपने मातामह और पितामहके समस्त वंशोंका उद्धार कर देता है। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध राजर्षि शालिहोत्रके तीर्थमें स्नान कर मुक्त हो मनुष्य शारीरिक पापोंसे सर्वथा छूट जाता है। सरस्वती-क्षेत्रमें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध श्रीकुञ्ज नामक तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। मनुष्य वहाँसे नैमिषकुञ्जतीर्थमें जाकर पवित्र हो जाता है और नैमिषारण्यतीर्थमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है। वहाँपर 'वेदवती' से निषेवित बहुत प्रसिद्ध तीर्थ है ॥ १-८ ॥ द्विजश्रेष्ठो ! रावणके द्वारा अपने केशके पकड़े जानेपर शोकसे संतप्त होकर (वेदवतीने) उसके (रावणके) वधके लिये अपने प्राणोंको छोड़ दिया था और उसके बाद महात्मा राजा जनकके घरमें वे उत्पन्न हुईं और उनका नाम 'सीता' विख्यात हुआ तथा वे रामकी पतिव्रता पत्नी हुईं। उस सीताको रावणने स्वयं अपने विनाशके लिये अपहृत कर लिया। सीताके अपहरण हो जानेपर राम-रावण-युद्ध हुआ, जिसमें रावणको मारनेके बाद विभीषणको (लङ्काके राज्यपर) अभिषिक्त कर राम सीताको वैसे ही घर लौटा लाये, जैसे आत्मवान् (जितेन्द्रिय) पुरुष कीर्तिको प्राप्त करता है। उनके तीर्थमें स्नान कर मनुष्य कन्यायज्ञ (कन्यादान)- का फल एवं समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त करता है। उस वेदवतीतीर्थके बाद ब्रह्माके उत्तम और महान् स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ स्नान करनेसे अवर-वर्णका व्यक्ति (जन्मान्तरमें) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है और ब्राह्मण विशुद्ध अन्तःकरणवाला होकर परम पदकी प्राप्ति करता है ॥ ९-१४ ॥ उस ब्रह्माके तीर्थस्थलपर जानेके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सोमतीर्थ' में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या करके द्विजराजत्व-पदको प्राप्त किया था। वहाँ स्नानकर अपने पितरों और देवताओंकी पूजा करनेसे मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान निर्मल