वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३७ |
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| सप्तसारस्वतं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।<br>यत्र सप्त सरस्वत्य एकीभूता वहन्ति च॥ १७<br><br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्नदा।<br>सरस्वत्योधनामा च सुरेणुर्विमलोदका॥ १८ | होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सप्तसारस्वत' नामक एक तीर्थ है, जहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मानसह्नदा, सरस्वती, ओघवती, विमलोदका एवं सुरेणु नामकी सातों सरस्वतियाँ (नदियाँ) एकत्र मिलकर प्रवाहित होती हैं॥ १५–१८॥ | | पितामहस्य यजतः पुष्करेषु स्थितस्य ह।<br>अब्रुवन् ऋषयः सर्वे नाऽयं यज्ञो महाफलः॥ १९<br><br>न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती।<br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम्॥ २०<br><br>पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै।<br>सुप्रभा नाम सा देवी तत्र ख्याता सरस्वती॥ २१<br><br>तां दृष्ट्वा मुनयः प्रीता वेगयुक्तां सरस्वतीम्।<br>पितामहं मानयन्तीं ते तु तां बहु मेनिरे॥ २२ | पुष्करतीर्थमें स्थित ब्रह्माजीके यज्ञके अनुष्ठानमें लग जानेपर सभी ऋषियोंने उनसे कहा—आपका यह यज्ञ महाफलजनक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती (नदी) नहीं दिखलायी पड़ रही है। उसे सुनकर भगवान्ने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका स्मरण किया। पुष्करमें यज्ञ कर रहे ब्रह्माजीद्वारा आहूत की गयी 'सुप्रभा' नामकी देवी वहाँ सरस्वती नामसे प्रसिद्ध हुई। ब्रह्माजीका मान करनेवाली उस वेगवती सरस्वतीको देखकर मुनिजन प्रसन्न हो गये और उन सबोंने उनका अत्यधिक सम्मान किया॥ १९–२२॥ | | एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करस्था सरस्वती।<br>समानीता कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना॥ २३<br><br>नैमिषे मुनयः स्थित्वा शौनकाद्यास्तपोधनाः।<br>ते पृच्छन्ति महात्मानं पौराणं लोमहर्षणम्॥ २४<br><br>कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत्।<br>ततोऽब्रवीन्महाभागः प्रणम्य शिरसा ऋषीन्॥ २५<br><br>सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो नानास्वाध्यायवेदिनः॥ २६<br><br>समागम्य ततः सर्वे सस्मरुस्ते सरस्वतीम्।<br>सा तु ध्याता ततस्तत्र ऋषिभिः सत्रयाजिभिः॥ २७<br><br>समागता प्लावनार्थं यज्ञे तेषां महात्मनाम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षी तु स्मृता मङ्कणकेन सा॥ २८<br><br>समागता कुरुक्षेत्रं पुण्यतोया सरस्वती।<br>गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम्॥ २९<br><br>आहूता च सरिच्छ्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती।<br>विशालां नाम तां प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः॥ ३० | इस प्रकार पुष्करतीर्थमें स्थित एवं नदियोंमें श्रेष्ठ इस सरस्वतीको महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्रमें लाये। एक समय नैमिषारण्यमें रहनेवाले तपस्याके धनी शौनक आदि मुनियोंने पुराणोंके ज्ञाता महात्मा लोमहर्षणसे पूछा—सत्पथगामी हमलोगोंको यज्ञका फल कैसे प्राप्त होगा? (—इसे कृपाकर समझाइये।) उसके बाद महानुभाव लोमहर्षणजीने ऋषियोंको सिरसे प्रणाम कर कहा कि ऋषियो! जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित है, वहाँ (रहनेसे) यज्ञका महान् फल प्राप्त होता है। इसको सुनकर विविध वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले मुनियोंने एकत्र होकर सरस्वतीका स्मरण किया। दीर्घकालिक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंके ध्यान (स्मरण) करनेपर वे (सरस्वती) वहाँ नैमिषक्षेत्रमें उन महात्माओंके यज्ञमें प्लावन करनेके लिये काञ्चनाक्षी नामसे उपस्थित हो गयीं। वे ही प्रसिद्ध नदी मङ्कणके द्वारा स्मृत होनेपर पवित्र-सलिला सरस्वतीके रूपमें कुरुक्षेत्रमें (भी) आयीं और महान् व्रती ऋषियोंने गया-क्षेत्रमें महायज्ञका अनुष्ठान करनेवाले गयके यज्ञमें आहूत की गयी उन श्रेष्ठ सरस्वती नदीको 'विशाला'के नामसे स्मरण किया॥ २३–३०॥ | | सरित् सा हि समाहूता मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रं समायाता प्रविष्टा च महानदी॥ ३१<br><br>उत्तरे कोशलाभागे पुण्ये देवर्षिसेविते।<br>उद्दालकेन मुनिना तत्र ध्याता सरस्वती॥ ३२ | महात्मा मङ्कण ऋषिद्वारा समाहूत की गयी वही नदी कुरुक्षेत्रमें आकर प्रवेश कर गयी। (फिर) उद्दालक मुनिने देवर्षियोंके द्वारा सेवित परम पवित्र उत्तरकोसल |