वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ३८ ] मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति [ १६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात्।<br>पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः॥ ३३<br>मनोहरेति विख्याता सर्वपापक्षयावहा।<br>आहूता सा कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना।<br>ऋषेः संमाननार्थाय प्रविष्टा तीर्थमुत्तमम्॥ ३४<br>सुवेणुरिति विख्याता केदारे या सरस्वती।<br>सर्वपापक्षया ज्ञेया ऋषिंसिद्धनिषेविता॥ ३५ | प्रदेशमें सरस्वतीका ध्यान किया। उन मुनिके कारण नदियोंमें श्रेष्ठ वह सरस्वती नदी उस देशमें आ गयी एवं वह वल्कल तथा मृगचर्मको धारण करनेवाले मुनियोंद्वारा पूजित हुई। तब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली वह ‘मनोहरा’ नामसे विख्यात हुई। फिर वह महात्मा मङ्कणद्वारा आहूत होकर ऋषिको सम्मानित करनेके लिये कुरुक्षेत्रके उत्तम तीर्थमें प्रविष्ट हुई। केदारतीर्थमें जो सरस्वती ‘सुवेणु’ नामसे प्रसिद्ध है, वह ऋषियों और सिद्धोंके द्वारा सेवित तथा सर्वपापनाशक रूपसे जानी जाती है॥ ३१—३५॥ |
| सापि तेनेह मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>ऋषीणामुपकारार्थं कुरुक्षेत्रं प्रवेशिता॥ ३६<br>दक्षेण यजता सापि गङ्गाद्वारे सरस्वती।<br>विमलोदा भगवती दक्षेण प्रकटीकृता॥ ३७<br>समाहूता ययौ तत्र मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रे तु कुरुणा यजिता च सरस्वती॥ ३८<br>सरोमध्ये समानीता मार्कण्डेयेन धीमता।<br>अभिष्टूय महाभागां पुण्यतोयां सरस्वतीम्॥ ३९<br>यत्र मङ्कणकः सिद्धः सप्तसारस्वते स्थितः।<br>नृत्यमानश्च देवेन शंकरेण निवारितः॥ ४० | परमेश्वरकी आराधना कर उन मुनिने उसे (सुवेणुको) भी ऋषियोंका उपकार करनेके लिये इस कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित कराया। गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे दक्षने ‘विमलोदा’ नामसे भगवती सरस्वतीको प्रकट किया। कुरुक्षेत्रमें कुरुद्वारा पूजित सरस्वती मङ्कणद्वारा बुलायी जानेपर वहाँ गयी। फिर बुद्धिमान् मार्कण्डेयजी उस पवित्र जलवाली महाभागा सरस्वतीकी स्तुति कर उसे सरोवरके मध्यमें ले गये। वहीं सप्तसारस्वततीर्थमें उपस्थित एवं नृत्य करते हुए सिद्ध मङ्कणकको नृत्य करनेसे शंकरजीने रोका था॥ ३६—४०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः।<br>नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः॥ १ | ऋषियोंने कहा—(प्रभो!) मङ्कणक किस प्रकार सिद्ध हुए? वे महान् ऋषि किससे उत्पन्न हुए थे? नृत्य करते हुए उन मङ्कणकको महादेवने क्यों रोका?॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः।<br>स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः॥ २<br>तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः।<br>स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः॥ ३ | लोमहर्षणने कहा—(ऋषियो!) मङ्कणकमुनि महर्षि कश्यपके मानसपुत्र थे। (एक समय) वे ब्राह्मण देवता वल्कल-वस्त्र लेकर स्नान करने गये। वहाँ रम्भा आदि सुन्दरी अप्सराएँ भी गयी थीं। अनिन्द्य, कोमल एवं मनोहर (रूपवाली वे सभी) अप्सराएँ उनके साथ (ही) |